योजनाओं को ‘फाइल से फील्ड’ तक पहुंचाने में मजबूत सेतु बने हिंदी पत्रकारिता: सुधा श्रीमाली
केवल शब्दों का अनुवाद नहीं, सरकारी योजनाओं की मूल भावना और लाभ आम जन तक पहुंचाना जरूरी; ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प में हिंदी और डिजिटल मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका

रायपुर/मुंबई, 28 सितंबर 2026। किसी भी सरकारी योजना की घोषणा भर से उसका उद्देश्य पूरा नहीं होता। उसका वास्तविक प्रभाव तब दिखाई देता है, जब योजना की सही और पूरी जानकारी समाज के अंतिम छोर पर खड़े पात्र लाभार्थी तक पहुंचती है। सरकारी फाइलों और दस्तावेजों की जटिल भाषा को आम आदमी की समझ में आने वाली सरल और सहज भाषा में बदलकर सही संदर्भ के साथ जनता तक पहुंचाना ही योजनाओं की ‘फाइल से फील्ड’, यानी कागज से धरातल तक की यात्रा को पूरा करता है। इस पूरी प्रक्रिया में हिंदी पत्रकारिता सरकार, योजनाओं और आम नागरिकों के बीच एक अत्यंत प्रभावी सेतु की भूमिका निभा सकती है।
यह विचार ‘नवभारत टाइम्स’ की बिजनेस एडिटर सुधा श्रीमाली ने हिंदी माह के अवसर पर आयोजित एक विशेष व्याख्यान में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं और नीतियों की जानकारी जनता तक पहुंचाने में भाषा की भूमिका केवल संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को उनके अधिकारों, अवसरों और उपलब्ध सुविधाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी), मुंबई द्वारा महानिदेशक (पश्चिम क्षेत्र) स्मिता वत्स शर्मा के मार्गदर्शन में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत में अपर महानिदेशक सिद्धार्थ बोडके ने मुख्य वक्ता सुधा श्रीमाली का स्वागत और अभिनंदन किया। कार्यक्रम में पश्चिम क्षेत्र के पत्र सूचना कार्यालय और केंद्रीय संचार ब्यूरो के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
अनुवाद भर नहीं, आम नागरिक के सवालों का जवाब दे पत्रकारिता
‘सरकारी योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका—विकसित भारत 2047 के संदर्भ में’ विषय पर बोलते हुए सुधा श्रीमाली ने कहा कि सरकारी सूचनाओं को हिंदी में प्रस्तुत करने का अर्थ केवल अंग्रेजी के शब्दों का हिंदी में अनुवाद करना नहीं है। सूचना के पीछे निहित उद्देश्य, उसकी मूल भावना, संदर्भ और आम नागरिक के लिए उसकी उपयोगिता को समझकर उसे सरल भाषा में प्रस्तुत करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि जब किसी योजना से संबंधित सही जानकारी सरल, स्पष्ट और उपयोगी रूप में लोगों तक पहुंचती है, तभी वह केवल ‘सूचना’ न रहकर ‘जनभागीदारी’ का माध्यम बनती है। योजनाओं की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि संभावित लाभार्थी उनके बारे में कितना जानता है और उसे आवेदन से लेकर लाभ प्राप्त करने तक की प्रक्रिया कितनी स्पष्टता से समझाई गई है।
श्रीमाली ने प्रधानमंत्री स्ट्रीट वेंडर्स आत्मनिर्भर निधि (पीएम स्वनिधि) योजना का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी भी योजना की घोषणा होते ही आम नागरिक के मन में कुछ स्वाभाविक और बुनियादी सवाल उठते हैं। मसलन, यह योजना आखिर है क्या, इसका लाभ किसे मिलेगा, इसके लिए पात्रता की शर्तें क्या हैं, आवेदन कैसे किया जाएगा, किन दस्तावेजों की जरूरत होगी और लाभार्थी वास्तव में इसका लाभ कैसे प्राप्त कर सकेगा?
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की जिम्मेदारी केवल योजना की घोषणा की खबर प्रकाशित कर देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे इन बुनियादी सवालों के सीधे, सरल और स्पष्ट उत्तर भी पाठकों तक पहुंचाने चाहिए। समाचार का शीर्षक, उसकी शुरुआत और पूरी प्रस्तुति ऐसी होनी चाहिए कि पाठक एक नजर में समझ सके कि संबंधित योजना उसके लिए उपयोगी है या नहीं और यदि उपयोगी है तो उसका लाभ लेने के लिए उसे क्या करना होगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी योजनाओं से संबंधित पत्रकारिता का उद्देश्य उनका महिमामंडन करना नहीं, बल्कि उनकी मूल भावना, प्रावधानों और संभावित लाभ को सरल एवं तथ्यपरक भाषा में जनता तक पहुंचाना होना चाहिए। इसी से पत्रकारिता अपनी उपयोगिता और विश्वसनीयता दोनों बनाए रख सकती है।
बदलते मीडिया परिदृश्य में विश्वसनीयता सबसे बड़ी पूंजी
सुधा श्रीमाली ने तेजी से बदल रहे मीडिया परिदृश्य का उल्लेख करते हुए कहा कि आज सूचना पहुंचाने के माध्यमों में व्यापक बदलाव आया है। अखबारों और पारंपरिक माध्यमों के साथ श्रव्य कार्यक्रमों, सामाजिक माध्यमों और डिजिटल मंचों ने सरकारी नीतियों एवं योजनाओं की पहुंच को पहले से कहीं अधिक व्यापक और त्वरित बना दिया है।
लेकिन सूचनाओं की इस तेज रफ्तार के साथ भ्रामक खबरों, अधूरी सूचनाओं और अफवाहों की चुनौती भी बढ़ी है। ऐसे समय में पत्रकारिता के सामने अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने की जिम्मेदारी पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। किसी सूचना को सबसे पहले पहुंचाने की होड़ के बजाय उसका सत्यापन और सही संदर्भ में प्रस्तुतीकरण अधिक महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों की व्यापक पहुंच का लाभ सरकारी योजनाओं की जानकारी समाज के उन वर्गों तक पहुंचाने में भी लिया जा सकता है, जो परंपरागत समाचार माध्यमों से सीधे नहीं जुड़े हैं। लेकिन माध्यम चाहे कोई भी हो, सूचना की सत्यता और विश्वसनीयता से समझौता नहीं किया जा सकता।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता को चुनौती नहीं, सहायक साधन के रूप में देखें
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के तेजी से बढ़ते उपयोग का उल्लेख करते हुए श्रीमाली ने कहा कि पत्रकारों को इसे केवल चुनौती के रूप में देखने के बजाय अपने काम को अधिक प्रभावी बनाने वाले सहायक साधन के रूप में अपनाना चाहिए। नई तकनीक बड़ी मात्रा में उपलब्ध सूचनाओं के विश्लेषण, वर्गीकरण और प्रसार को आसान बना सकती है तथा पत्रकारों के समय और श्रम की बचत कर सकती है।
हालांकि उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि तकनीक चाहे कितनी भी विकसित क्यों न हो जाए, सूचना की सत्यता, संदर्भ और विश्वसनीयता की अंतिम जिम्मेदारी पत्रकारिता की ही रहेगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पत्रकार की सहायता कर सकती है, लेकिन तथ्य-जांच, संपादकीय विवेक और जनता के प्रति जवाबदेही का स्थान नहीं ले सकती।
सूचना का प्रवाह एकतरफा नहीं, दोतरफा होना जरूरी
सुधा श्रीमाली ने कहा कि सरकारी सूचना का प्रवाह केवल सरकार से मीडिया और मीडिया से जनता तक जाने वाली एकतरफा प्रक्रिया नहीं होना चाहिए। मीडिया का एक महत्वपूर्ण दायित्व जनता के अनुभवों, सवालों, समस्याओं और प्रतिक्रियाओं को सरकार और संबंधित संस्थाओं तक वापस पहुंचाना भी है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के माध्यम से सामने आने वाले जमीनी अनुभव नीति-निर्माताओं और सरकारी संचार तंत्र के लिए महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया का काम कर सकते हैं। इस दृष्टि से पत्र सूचना कार्यालय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। वह न केवल सरकारी सूचनाओं को मीडिया तक पहुंचाने का माध्यम है, बल्कि पत्रकारों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आधार पर सूचना के अंतर को पहचानने और उसे दूर करने में भी प्रभावी भूमिका निभा सकता है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी योजना के संबंध में बार-बार एक जैसे सवाल सामने आ रहे हैं तो यह संकेत है कि उससे जुड़ी जानकारी में कहीं न कहीं स्पष्टता का अभाव है। ऐसे अंतर को पहचानकर सरल और अधिक उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराना सरकारी संचार व्यवस्था और मीडिया, दोनों के लिए जरूरी है।
‘विकसित भारत 2047’ को जनभागीदारी से जोड़ सकती है हिंदी
‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प का उल्लेख करते हुए श्रीमाली ने कहा कि इतने व्यापक राष्ट्रीय लक्ष्य को केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके लिए समाज की सक्रिय भागीदारी जरूरी है और जनभागीदारी के लिए लोगों तक उनकी अपनी समझ की भाषा में सही जानकारी पहुंचनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि हिंदी की व्यापक पहुंच और डिजिटल मीडिया के तेजी से हो रहे विस्तार के कारण विकास योजनाओं, नीतियों और अवसरों की जानकारी बड़ी आबादी तक पहुंचाई जा सकती है। यदि सूचनाओं को सरल, तथ्यपरक और नागरिकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया जाए तो हिंदी पत्रकारिता ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
दूर-दराज के पत्रकारों के लिए सूचनाओं को सरल बना रहा पीआईबी: स्मिता वत्स शर्मा
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीआईबी पश्चिम क्षेत्र की महानिदेशक स्मिता वत्स शर्मा ने कहा कि आज के डिजिटल युग में सूचनाओं की भरमार है। हर क्षण बड़ी मात्रा में आंकड़े, तथ्य और सामग्री सामने आ रही है। ऐसे में पत्रकारों के लिए उपयोगी और प्रमाणिक सूचना को व्यवस्थित तथा सरल रूप में उपलब्ध कराना बेहद जरूरी हो गया है।
उन्होंने कहा, “आज के डिजिटल युग में सूचनाओं की भरमार है। इसलिए हमारा निरंतर प्रयास रहता है कि पत्रकारों के लिए आंकड़ों और सूचनाओं को व्यवस्थित कर उन्हें अत्यंत सरल और उपयोगी रूप में प्रस्तुत किया जाए।”
उन्होंने बताया कि पत्रकारों की सुविधा के लिए प्रेस विज्ञप्तियों के साथ ‘पीआईबी बैकग्राउंडर’, यानी विषय की पृष्ठभूमि से जुड़ी विस्तृत सामग्री भी उपलब्ध कराई जाती है। इससे किसी योजना, नीति या सरकारी निर्णय को उसके व्यापक संदर्भ में समझने में मदद मिलती है।
स्मिता वत्स शर्मा ने कहा कि तस्वीरों के साथ विस्तृत विवरण भी दिया जा रहा है, ताकि दूर-दराज के क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकार विषय की पृष्ठभूमि और महत्व को आसानी से समझ सकें। इसके अतिरिक्त विषय की समग्र समझ सुनिश्चित करने के लिए विज्ञप्तियों के साथ सामाजिक माध्यमों और सीधे प्रसारण से जुड़े संपर्क-सूत्र भी साझा किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि पीआईबी का प्रयास केवल अधिक से अधिक सूचना उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि सूचना को इस तरह व्यवस्थित करना भी है कि पत्रकार कम समय में किसी विषय के महत्वपूर्ण पहलुओं को समझ सकें और उसे अपने पाठकों तथा दर्शकों तक सही संदर्भ में पहुंचा सकें।
हिंदी माह के अवसर पर आयोजित इस विशेष ऑनलाइन व्याख्यान में पश्चिम क्षेत्र के पत्र सूचना कार्यालय और केंद्रीय संचार ब्यूरो के अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम में सरकारी संचार, हिंदी पत्रकारिता, डिजिटल माध्यमों की बढ़ती भूमिका और नई तकनीक के उपयोग सहित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम के समापन पर पीआईबी भोपाल के निदेशक मनीष गौतम ने मुख्य वक्ता सुधा श्रीमाली तथा सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस तरह के संवाद सरकारी सूचनाओं को अधिक सरल, प्रभावी और जनोपयोगी बनाने के साथ ही मीडिया तथा सरकारी संचार संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में सहायक होते हैं।
