दूर समंदर में एल नीनो, खतरा हमारे घर तक
El Niño, driven by abnormal warming of the equatorial Pacific Ocean, can influence lives thousands of kilometres away through changes in rainfall, temperature and extreme weather. For India, its implications extend far beyond the monsoon, affecting agriculture, food and water security, heat exposure and public health. Changing climatic conditions may increase the risks of heat-related illnesses, mosquito-borne diseases, water contamination, malnutrition and disruption of healthcare services. The article argues that India should convert advance climate warnings into early health action by integrating weather forecasts with disease surveillance, hospital preparedness, urban management, agriculture, water planning and disaster-response systems. Jay. S. Rawat

-जयसिंह रावत
प्रशांत महासागर में हजारों किलोमीटर दूर पानी का असामान्य रूप से गर्म होना भारत में किसी किसान के लिए सूखे, मजदूर के लिए लू, बच्चे के लिए डेंगू और पहाड़ के किसी गांव के लिए आपदा का कारण बनने वाली परिस्थितियां पैदा कर सकता है। समुद्र के तापमान से लेकर हमारे खेत, रसोई, नल और अस्पताल तक फैले जलवायु और स्वास्थ्य के इसी जटिल रिश्ते की ओर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 5 सितंबर को जारी अपनी रिपोर्ट ‘ग्लोबल पब्लिक हेल्थ सिचुएशन एनालिसिस—एल नीनो 2026’ में दुनिया का ध्यान खींचा है। भारत को उन देशों में रखा गया है, जहां इस जलवायु घटना से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम गंभीर हो सकते हैं। संगठन का मूल संदेश साफ है—बीमारी और आपदा के सामने आने की प्रतीक्षा करने के बजाय खतरे का पूर्वानुमान लगाकर पहले से तैयारी की जाए।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन की 3 सितंबर की रिपोर्ट इस चिंता को और गंभीर बनाती है। उसके अनुसार एल नीनो स्थापित हो चुका है और आने वाले महीनों में इसके अत्यंत प्रबल होने की आशंका है। फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना लगभग सौ प्रतिशत आंकी गई है। मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी ऊपर पहुंच चुका है और यह स्थिति वर्ष के अंत में चरम पर पहुंच सकती है। यानी समुद्र में हो रहा यह परिवर्तन अब केवल मौसम वैज्ञानिकों की दिलचस्पी का विषय नहीं रह गया है। इसके संभावित प्रभावों की तैयारी कृषि, जल, स्वास्थ्य और आपदा प्रबंधन से जुड़े तंत्र को भी करनी होगी।
एल नीनो कोई नई घटना नहीं है। सामान्यतः दो से सात वर्ष के अनियमित अंतराल पर मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म होने लगता है। इससे समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा का आदान-प्रदान तथा वायुमंडलीय परिसंचरण बदलता है और उसका प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर वर्षा तथा तापमान पर पड़ सकता है। भारत जैसे मानसून आधारित देश में इसलिए एल नीनो केवल मौसम का विषय नहीं, बल्कि कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल संसाधन, अर्थव्यवस्था और जनस्वास्थ्य का भी प्रश्न बन जाता है।
इस बार चिंता का एक कारण यह भी है कि सितंबर से नवंबर के दौरान दुनिया के अधिकांश भूभागों में सामान्य से अधिक तापमान की आशंका जताई गई है। भारतीय उपमहाद्वीप भी इससे अछूता नहीं रह सकता। इसके साथ हिंद महासागर में सकारात्मक ‘इंडियन ओशन डाइपोल’ बनने की संभावना भी महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि भारत में एल नीनो का वास्तविक प्रभाव केवल प्रशांत महासागर की स्थिति से तय नहीं होगा। हिंद महासागर, मानसूनी परिसंचरण और स्थानीय मौसम प्रणालियां उसके प्रभाव को बढ़ा, घटा या बदल सकती हैं। इसलिए हर सूखे, बाढ़, अतिवृष्टि या बीमारी को सीधे एल नीनो से जोड़ देना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
यही सावधानी स्वास्थ्य के मामले में भी जरूरी है। एल नीनो स्वयं डेंगू या मलेरिया पैदा नहीं करता, लेकिन वह तापमान, वर्षा और आर्द्रता जैसी उन परिस्थितियों को बदल सकता है, जिन पर मच्छरों का प्रजनन, जीवनचक्र और सक्रियता निर्भर करती है। कहीं अधिक वर्षा नए जलभराव पैदा कर सकती है तो कहीं सूखे और अनियमित जलापूर्ति के कारण घरों में पानी जमा करने की मजबूरी मच्छरों के नए प्रजनन स्थल बना सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन को दक्षिण एशिया में मलेरिया, डेंगू और कुछ अन्य संक्रामक रोगों को लेकर इसी कारण चिंता है।
भारत में मच्छरजनित बीमारियों का महानगरों से छोटे शहरों और कस्बों तक फैलाव यह भी बताता है कि समस्या केवल मौसम की नहीं है। अनियोजित शहरीकरण, नालियों और सड़कों पर जलभराव, कमजोर कचरा प्रबंधन, निर्माण स्थलों पर जमा पानी और घरेलू जल भंडारण भी मच्छरों को अनुकूल वातावरण देते हैं। बदलती जलवायु और कमजोर नागरिक प्रबंधन एक साथ मिल जाएं तो खतरा कई गुना बढ़ सकता है।
लेकिन एल नीनो की चेतावनी को केवल डेंगू और मलेरिया तक सीमित कर देना उससे कहीं बड़े स्वास्थ्य संकट को अनदेखा करना होगा। अत्यधिक गर्मी अपने आप में गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बन चुकी है। लू और निर्जलीकरण के अलावा अधिक तापमान हृदय, श्वसन, गुर्दे और चयापचय संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों की मुश्किलें बढ़ा सकता है। गर्भवती महिलाएं, नवजात, बच्चे, बुजुर्ग, खुले में काम करने वाले श्रमिक और पहले से बीमार लोग विशेष रूप से संवेदनशील हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एल नीनो से जुड़े प्रमुख स्वास्थ्य जोखिमों में अत्यधिक गर्मी, जलजनित और मच्छरजनित रोग, कुपोषण तथा आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान को भी शामिल किया है।
भारत के सामने एक विचित्र चुनौती यह है कि एक क्षेत्र में वर्षा की कमी और दूसरे में अतिवृष्टि, दोनों ही जनस्वास्थ्य संकट पैदा कर सकते हैं। सूखा फसल उत्पादन और पेयजल उपलब्धता घटाकर खाद्य असुरक्षा तथा कुपोषण बढ़ा सकता है। दूसरी ओर बाढ़ पेयजल स्रोतों को दूषित कर सकती है, स्वच्छता व्यवस्था ध्वस्त कर सकती है और अस्पतालों तथा स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच रोक सकती है। इस प्रकार एल नीनो का संभावित स्वास्थ्य प्रभाव अस्पताल की चारदीवारी से बहुत बाहर खेत और रसोई तक फैला हुआ है। अनाज का उत्पादन घटे तो भोजन महंगा होगा, पानी की कमी हो तो स्वच्छता प्रभावित होगी और अत्यधिक गर्मी बढ़े तो बीमारी तथा श्रम उत्पादकता दोनों पर असर पड़ेगा।
हिमालयी भारत के लिए इसका एक अलग आयाम है। यहां अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, सड़क अवरोध और बाढ़ का स्वास्थ्य पर असर तब और गंभीर हो जाता है, जब किसी गांव या कस्बे का अस्पताल से संपर्क ही टूट जाए। गर्भवती महिला, दुर्घटना में घायल व्यक्ति या गंभीर रोगी के लिए बंद सड़क स्वयं स्वास्थ्य आपदा बन सकती है। तापमान में दीर्घकालीन बदलाव मच्छरों और रोगवाहक जीवों के लिए पहले कम अनुकूल रहे ऊंचाई वाले क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए दिल्ली, राजस्थान, बिहार, असम, केरल और उत्तराखंड के लिए एक जैसी स्वास्थ्य रणनीति कारगर नहीं हो सकती। तैयारी स्थानीय भूगोल, मौसम और रोगों के पुराने आंकड़ों के आधार पर करनी होगी।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था मौसम की चेतावनी को समय रहते स्वास्थ्य चेतावनी में बदलने के लिए तैयार है? भारत के पास मौसम पूर्वानुमान की आधुनिक व्यवस्था, उपग्रहों से मिलने वाली सूचनाएं, रोग निगरानी प्रणाली और विशाल स्वास्थ्य तंत्र मौजूद है। असली चुनौती इन सभी प्रणालियों के बीच समय पर समन्वय की है। यदि किसी जिले में आने वाले सप्ताहों के तापमान, वर्षा और आर्द्रता के आधार पर डेंगू या किसी दूसरे रोग का खतरा बढ़ने का संकेत मिल रहा हो तो जांच किट, अस्पताल के बिस्तर, रक्त की उपलब्धता, दवाइयां और स्वास्थ्यकर्मियों की तैयारी बीमारी फैलने के बाद क्यों शुरू हो?
मौसम विभाग का पूर्वानुमान केवल छाता साथ रखने या किसान को बारिश की संभावना बताने वाली सूचना तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे स्वास्थ्य प्रशासन, नगर निकायों, जलापूर्ति विभाग, कृषि विभाग और आपदा प्रबंधन की अग्रिम कार्ययोजना का आधार बनाना होगा। जिला स्तर पर मौसम, रोग और अस्पतालों के आंकड़ों को जोड़ने वाली ऐसी पूर्व चेतावनी व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जो खतरे के बढ़ने से पहले ही संबंधित विभागों को सक्रिय कर दे।
चेतावनी को अवसर बनाना होगा
एल नीनो की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अचानक आने वाले भूकंप की तरह यह बिना चेतावनी नहीं आता। समुद्र और वायुमंडल में होने वाले बदलावों के आधार पर इसका महीनों पहले अनुमान लगाया जा सकता है। यही इस चुनौती के भीतर छिपा सबसे बड़ा अवसर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी पूर्व चेतावनी और अग्रिम कार्रवाई को संभावित नुकसान कम करने का प्रभावी उपाय मानता है।
भारत को इसलिए एल नीनो से भयभीत होने के बजाय उससे मिलने वाली अग्रिम सूचना का लाभ उठाना चाहिए। नगर निकाय अभी से मच्छरों के प्रजनन स्थलों पर नियंत्रण बढ़ाएं, स्वास्थ्य विभाग रोग निगरानी तेज करे, अस्पताल संभावित दबाव का आकलन करें और कृषि तथा जल प्रबंधन तंत्र खाद्य एवं पेयजल जोखिमों के लिए तैयारी करे। जिन क्षेत्रों में लू का खतरा अधिक है वहां श्रमिकों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए विशेष व्यवस्था हो, जबकि बाढ़ संभावित क्षेत्रों में पेयजल, दवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं की वैकल्पिक व्यवस्था पहले से तैयार रखी जाए।
एल नीनो की असली चेतावनी यही है कि दूर प्रशांत महासागर में होने वाला परिवर्तन अब हमारे खेत की फसल, रसोई की थाली, नल के पानी, मजदूर के काम और अस्पताल के बिस्तर तक पहुंच सकता है। इक्कीसवीं सदी की सक्षम स्वास्थ्य व्यवस्था वही होगी, जो मरीज के अस्पताल पहुंचने के बाद ही सक्रिय न हो, बल्कि समुद्र और मौसम के बदलते संकेतों को पढ़कर बीमारी और आपदा के दरवाजे पर पहुंचने से पहले ही उसका रास्ता रोकने की तैयारी कर ले।
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ABOUT AUTHOR: Jay Singh Rawat is a veteran journalist, author and editorial consultant with nearly five decades of experience. An award-winning writer, he has authored nine reference books and writes extensively on Uttarakhand, the Himalayas, environment, history, governance and contemporary affairs. He is an honorary editorial advisor of this news portal..Admin
