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निठारी कांड से बरी सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में संदिग्ध मौत

19 साल जेल में रहा, 13 मामलों में मिली थी फांसी की सजा; पिछले साल सुप्रीम कोर्ट से अंतिम मामले में भी हुआ था बरी

हरिद्वार/नई दिल्ली, 19 सितम्बर। देश को झकझोर देने वाले नोएडा के निठारी कांड के सबसे चर्चित आरोपी रहे सुरेंद्र कोली की शुक्रवार को हरिद्वार में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। करीब 19 साल जेल में बिताने और एक समय फांसी के बेहद करीब पहुंच चुके कोली को पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ बचे अंतिम मामले में भी बरी कर दिया था। जेल से बाहर आने के करीब दस महीने बाद उसका शव हरिद्वार के भूपतवाला क्षेत्र में उसकी छोटी-सी चाय की दुकान के भीतर फंदे से लटका मिला।

पुलिस प्रथम दृष्टया इसे आत्महत्या का मामला मानकर जांच कर रही है। घटनास्थल से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। कोली की पहचान वहां मिले पहचान पत्र और तस्वीर के आधार पर की गई। पुलिस ने उसके परिजनों को सूचना देने के साथ ही शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा है। उसकी मौत के वास्तविक कारणों को लेकर जांच जारी है। निठारी कांड की एक पीड़िता के पिता ने आत्महत्या की बात पर संदेह जताते हुए मौत की विस्तृत जांच की मांग की है।

हरिद्वार में चाय बेचकर शुरू किया था नया जीवन

53 वर्षीय सुरेंद्र कोली पिछले कुछ समय से हरिद्वार में रह रहा था। वह सप्त सरोवर रोड पर लाल माता मंदिर के आसपास भूपतवाला क्षेत्र में किराये के एक छोटे खोखे में चाय बेच रहा था। बताया गया है कि उसने यह काम हाल में ही शुरू किया था। शुक्रवार सुबह दुकान नहीं खुलने पर आसपास के लोगों को संदेह हुआ। भीतर देखने पर उसका शव फंदे से लटका दिखाई दिया, जिसके बाद पुलिस को सूचना दी गई।

करीब दो दशक तक देश के सर्वाधिक चर्चित आपराधिक मामलों में से एक का चेहरा रहे कोली के जीवन में यह असाधारण बदलाव था। जिस व्यक्ति को कभी 13 अलग-अलग मुकदमों में मौत की सजा सुनाई गई थी, वही लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद सभी मामलों से बरी होकर सामान्य जीवन शुरू करने का प्रयास कर रहा था।

2006 में सामने आया था निठारी कांड

निठारी कांड दिसम्बर 2006 में उस समय सामने आया था, जब नोएडा के सेक्टर-31 स्थित डी-5 कोठी के पीछे नाले और आसपास से मानव अवशेष मिलने शुरू हुए। यह मकान कारोबारी मोनिंदर सिंह पंढेर का था और सुरेंद्र कोली वहां घरेलू सहायक के रूप में काम करता था।

इलाके से कई बच्चों और युवतियों के लापता होने की शिकायतें पहले से थीं। मानव अवशेष मिलने के बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आ गया। कोली और पंढेर को 29 दिसम्बर 2006 को गिरफ्तार किया गया। बाद में जांच सीबीआई को सौंप दी गई।

अलग-अलग पीड़ितों के संबंध में कई मुकदमे चले। अभियोजन का मामला मुख्य रूप से कोली के कथित इकबालिया बयान और उसकी निशानदेही पर मानव अवशेष तथा अन्य वस्तुएं बरामद किए जाने के दावों पर आधारित था।

एक के बाद एक मिलीं मौत की सजाएं

फरवरी 2009 में 14 वर्षीय रिम्पा हलदर से जुड़े मामले में निचली अदालत ने कोली को दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। इसके बाद अन्य मामलों में भी उसे दोषी ठहराया गया और कुल 13 मामलों में उसे मौत की सजा मिली।

2011 में सुप्रीम कोर्ट ने रिम्पा हलदर मामले में उसकी दोषसिद्धि और मौत की सजा बरकरार रखी थी। उसकी दया याचिकाएं भी खारिज हो गईं और 2014 में उसकी फांसी की तैयारियां तक हो गई थीं। अंतिम समय में कानूनी हस्तक्षेप के बाद फांसी रुक गई। जनवरी 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अत्यधिक विलंब के आधार पर उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।

2023 में पलटने लगी पूरी कानूनी तस्वीर

निठारी मामलों में बड़ा मोड़ 16 अक्टूबर 2023 को आया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 मामलों में सुरेंद्र कोली को बरी करते हुए उसकी मौत की सजाएं रद्द कर दीं। अदालत ने अभियोजन के प्रमुख साक्ष्यों, विशेषकर कथित इकबालिया बयान और बरामदगी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए।

हाईकोर्ट ने पाया कि कोली लंबे समय तक पुलिस हिरासत में रहा था और कथित स्वीकारोक्ति को स्वैच्छिक तथा विश्वसनीय मानने में कानूनी कठिनाइयां थीं। अदालत ने कथित निशानदेही पर हुई बरामदगी के संबंध में भी कहा कि जिस स्थान से मानव अवशेष मिले थे, उसके बारे में पुलिस और आम लोगों को पहले से जानकारी थी तथा वह स्थान कोली के विशेष नियंत्रण में नहीं था।

उत्तर प्रदेश सरकार और सीबीआई ने इन फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें खारिज कर दीं। इस तरह 12 मामलों में कोली की रिहाई का फैसला अंतिम हो गया।

फिर भी एक मामले में जेल में था कोली

इसके बावजूद एक विचित्र कानूनी स्थिति बनी रही। जिन 12 मामलों में लगभग समान प्रकृति के साक्ष्यों को अदालत ने अविश्वसनीय मानते हुए कोली को बरी कर दिया था, उन्हीं से जुड़े रिम्पा हलदर मामले में उसकी पुरानी दोषसिद्धि कायम थी। इसी कारण वह जेल से बाहर नहीं आ सका।

कोली ने इस विसंगति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में उपचारात्मक याचिका दायर की। 11 नवम्बर 2025 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि समान साक्ष्य के आधार पर एक तरफ 12 मामलों में बरी किया जाना और दूसरी ओर एक मामले में दोषसिद्धि कायम रहना न्यायिक रूप से असंगत स्थिति पैदा करता है। अदालत ने 2011 का अपना पुराना फैसला वापस लेते हुए अंतिम मामले में भी कोली को बरी कर दिया और उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।

इसके दो दिन बाद, 13 नवम्बर 2025 को सुरेंद्र कोली ग्रेटर नोएडा की कासना जेल से बाहर आया। तब तक वह करीब 19 वर्ष जेल में गुजार चुका था।

सुप्रीम कोर्ट ने जांच पर भी की थी गंभीर टिप्पणी

अंतिम फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि सुप्रीम कोर्ट ने निठारी मामले की जांच की गुणवत्ता पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। अदालत ने कहा था कि लंबी जांच के बावजूद वास्तविक अपराधी की पहचान कानूनी कसौटियों पर स्थापित न हो पाना गहरे खेद का विषय है।

इस प्रकार कोली का बरी होना इस निष्कर्ष पर आधारित नहीं था कि निठारी में अपराध हुए ही नहीं थे। बच्चों और महिलाओं के गायब होने तथा मानव अवशेष मिलने की भयावह घटनाएं वास्तविक थीं। अदालत के सामने प्रश्न यह था कि उपलब्ध साक्ष्य कानूनी मानकों के अनुसार सुरेंद्र कोली को उन अपराधों का दोषी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय थे या नहीं। अंततः अदालतों ने माना कि अभियोजन इसे आवश्यक कानूनी स्तर तक सिद्ध नहीं कर पाया।

निठारी पीड़ित परिवारों का दर्द अब भी कायम

कोली के बरी होने के बाद भी निठारी के पीड़ित परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल अनुत्तरित रहा—यदि अदालत में पेश साक्ष्य दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं थे तो उन बच्चों और युवतियों के साथ हुए अपराधों के लिए जिम्मेदार कौन था?

अब कोली की अचानक मौत ने इस लगभग दो दशक पुराने प्रकरण को फिर चर्चा में ला दिया है। एक पीड़िता के पिता झब्बू लाल ने कोली की मौत को आत्महत्या मानने पर सवाल उठाया है और हत्या की आशंका व्यक्त की है। यह फिलहाल उनका आरोप है; पुलिस ने इसकी पुष्टि नहीं की है।

हरिद्वार पुलिस के सामने अब यह पता लगाने की जिम्मेदारी है कि जेल से रिहाई के बाद कोली किन परिस्थितियों में रह रहा था, उसकी आर्थिक और पारिवारिक स्थिति क्या थी, घटना से पहले वह किन लोगों के संपर्क में था और उसकी मौत के पीछे कोई अन्य परिस्थिति तो नहीं थी।

करीब बीस वर्ष पहले निठारी के एक नाले से मिले मानव अवशेषों ने जिस कहानी की शुरुआत की थी, उसने भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था के सामने जांच, स्वीकारोक्ति, वैज्ञानिक साक्ष्य, मृत्युदंड और निष्पक्ष सुनवाई से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े किए। 13 बार मौत की सजा पाने, फांसी के करीब पहुंचने, लगभग 19 वर्ष जेल में रहने और अंततः सभी मामलों से बरी होने के बाद सुरेंद्र कोली की हरिद्वार में हुई मौत ने उस कहानी में एक और असाधारण अध्याय जोड़ दिया है।

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