‘सिद्धार्थ’ : एक दार्शनिक उपन्यास

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
यह किताब मैंने कुछ वर्ष पूर्व चेन्नई में एक पुस्तक मेले में खरीदी थी। यह जर्मन उपन्यासकार, कहानीकार और कवि हरमन हेस (2 जुलाई 1877–9 अगस्त 1962) के प्रसिद्ध उपन्यास सिद्धार्थ का जर्मन से अंग्रेजी में अनूदित संस्करण है।
नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हरमन हेस मुख्य रूप से अपने उपन्यासों सिद्धार्थ, स्टेपनवुल्फ़ और द ग्लास बीड गेम (मागिस्टर लूडी) के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कविताएं भी लिखीं और चित्रकला में भी उनकी गहरी रुचि थी। वर्ष 1946 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। हेस के सृजन में अन्तर्बोध, आत्मान्वेषण और पूर्वी दर्शन की व्यापक धारा दिखाई देती है। इसी कारण उनकी रचनाएं, विशेषकर सिद्धार्थ, बाद की पीढ़ियों और यूरोप-अमेरिका के युवा पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुईं।
उनके जीवन से जुड़ी एक दिलचस्प बात यह भी है कि उनके नाना हरमन गुंडर्ट लंबे समय तक दक्षिण भारत में मिशनरी और विद्वान के रूप में रहे थे। उन्होंने भारतीय भाषाओं, विशेषकर मलयालम, का गहन अध्ययन किया। हेस के पारिवारिक परिवेश में भारत, भारतीय दर्शन और पूर्वी आध्यात्मिक परंपराओं की मौजूदगी थी। आगे चलकर बौद्ध और भारतीय दर्शन ने भी उनके चिंतन और साहित्यिक सृजन को गहराई से प्रभावित किया। सिद्धार्थ में इस प्रभाव को बहुत स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है।
हरमन हेस ने सिद्धार्थ की पहली प्रति फ्रांसीसी लेखक और नोबेल पुरस्कार विजेता रोमां रोलां को समर्पित की थी।
इस पुस्तक में लेखक के कुछ विचार ऐसे हैं, जिन्हें साझा करने का मन होता है। मसलन—
“Wisdom cannot be imparted. Wisdom that a wise man attempts to impart always sounds like foolishness to someone else … Knowledge can be communicated, but not wisdom. One can find it, live it, do wonders through it, but one cannot communicate and teach it.”
एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं—
“Words do not express thoughts very well. They always become a little different immediately they are expressed, a little distorted, a little foolish. And yet it also pleases me and seems right that what is of value and wisdom to one man seems nonsense to another.”
और यह छोटी-सी बात अपने भीतर बहुत बड़ा दर्शन समेटे हुए है—
“Gentleness is stronger than severity, water is stronger than rock, love is stronger than force.”
ज्ञान दिया जा सकता है, लेकिन प्रज्ञा नहीं। प्रज्ञा को मनुष्य को स्वयं खोजना, जीना और अनुभव करना पड़ता है। शायद सिद्धार्थ का मूल संदेश भी यही है—जीवन के सत्य तक पहुंचने का रास्ता केवल दूसरों की शिक्षाओं से नहीं, बल्कि अपने अनुभव, आत्मबोध और जीवन-यात्रा से होकर गुजरता है।
(शेष फिर कभी… आज इतना ही।)
