गांधी की हत्या के बाद कैसे संभाला गया प्रतिशोध का उबाल
This article reconstructs the turbulent aftermath of Mahatma Gandhi’s assassination on January 30, 1948, primarily through contemporary official records. Its documentary basis includes the Government of India’s Press Information Bureau communiqué of February 1 containing Home Minister Sardar Vallabhbhai Patel’s appeal against retaliatory attacks on Hindu Mahasabha and RSS members and offices, and the Home Ministry resolutions published in the Gazette of India Extraordinary on February 2, 1948. It also examines the Government communiqué of February 4 banning the RSS. Together, these records reveal the government’s simultaneous response to retaliatory violence, communal hatred and threats to public order.
हिंदू महासभा और संघ के सदस्यों व कार्यालयों पर हमले, पटेल की शांति की अपील और फिर संघ पर प्रतिबंध

—जयसिंह रावत
महात्मा गांधी की 30 जनवरी 1948 को हुई हत्या भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में एक थी, लेकिन हत्या के तत्काल बाद देश में जो कुछ हुआ, उसका एक महत्वपूर्ण पक्ष अपेक्षाकृत कम चर्चा में आता है। गांधी की हत्या की खबर फैलते ही शोक के साथ जबरदस्त जनाक्रोश भी भड़का और कुछ स्थानों पर हिंदू महासभा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े लोगों और उनके कार्यालयों को निशाना बनाया जाने लगा। अहिंसा के सबसे बड़े प्रवक्ता की हत्या के बाद पैदा हुई प्रतिशोध की इस हिंसा ने सरकार के सामने विचित्र और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी। एक ओर हत्या और उसके पीछे संभावित षड्यंत्र की जांच करनी थी, दूसरी ओर आक्रोशित भीड़ को कानून हाथ में लेने से रोकना था। इस घटनाक्रम की पुष्टि बाद की राजनीतिक व्याख्याओं से नहीं, बल्कि 1 और 2 फरवरी 1948 के भारत सरकार के मूल दस्तावेजों—प्रेस सूचना ब्यूरो की विज्ञप्तियों और भारत के असाधारण राजपत्र में प्रकाशित गृह मंत्रालय के प्रस्तावों—से होती है। इनके साथ 4 फरवरी को जारी सरकारी वक्तव्य जोड़ने पर गांधी की हत्या के बाद के शुरुआती दिनों की तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है।

हिंदू महासभा और संघ के सदस्यों व कार्यालयों पर हमले
30 जनवरी की शाम पांच बजे के कुछ समय बाद नई दिल्ली में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गांधी की हत्या कर दी गई। विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा से पहले ही आहत देश के लिए यह खबर विस्फोटक थी। इसका असर कितनी तेजी से हुआ, इसका सबसे प्रामाणिक प्रमाण 1 फरवरी 1948 को तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा जारी अपील में मिलता है।
भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो की उस मूल विज्ञप्ति में पटेल ने कहा कि उन्हें यह जानकर बहुत दुख हुआ है कि विशेष रूप से बंबई प्रांत और कोल्हापुर रियासत में कुछ लोगों ने हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों तथा उनके कार्यालयों के विरुद्ध हिंसक कार्रवाइयां की हैं। दिल्ली में भी कुछ छोटी घटनाओं की सूचना मिली थी।
इस उल्लेख का महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि यह घटना के दशकों बाद लिखा गया विवरण नहीं, बल्कि हत्या के केवल दो दिन बाद देश के गृहमंत्री की आधिकारिक अपील में दर्ज तथ्य है।
लेकिन पटेल ने इन हमलों की निंदा करते हुए हत्या की जांच को कमजोर करने की बात नहीं कही। इसके उलट उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार इस जघन्य अपराध के दोषियों को कानून के सामने लाने की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह परिचित है और हत्या से पहले यदि कोई षड्यंत्र था तो उसे उजागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। साथ ही उन्होंने जनता से कहा कि यह काम सरकार पर छोड़ा जाए और गंभीर से गंभीर उत्तेजना में भी लोग कानून अपने हाथ में न लें।
पटेल की अपील का सबसे विचारोत्तेजक हिस्सा गांधी की शिक्षाओं से जुड़ा था। उनका कहना था कि यदि लोग क्रोध और प्रतिशोध की भावना के आगे झुकेंगे तो वे गांधी की शिक्षाओं और उनके विश्वास के योग्य नहीं रहेंगे। उन्होंने सभी वर्गों से शांत रहने, सामान्य कार्यों की ओर लौटने और कानून को अपना काम करने देने की अपील की। निजी बदले और हिंसक उन्माद को उन्होंने गांधी की जीवन भर की शिक्षाओं के सर्वथा विपरीत बताया।
यही उस समय का सबसे बड़ा विरोधाभास था—अहिंसा के सबसे बड़े प्रतीक की हत्या के बाद उनके नाम पर भी प्रतिशोध की हिंसा भड़क रही थी और उसे रोकने के लिए पटेल को देश से शांति की अपील करनी पड़ रही थी।
दो फरवरी : सरकार ने तय की कार्रवाई की दिशा
इसके अगले दिन, 2 फरवरी 1948 को भारत सरकार ने असाधारण राजपत्र में दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव प्रकाशित किए। पहले प्रस्ताव में गांधी को राष्ट्रपिता, अहिंसा का संदेशवाहक, शांति का दूत, स्वतंत्रता का महान सेनानी और गरीब तथा उत्पीड़ित लोगों का हितैषी बताते हुए याद किया गया कि उनका अंतिम बड़ा प्रयास भारत में शांति और सद्भाव स्थापित करना था। इसी उद्देश्य से किए गए अपने अंतिम उपवास को उन्होंने 18 जनवरी को लोगों की ओर से शांति बनाए रखने का गंभीर आश्वासन मिलने के बाद समाप्त किया था।
सरकार ने गांधी के जीवन को मनुष्य और मनुष्य के बीच न्याय तथा सहिष्णुता के लिए लंबे संघर्ष के रूप में देखा और देशवासियों से सत्य तथा सहिष्णुता के रास्ते पर चलने का आह्वान किया।
उसी असाधारण राजपत्र का दूसरा प्रस्ताव तत्कालीन परिस्थितियों को समझने के लिए और महत्वपूर्ण है। सरकार ने गांधी की हत्या को देश में सक्रिय घृणा और हिंसा की शक्तियों की गंभीर और तात्कालिक चेतावनी बताया। उसका कहना था कि ऐसी शक्तियां राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए खतरा हैं और उन्हें तेजी से नियंत्रित कर जड़ से समाप्त करना आवश्यक है।
लेकिन सरकार ने यहां भी दो बातें साथ-साथ कहीं। वह दृढ़ता और न्याय के साथ कार्रवाई करेगी, पर जनता स्वयं कानून हाथ में नहीं लेगी। साथ ही स्पष्ट घोषणा की गई कि हिंसा या सांप्रदायिक घृणा का प्रचार करने वाले संगठनों को सहन नहीं किया जाएगा और निजी सेनाओं की अनुमति नहीं होगी।
इस प्रकार 1 और 2 फरवरी के दस्तावेजों में सरकार की नीति साफ दिखाई देती है—गांधी की हत्या का प्रतिशोध भीड़ नहीं लेगी, लेकिन हिंसा और सांप्रदायिक घृणा के विरुद्ध राज्य कार्रवाई करेगा।
चार फरवरी : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध
दो फरवरी की घोषणा के दो दिन बाद सरकारी कार्रवाई ने एक और बड़ा रूप लिया। 4 फरवरी 1948 को भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गैरकानूनी घोषित कर दिया। उस दिन जारी सरकारी वक्तव्य ने इस निर्णय को 2 फरवरी को घोषित घृणा और हिंसा की शक्तियों को समाप्त करने की नीति से जोड़ा। केंद्र प्रशासित क्षेत्रों में संघ को गैरकानूनी घोषित करने के साथ ही प्रांतों में भी इसी प्रकार की कार्रवाई की गई।
सरकार ने अपने वक्तव्य में संघ के घोषित उद्देश्यों और उसके सदस्यों की कथित गतिविधियों के बीच अंतर करने का दावा किया। सरकारी वक्तव्य में आरोप लगाया गया कि देश के विभिन्न हिस्सों में संघ के कुछ सदस्य आगजनी, लूट, डकैती और हत्या जैसी हिंसक गतिविधियों में शामिल हुए, अवैध हथियार और गोला-बारूद एकत्र किए तथा ऐसे पर्चे प्रसारित किए जिनमें हिंसक तरीके अपनाने, हथियार जुटाने और सरकार के विरुद्ध असंतोष पैदा करने के लिए उकसाया गया। ये तत्कालीन भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध के समर्थन में लगाए गए आरोप थे, इसलिए इन्हें उसी ऐतिहासिक संदर्भ और उसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
सरकारी वक्तव्य यह भी बताता है कि संघ के संबंध में सरकार के भीतर विचार गांधी की हत्या के बाद अचानक शुरू नहीं हुआ था। नवंबर 1947 में प्रांतीय प्रधानमंत्रियों और गृहमंत्रियों की बैठक में इस प्रश्न पर विचार हुआ था। उस समय संगठन के विरुद्ध सामूहिक कार्रवाई के बजाय कथित गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों से कठोरता से निपटने की नीति अपनाई गई थी। सरकार का 4 फरवरी का दावा था कि इसके बाद भी आपत्तिजनक गतिविधियां समाप्त नहीं हुईं, इसलिए संगठन के विरुद्ध कार्रवाई का निर्णय लिया गया।
यहां एक ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है। 4 फरवरी का प्रतिबंध और गांधी हत्या के आपराधिक मुकदमे में दोष निर्धारित किया जाना दो अलग विषय हैं। सरकारी वक्तव्य ने प्रतिबंध को व्यापक कानून-व्यवस्था, हिंसा और तत्कालीन सुरक्षा परिस्थितियों से जोड़ा तथा संघ के सदस्यों की गतिविधियों के संबंध में आरोप लगाए। इसलिए प्रतिबंध को अपने आप इस निष्कर्ष के समान नहीं माना जाना चाहिए कि पूरे संगठन को गांधी हत्या के आपराधिक षड्यंत्र में न्यायिक रूप से दोषी ठहरा दिया गया था।
छह दिनों में स्वतंत्र भारत की बड़ी परीक्षा
30 जनवरी से 4 फरवरी 1948 के केवल छह दिन नवस्वतंत्र भारत के सामने कानून के शासन की असाधारण परीक्षा लेकर आए। 30 जनवरी को गांधी की हत्या हुई। 1 फरवरी को पटेल ने हिंदू महासभा और संघ के सदस्यों तथा कार्यालयों पर हो रहे प्रतिशोधात्मक हमलों को रोकने की अपील की। 2 फरवरी को भारत सरकार ने घृणा और हिंसा की शक्तियों के विरुद्ध दृढ़ कार्रवाई का संकल्प घोषित किया और साथ ही जनता को कानून हाथ में न लेने की चेतावनी दी। 4 फरवरी को सरकार ने संघ को गैरकानूनी घोषित कर दिया।
इस पूरे घटनाक्रम में दो बातें विरोधी नहीं बल्कि समानांतर दिखाई देती हैं। सरकार हिंदू महासभा और संघ से जुड़े लोगों के विरुद्ध भीड़ की हिंसा को स्वीकार नहीं कर रही थी, लेकिन दूसरी ओर जिन गतिविधियों को वह कानून, सार्वजनिक व्यवस्था और नवस्वतंत्र राष्ट्र के लिए खतरा मान रही थी, उनके विरुद्ध राज्य की शक्ति से कार्रवाई भी कर रही थी। अर्थात न भीड़ को न्याय करने का अधिकार था और न सरकार कानून-विरुद्ध गतिविधियों को अनदेखा करने को तैयार थी।
गांधी की अंतिम लड़ाई सांप्रदायिक सद्भाव के लिए थी। 18 जनवरी को उन्होंने इसी विश्वास पर उपवास समाप्त किया था कि दिल्ली में विभिन्न समुदाय शांति बनाए रखेंगे। केवल बारह दिन बाद उनकी हत्या हो गई। फिर उसी देश में उनके नाम पर भड़के प्रतिशोध को रोकने के लिए सरकार को कहना पड़ा कि क्रोध में निर्दोष व्यक्तियों, घरों या कार्यालयों को निशाना बनाना गांधी का रास्ता नहीं है।
गांधी जयंती पर 1, 2 और 4 फरवरी 1948 के इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को साथ पढ़ने पर शायद उस दौर का सबसे महत्वपूर्ण संदेश सामने आता है—न्याय और प्रतिशोध एक नहीं हैं। हत्या और षड्यंत्र की जांच राज्य का दायित्व है, अपराध सिद्ध करना न्याय व्यवस्था का काम है और कानून तोड़ने वालों के विरुद्ध कार्रवाई सरकार की जिम्मेदारी। लेकिन किसी अपराध के कारण पूरे समूह के विरुद्ध हिंसक प्रतिशोध कानून का विकल्प नहीं हो सकता।
गांधी की अहिंसा की परीक्षा उनकी मृत्यु के साथ समाप्त नहीं हुई थी। उनकी हत्या के तत्काल बाद ही उसकी एक नई और कठिन परीक्षा शुरू हो गई थी—क्या एक हिंसक हत्या का उत्तर फिर हिंसा से दिया जाएगा, या कानून और न्याय से? उस उथल-पुथल भरे फरवरी 1948 में भारत सरकार का घोषित उत्तर था—कानून, न्याय और शांति।
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ABOUT AUTHOR : Jay Singh Rawat is a senior journalist, author and researcher with nearly five decades of experience in journalism. He has held senior editorial positions in print and electronic media and has written extensively on Uttarakhand, history, politics, governance and contemporary affairs. He is the author of several reference works, including books published by the National Book Trust, India. He is also a recipient of the Bhairav Dutt Dhuliya Journalism Award and the Vishwambhar Dutt Chandola Award.
Disclaimer
This article is based primarily on contemporary official records, including Government of India Press Information Bureau communiqués and resolutions published by the Ministry of Home Affairs in the Gazette of India Extraordinary in February 1948. Historical statements, allegations and governmental assessments have been presented in their documented context and should not be construed as the author’s independent attribution of responsibility. The views and interpretation expressed in the article are those of the author and not of the Admin.–ADMIN

