एक रोचक प्रसंग : बिना प्रेम रीझे नहीं, तुलसी नंद किशोर

—गोविन्द प्रसाद बहुगुणा-
अपने मित्र, पद्मश्री से सम्मानित कवि लीलाधर जगूड़ी जी से जब भी फोन पर बात होती है, वे कोई न कोई दिलचस्प किस्सा जरूर सुनाते हैं। उनका किस्सा सुनाने का अंदाज भी ऐसा होता है कि वर्षों पुरानी घटना आंखों के सामने घटती हुई-सी लगने लगती है।
ऐसा ही एक रोचक किस्सा उन्होंने मुझे पत्रकार और लेखक स्व. नंद किशोर नौटियाल से जुड़ा सुनाया। नौटियाल जी वर्ष 1992 तक हिंदी साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ के संपादक रहे थे। बाद में उन्हें उत्तराखंड सरकार ने श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया था।
एक दिन बातचीत के दौरान नौटियाल जी ने जगूड़ी जी से सहज ही पूछ लिया, “कभी बदरीनाथ भी गए हो?”
जगूड़ी जी ने कहा, “नहीं भाई साहब, अभी तक ऐसा संयोग नहीं बन पाया।”
नौटियाल जी ने तुरंत कहा, “तो चलो, अबकी बार तुम्हें बदरीनाथ दिखा लाते हैं।”
इस तरह जगूड़ी जी भी सपत्नीक उनके साथ बदरीनाथ पहुंच गए। वहां मंदिर परिसर के निकट स्थित अतिथि गृह में सभी ठहरे हुए थे। इसी दौरान समाजवादी पार्टी के नेता और सांसद अमर सिंह भी वहां पहुंचे। उनके साथ उद्योगपति अनिल अंबानी, अभिनेता अमिताभ बच्चन और उनके पुत्र अभिषेक बच्चन भी थे।
औपचारिक परिचय और बातचीत के बीच अमर सिंह ने कुछ मजाकिया अंदाज में नंद किशोर नौटियाल जी से कहा, “पंडित! साक्षात ठाकुर यहां आए हैं, भोग नहीं लगाओगे?”
अमर सिंह का इशारा स्वयं की ओर था। यानी ‘ठाकुर अमर सिंह’ आए हैं, तो कुछ खाने-पीने का इंतजाम तो होना चाहिए।
लेकिन बदरीनाथ धाम में ‘ठाकुर’ शब्द का अपना अलग ही अर्थ और महत्व है। वहां ठाकुर तो भगवान हैं। वैष्णव परंपरा में भगवान को श्रद्धापूर्वक ‘ठाकुर’ कहकर संबोधित किया जाता है।
बस, यहीं जगूड़ी जी के कवि मन को परिहास का अवसर मिल गया।
उन्होंने कहा, “भाई साहब, ‘ठाकुर’ के मायने अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होते हैं। पहाड़ में ठाकुर भगवान को कहते हैं, जिनके द्वार पर हम और आप आए हुए हैं। बिहार में ठाकुर किसी और ही प्रजाति को कहते हैं। इसलिए हमारे पंडित नौटियाल जी असमंजस में हैं कि आप कौन से ‘ठाकुर’ को भोग लगाने के लिए कह रहे हैं?”
अमर सिंह ने हंसते हुए कहा, “अरे, हम तो अपने को ही ठाकुर समझते हैं, इसलिए मित्रवत कह दिया।”
जगूड़ी जी भी कहां चूकने वाले थे। मुस्कराते हुए बोले, “तुलसीदास जी ने भी इस पर बहुत अच्छी बात कही है—
राम-राम सब कोई कहे, ठग ठाकुर और चोर।
बिना प्रेम रीझे नहीं, तुलसी नंद किशोर।।”
दोहे की अंतिम पंक्ति में आए ‘नंद किशोर’ को अपने नाम से जोड़कर नंद किशोर नौटियाल जी उसका श्लेष समझ गए। वे गदगद हो उठे और बोले, “जगूड़ी लोग ऐसे ही जगत गुरु नहीं हुए हैं भाई! आज उसका प्रमाण भी मिल गया।”
जगूड़ी जी के इस चुटीले व्यंग्य का आनंद वहां मौजूद सभी लोगों ने लिया। बात परिहास में कही गई थी, लेकिन राजनीति के माहिर सज्जन को भी उसी अंदाज में सटीक जवाब मिल चुका था।
इसके बाद माहौल को और खुशनुमा बनाने तथा अतिथियों के स्वागत-सत्कार के लिए नौटियाल जी ने तुरंत रसगुल्ले और लड्डू मंगवाए। वे जगूड़ी जी के जवाब से इतने प्रसन्न थे कि उन्होंने उनके मुंह में एक नहीं, बल्कि दो-दो लड्डू ठूंस दिए।
बाद में नौटियाल जी ने जगूड़ी जी से कहा—
“यार, तुमने कमाल का छौंक मारा। मजा आ गया!”
और शायद यही इस संस्मरण की असली मिठास है—बदरीनाथ के आंगन में साहित्य, राजनीति, परिहास और मित्रता का ऐसा संगम, जिसमें एक शब्द ‘ठाकुर’ ने पूरी महफिल को रस से भर दिया और ‘नंद किशोर’ ने उस रस में श्लेष की मिठास घोल दी।
