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उत्तराखंड में जलवायु आपदाओं का बढ़ता खतरा, निगरानी और चेतावनी तंत्र मजबूत करने की उठाई मांग

 

13 खतरनाक ग्लेशियल झीलें चिह्नित, अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर चिंता का विषय

देहरादून, 5 सितम्बर। उत्तराखंड में ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने, ग्लेशियल झीलों के विस्तार, हैंगिंग ग्लेशियरों और हिमस्खलन के बढ़ते खतरों के बीच जोखिम की पहचान और समय पर कार्रवाई के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। राज्य में 13 संभावित खतरनाक ग्लेशियल झीलों की पहचान के बावजूद निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी व्यवस्था अभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है।
सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज फाउंडेशन की शनिवार को देहरादून प्रेस क्लब में जारी रिपोर्ट ‘उत्तराखंड ऐट अ क्लाइमेट क्रॉसरोड्स–व्हाट फोर इयर्स ऑफ डिजास्टर रिपोर्टिंग टेल अस अबाउट ग्लेशियर्स, ग्लोफ एंड एवलांचेस’ में ये तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट का विमोचन अनूप नौटियाल और प्रवीण उप्रेती ने किया। इसमें जलवायु और आपदा जोखिम से जुड़े पांच प्रमुख पैटर्न चिह्नित करते हुए पांच प्रमुख उपाय सुझाए गए हैं।
फाउंडेशन के ‘उत्तराखंड डिजास्टर एंड एक्सीडेंट एनालिसिस इनिशिएटिव-उदय’ के तहत अक्टूबर 2022 से जून 2026 तक सामने आई घटनाओं और 28 मीडिया अपडेट के विश्लेषण के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई है। इसमें इसरो, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी, इसीमोड और विभिन्न विश्वविद्यालयों के अध्ययनों और निष्कर्षों को भी संदर्भ के रूप में लिया गया है। संस्था ने स्पष्ट किया है कि यह वैज्ञानिक अध्ययन नहीं, बल्कि मीडिया आधारित विश्लेषण है।
रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 2024 में उत्तराखंड की 13 ग्लेशियल झीलों को संभावित रूप से खतरनाक माना था। इनमें पांच झीलें उच्चतम जोखिम वाली श्रेणी में रखी गई थीं। इसके बावजूद कई स्थानों पर निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली अपेक्षित स्तर तक विकसित नहीं हुई है। वसुधारा झील का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वहां जोखिम आकलन पूरा होने के कई महीने बाद तक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित नहीं हो सकी थी।
अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर
रिपोर्ट में अलकनंदा बेसिन को लेकर सामने आए एक अन्य खतरे की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। वर्ष 2026 के एक अध्ययन में इस बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर चिह्नित किए गए। इनमें करीब 30 प्रतिशत ऊपरी अलकनंदा क्षेत्र में बदरीनाथ और माणा के आसपास बताए गए हैं।
चारधाम क्षेत्रों में ग्लेशियरों के लगातार पीछे हटने को भी चिंताजनक माना गया है। रिपोर्ट में उद्धृत आंकड़ों के अनुसार गंगोत्री ग्लेशियर के पीछे हटने की वार्षिक दर करीब 22.3 मीटर, यमुनोत्री में 20 मीटर, बदरीनाथ में 17.3 मीटर और केदारनाथ क्षेत्र में 14.1 मीटर दर्ज की गई है।
वृहत्तर हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में भी ग्लेशियर क्षेत्रफल और बर्फ के भंडार में कमी दर्ज की जा रही है। वर्ष 1990 के बाद एक हजार से अधिक नई ग्लेशियल झीलें बनने और पहले से मौजूद झीलों के विस्तार का उल्लेख करते हुए रिपोर्ट ने भविष्य के जोखिमों के प्रति आगाह किया है।
रिपोर्ट के अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों में मौसम का व्यवहार भी अधिक अनिश्चित हो रहा है। लंबे सूखे दौर के बाद अचानक अत्यधिक बारिश या बर्फबारी जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। दूसरी ओर संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों, जलविद्युत परियोजनाओं, पर्यटन एवं तीर्थयात्रा सुविधाओं और बस्तियों का लगातार विस्तार हो रहा है, जिससे आपदा जोखिम और बढ़ सकता है।
हर उच्च जोखिम वाली झील के लिए बने कार्ययोजना
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि केवल खतरों की पहचान पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झील के लिए समयबद्ध कार्ययोजना, नोडल एजेंसी, निगरानी एवं प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और निचले क्षेत्रों में आपदा से निपटने की तैयारी के लिए अलग वित्तीय व्यवस्था होनी चाहिए।
हैंगिंग ग्लेशियरों, अस्थिर ढलानों, बढ़ती ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की नियमित निगरानी के लिए उपग्रह और रिमोट सेंसिंग से मिलने वाली जानकारी को मैदानी सर्वेक्षण और स्थानीय समुदायों के अनुभवों से जोड़ने की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट में चारधाम यात्रा की योजना में भी जलवायु जोखिम और क्षेत्र की वहन क्षमता को केंद्रीय स्थान देने की सिफारिश की गई है। यात्रा प्रबंधन को केवल यातायात, पानी और कचरा प्रबंधन तक सीमित न रखते हुए ग्लेशियरों के पीछे हटने, चरम मौसम, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसे जोखिमों को भी इसमें शामिल करने को कहा गया है।
इसके साथ ही राज्य में दीर्घकालिक क्रायोस्फीयर एवं जलवायु जोखिम कार्यक्रम शुरू करने और सड़क, सुरंग, जलविद्युत, पर्यटन तथा अन्य बड़ी परियोजनाओं का आकलन बहु-आपदा जोखिम और उनके संचयी प्रभावों के आधार पर करने की सिफारिश की गई है।
रिपोर्ट में हिमालयी समुदायों को जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रबंधन के केंद्र में रखने पर भी जोर दिया गया है। गांव स्तर पर आपदा प्रबंधन योजनाएं, प्रशिक्षित स्वयंसेवक, समुदाय आधारित निगरानी और आवश्यक राहत एवं बचाव उपकरण उपलब्ध कराने की जरूरत बताई गई है।
अनूप नौटियाल ने कहा कि रिपोर्ट राज्य सरकार के संबंधित विभागों और संस्थानों के साथ साझा की जाएगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में बार-बार सामने आ रही आपदाओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखने के बजाय तेजी से बदलते हिमालयी पर्यावरण के संकेत के रूप में समझने की जरूरत है। इसके लिए बेहतर तैयारी, जवाबदेही और दीर्घकालिक योजना आवश्यक है।

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