सीनियर सिटीजंस डे पर मां- बेटे के बीच एक अद्भुत दार्शनिक संवाद

–गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
तदनुग्रह आसीनं प्रष्टुं ज्ञानकथां शुभाम्।
तत्त्वानां भगवन् ब्रूहि यन्मां तारयते भवान्॥ (श्रीमद्भागवत 3.25.7) माता देवहूति ने कपिल से कहा- हे बेटा! अब तू मुझ पर कृपा करके वह शुभ तत्त्वज्ञान दे, जिससे तुम्हारी यह मां इस संसार-सागर से सुगमता से पार उतर जाए।
तः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम् ।
गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तय
कपिल ने कहा माता! इस जीव के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही माना गया है। सांसारिक विषयों में आसक्त होने के कारण वह बन्धन में बंधा होता है और परमात्मामें अनुरक्त होने पर वही मोक्ष का कारण बन जाता है।…..
पौराणिक साहित्य में पति पत्नी के बीच आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा तो बहुत मिलती है लेकिन मा बेटे के बीच हुए संवाद तो केवल श्रीमद्भागवत में ही पढ़ने को मिलता है -माता देवहुति और उसके बेटे कपिल की आध्यात्मिक चर्चा श्रीमद्भागवत में कैप्लोआख्यान नाम से बहुत प्रसिद्द हुआ –
मां और बेटे के बीच मैत्री वैसे तो जन्मजात होती है लेकिन ज्यादातर मामलों में वह बचपन तक ही सीमित रहती है जब तक वह घर में रहता है । बड़े होते ही जब वे पढ़ाई- लिखाई और जॉब के सिलसिले में घर से बाहर निकलते हैं, तब दोनों के बीच वह ट्यूनिंग कम ही दिखाई देती है इसलिए मां- बेटे के बीच बौद्धिक स्तर पर संवाद कम ही देखने- सुनने को मिलता है ।
श्रीमद्भागवत में *कपिलोख्यान* एक दिलचस्प प्रसंग है, जिसमें मां- बेटे की जोड़ी ने दुनियां के सामने एक प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है। कर्दम ऋषि ने जब संन्यास ले लिया था तो उनकी पत्नी देवहूति घर में अकेली रह गई थी लेकिन उनका बेटा कपिल उसके साथ था जो बहुत संवेदनशील और योग्य विद्वान था, तो माता देवहूति का बुढ़ापा अच्छी तरह निभ गया।श्रीमद्भागवत का यह सबसे महत्वपूर्ण आख्यान है, जिसमें मा- बेटे के बीच निरंतर आध्यात्मिक चर्चा चलती रही। कपिल भगवान ने अपनी माता देवहूति को अष्टांग योग का प्रवचन किया था जिसे सुनकर माता देवहूति भी धन्य हो गई, उन्हें अपने पति का अभाव नहीं खला और कपिल को भी संतुष्टि हो गयी कि मैने अपनी मां की यथायोग्य सेवा की है, दोनों का जीवन सार्थक हो गया
श्रीमद्भागवत में कपिल मुनि को अवतार का दर्जा दिया गया है, जो विष्णु का ही प्रतिनिधित्व करते हैं।गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं यह घोषणा की है कि सिद्ध मुनियों में कपिल भी मैं ही हूँ –
“गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥ “भगवद्गीता अध्याय १०
आजकल के उन युवाओं के लिए यह एक प्रेरक उदाहरण हो सकता है जिनके वृद्ध माता- पिता उनके साथ रहते हैं और जब वे दोनों अच्छे पढ़े लिखे भी हों तो, तब यदि वे लोग भी अपने माता पिता के साथ कभी- कभार, जब उन्हें फुर्सत मिले, साहित्य पर चर्चा करके अथवा अपने नए जमाने के विचार उनके साथ शेयर करें, तो उनको भी अच्छा लगेगा और उनका समय भी अच्छा बीतेगा , उनको बुढ़ापे में डिप्रेशन का शिकार नहीं होना पड़ेगा ।–GPB
