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वायरस कहां छिपे रहते हैं, यह जानना क्यों जरूरी है

प्रकोप खत्म होने के बाद कुछ वायरस गायब होते दिखते हैं और वर्षों बाद फिर सामने आ जाते हैं। वे इस बीच किन जीवों में मौजूद रहते हैं, इसका पता लगाना अगली महामारी रोकने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है।

 

-डेविड क्वामेन द्वारा-

डेविड क्वामेन विज्ञान पत्रकार और 19 पुस्तकों के लेखक हैं। उनकी पुस्तकों में कोविड-19 की उत्पत्ति और विकास पर केंद्रित ब्रेथलेस और कैंसर को विकासवादी परिघटना के रूप में देखने वाली आगामी पुस्तक डेविल ऑन द रन शामिल हैं। यह विकास और बीमारी पर आधारित उनकी नई श्रृंखला डिजीज स्टेट्स का पहला आलेख है।

हर चीज कहीं न कहीं से आती है। मनुष्यों के लिए खतरनाक बनने वाले अनेक नए वायरस भी प्रायः किसी पशु स्रोत से आते हैं।

मानव इन्फ्लूएंजा के कई वायरसों का प्राकृतिक भंडार जंगली जलपक्षियों में मिलता है। हंतावायरस विभिन्न कृंतकों से जुड़े हैं। एमपॉक्स वायरस का प्राकृतिक स्रोत पूरी तरह निश्चित नहीं है, लेकिन अफ्रीकी कृंतकों को इसका संभावित प्रमुख भंडार माना जाता है। महामारी पैदा करने वाला एचआईवी-1 भी अंततः मध्य अफ्रीका के चिंपैंजियों में पाए जाने वाले संबंधित वायरस से मनुष्यों तक पहुंचा।

इसका एक बुनियादी जैविक कारण है। वायरस स्वतंत्र रूप से अपनी प्रतियां नहीं बना सकते। उन्हें अपनी संख्या बढ़ाने के लिए किसी जीवित कोशिका की आवश्यकता होती है। मनुष्य स्वयं भी प्राणी जगत का हिस्सा हैं, इसलिए दूसरे जानवरों में मौजूद कुछ वायरस विकासक्रम में बदलाव के बाद मनुष्यों को संक्रमित करने की क्षमता हासिल कर सकते हैं।

यह संबंध इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया को लगातार नए और दोबारा उभरते वायरसों का सामना करना पड़ रहा है। किसी वायरस के पशु स्रोत की पहचान हो जाए तो वैज्ञानिक यह समझने के करीब पहुंच सकते हैं कि वह मनुष्यों तक कैसे और किन परिस्थितियों में पहुंचा। यही जानकारी भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की रणनीति बनाने में मदद कर सकती है।

निपाह ने बताया कैसे जानवर से मनुष्य तक पहुंचता है वायरस

इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण निपाह वायरस है। 1998 में मलेशिया में एक नया वायरस लोगों को गंभीर रूप से बीमार करने लगा। प्रभावित लोगों में बड़ी संख्या सुअर पालन से जुड़े लोगों की थी। बाद में वैज्ञानिक जांच ने फल खाने वाले चमगादड़ों, सुअरों और मनुष्यों के बीच संक्रमण की एक महत्वपूर्ण कड़ी की ओर संकेत किया।

बड़े सुअर फार्मों के आसपास लगाए गए फलदार पेड़ चमगादड़ों को आकर्षित करते थे। चमगादड़ों द्वारा खाए गए फल या उनके अवशेष नीचे गिरते और सुअर उनके संपर्क में आते। इस तरह वायरस चमगादड़ों से सुअरों और फिर सुअरों के निकट संपर्क में रहने वाले मनुष्यों तक पहुंच सकता था।

जंगलों की कटाई और चमगादड़ों के प्राकृतिक आवास में बदलाव ने भी इस संपर्क को बढ़ाने में भूमिका निभाई। इस अनुभव ने एक महत्वपूर्ण सबक दिया—कई बार महामारी रोकने का रास्ता वायरस के विरुद्ध दवा खोजने से पहले उन परिस्थितियों को बदलने में छिपा होता है, जो वन्यजीव, पालतू पशु और मनुष्य को अस्वाभाविक रूप से करीब ले आती हैं।

लेकिन इबोला आखिर रहता कहां है?

इसी बिंदु पर इबोला वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी पहेली बन जाता है। पिछले लगभग 50 वर्षों में इबोला समूह के वायरसों ने मध्य और पश्चिमी अफ्रीका में अनेक प्रकोप पैदा किए हैं। आम धारणा यह रही है कि इनका प्राकृतिक भंडार चमगादड़ों में हो सकता है। कई वैज्ञानिक संकेत इस संभावना का समर्थन करते हैं, लेकिन किसी निश्चित पशु प्रजाति को इबोला वायरस का प्राकृतिक भंडार साबित करने के लिए आवश्यक निर्णायक प्रमाण अभी भी अधूरे हैं।

मनुष्यों में बीमारी पैदा करने वाले इबोलावायरस समूह में कई अलग-अलग वायरस शामिल हैं। इनमें इबोला वायरस, सूडान वायरस, बुंदीबुग्यो वायरस और ताई फॉरेस्ट वायरस प्रमुख हैं। रेस्टन वायरस भी इसी समूह का सदस्य है, लेकिन इससे मनुष्यों में गंभीर बीमारी प्रमाणित नहीं हुई है।

जिस जीव में कोई वायरस लंबे समय तक प्राकृतिक रूप से बना रह सकता है और अक्सर उस जीव को गंभीर बीमारी भी नहीं होती, उसे वैज्ञानिक भाषा में ‘रिजर्वायर होस्ट’ यानी प्राकृतिक भंडार या आश्रयदाता जीव कहा जाता है। जब वायरस इस जीव से प्रजाति की सीमा पार करके मनुष्य में पहुंचता है, तो इसे ‘स्पिलओवर’ कहा जाता है। इसके बाद वायरस यदि मनुष्य के शरीर के अनुकूल हो जाए और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलने की क्षमता हासिल कर ले, तो स्थानीय संक्रमण बड़े प्रकोप में बदल सकता है। इसलिए महामारी विज्ञान के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवालों में एक है—जब कोई वायरस मनुष्यों को संक्रमित नहीं कर रहा होता, तब वह प्रकृति में कहां मौजूद रहता है?

आधी सदी बाद भी कायम है रहस्य

किसी जीव को वायरस का वास्तविक प्राकृतिक भंडार सिद्ध करने के लिए सबसे मजबूत प्रमाण यह होगा कि स्वस्थ दिखाई देने वाले उस जीव से सक्रिय और संक्रामक वायरस अलग किया जाए और यह दिखाया जाए कि वायरस उस प्रजाति में प्राकृतिक रूप से बना रहता है।

इबोला को लेकर दशकों के अनुसंधान के बावजूद यह पहेली पूरी तरह नहीं सुलझी है। चमगादड़ों में इबोला वायरस से संबंधित आनुवंशिक या प्रतिरक्षात्मक संकेत मिले हैं और इसलिए वे प्रमुख संदिग्ध हैं, लेकिन निर्णायक तस्वीर अभी अधूरी है।

पहला ज्ञात इबोला प्रकोप 1976 में तत्कालीन जायरे, आज के कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, में सामने आया। उस प्रकोप में 318 मामले दर्ज हुए और 280 लोगों की मृत्यु हुई। करीब 11 सप्ताह बाद प्रकोप समाप्त हो गया। लेकिन वायरस खत्म नहीं हुआ था। यही सबसे दिलचस्प सवाल है। मनुष्यों में संक्रमण समाप्त होने के बाद वायरस गया कहां?

संभावना यही है कि वह प्रकृति में अपने मूल पशु आश्रय में मौजूद रहा। लेकिन वह पशु कौन था, इसका उत्तर तब भी नहीं मिला था और आज भी पूरी निश्चितता से उपलब्ध नहीं है।

एक वर्ष बाद इबोला फिर सामने आया और नौ वर्षीय बच्ची की मृत्यु हुई। उसके बाद लंबे समय तक कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया। फिर 1990 के दशक में गैबॉन सहित मध्य अफ्रीका के वन क्षेत्रों में नए प्रकोप हुए।

कुछ घटनाओं में मृत चिंपैंजी, गोरिल्ला या दूसरे जंगली जानवरों के संपर्क को संक्रमण से जोड़ा गया। लेकिन इससे ये जीव वायरस के मूल प्राकृतिक भंडार साबित नहीं होते। उलटे गोरिल्ला और चिंपैंजी स्वयं इबोला से गंभीर रूप से बीमार होकर मर सकते हैं। इसलिए वे वायरस के स्थायी प्राकृतिक आश्रय की अपेक्षा बीच की संक्रमण कड़ी हो सकते हैं। मध्य अफ्रीका में इबोला से बड़ी संख्या में गोरिल्ला और चिंपैंजी की मौत के प्रमाण मिले हैं। इसका अर्थ है कि वायरस उनके लिए भी घातक है।

प्राकृतिक भंडार मिल जाए तो बदल सकती है रोकथाम

यदि वैज्ञानिक निश्चित रूप से पता लगा लें कि इबोला वायरस प्रकृति में मुख्यतः किस जीव में रहता है, तो इस जानकारी का सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बहुत बड़ा महत्व होगा। उस जीव के शिकार, व्यापार, मांस के उपयोग और मनुष्यों से संपर्क के जोखिम को कम किया जा सकता है। जिन इलाकों में वह जीव अधिक पाया जाता है, वहां विशेष निगरानी की जा सकती है। स्थानीय समुदायों को यह बताया जा सकता है कि किन परिस्थितियों में संक्रमण का खतरा बढ़ता है। इससे किसी नए प्रकोप के पहले रोगी तक संक्रमण पहुंचने की कड़ी को समझना भी आसान होगा। वैज्ञानिक जान सकेंगे कि मनुष्य, वन्यजीव और पर्यावरण के बीच कौन-सा संपर्क वायरस को प्रजाति की सीमा पार करने का अवसर दे रहा है।

यह जानकारी केवल इबोला के लिए महत्वपूर्ण नहीं है। कोविड-19 महामारी ने भी दिखाया कि वायरस मनुष्य और पशुओं के बीच किस तरह नई पारिस्थितिक कड़ियां बना सकते हैं। सार्स-कोव-2 मनुष्यों से अमेरिका के सफेद पूंछ वाले हिरणों में पहुंच चुका है और वहां व्यापक रूप से फैलने के प्रमाण मिले हैं।

जंगलों में बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप भी खतरा

वायरस स्वयं मनुष्य की खोज में जंगल से बाहर नहीं निकलते। संक्रमण के लिए संपर्क जरूरी है। समस्या तब बढ़ती है जब जंगल कटते हैं, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सिकुड़ते हैं, जंगली जानवरों का शिकार और व्यापार बढ़ता है या पशुपालन और खेती वन्यजीव आवासों के भीतर तक पहुंच जाती है। ऐसी परिस्थितियां मनुष्य, पालतू पशुओं और वन्यजीवों के बीच उन संपर्कों को बढ़ाती हैं जो पहले बहुत कम होते थे। प्रत्येक नया संपर्क किसी वायरस को प्रजाति की सीमा पार करने का अवसर दे सकता है। इसीलिए भविष्य की महामारियों से बचाव केवल अस्पतालों, टीकों और दवाओं का विषय नहीं है। जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा भी सार्वजनिक स्वास्थ्य की पहली सुरक्षा पंक्तियों में शामिल है।

इबोला जैसे वायरस किसी प्रकोप के समाप्त होते ही प्रकृति से समाप्त नहीं हो जाते। वे संभवतः अपने प्राकृतिक आश्रयदाता जीवों में मौजूद रहते हैं और अनुकूल अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। यदि मनुष्य उन जीवों और उनके आवासों के साथ अनावश्यक हस्तक्षेप कम करे, वन्यजीवों के शिकार और व्यापार को नियंत्रित करे तथा जंगलों के विनाश को रोके, तो वायरस के मनुष्य तक पहुंचने के अवसर भी कम किए जा सकते हैं।

यही इस वैज्ञानिक रहस्य का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है—अगली महामारी को रोकने के लिए यह जानना जरूरी है कि वायरस मनुष्यों में आने से पहले कहां और किन जीवों में मौजूद रहते हैं।

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