क्या हमारे पूर्वजों की आंत आज के मनुष्य से अधिक स्वस्थ थी?
The microbiome isn’t what it used to be in many parts of the world. The shift may be affecting the well-being of people in industrialized countries.

आधुनिक जीवनशैली से आंतों के सैकड़ों सूक्ष्मजीव दुर्लभ, पाचन से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक पड़ सकता है असर
By- JOTI RAWAT
मनुष्य ने चिकित्सा विज्ञान, स्वच्छता और पोषण के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है, लेकिन इसी विकास के दौरान उसके शरीर के भीतर एक महत्वपूर्ण जैविक संसार भी बदल गया है। यह संसार है हमारी आंतों में रहने वाले खरबों सूक्ष्मजीवों का, जिन्हें सामूहिक रूप से आंत का सूक्ष्मजीव समुदाय या गट माइक्रोबायोम कहा जाता है। हाल के वैज्ञानिक अध्ययनों ने संकेत दिया है कि आधुनिक औद्योगिक समाजों में रहने वाले लोगों की आंतों से अनेक ऐसे सूक्ष्मजीव दुर्लभ या अनुपस्थित हो गए हैं, जो पारंपरिक जीवनशैली वाले समुदायों में आज भी पाए जाते हैं। इससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है कि क्या आधुनिक सुविधाओं के बावजूद हमारी आंतों का जैविक स्वास्थ्य पहले से कमजोर हुआ है?
अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स में विज्ञान लेखक कार्ल ज़िमर द्वारा प्रस्तुत शोध के अनुसार, आधुनिक जीवनशैली ने मानव आंत के सूक्ष्मजीव समुदाय की संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। अफ्रीका की हडज़ा और दक्षिण अमेरिका की त्सिमाने जैसी पारंपरिक जीवनशैली वाली आबादियों के अध्ययन में सैकड़ों ऐसी जीवाणु प्रजातियों की पहचान की गई है, जो औद्योगिक समाजों में बहुत कम मिलती हैं।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि प्राचीन मनुष्य हर दृष्टि से अधिक स्वस्थ था। उस समय संक्रमण, परजीवी रोग, कुपोषण और उपचार के अभाव जैसी गंभीर चुनौतियां थीं। वैज्ञानिकों की चिंता मुख्यतः इस बात को लेकर है कि आधुनिक जीवन के साथ आंतों की सूक्ष्मजीवी विविधता में कमी आई है, जिसका स्वास्थ्य पर प्रभाव अभी पूरी तरह समझा जाना बाकी है।

आंतों में बसता है सूक्ष्मजीवों का संसार
हमारी आंतों में जीवाणु, विषाणु, कवक और अन्य सूक्ष्मजीव रहते हैं। इनमें से अनेक भोजन के अपचनीय हिस्सों को तोड़ने, उपयोगी पदार्थ बनाने, प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रशिक्षित करने और आंतों की सामान्य कार्यप्रणाली बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।
मानव विकास के दौरान भोजन पकाने की शुरुआत, लगभग दस हजार वर्ष पहले कृषि का विस्तार और बाद में औद्योगीकरण ने हमारे खानपान को बदला। इन परिवर्तनों के साथ आंतों के सूक्ष्मजीव भी बदलते रहे।
आधुनिक युग में अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों, कम रेशेदार भोजन, बार-बार एंटीबायोटिक के इस्तेमाल और बदली हुई जीवनशैली को सूक्ष्मजीव समुदाय में परिवर्तन के संभावित कारणों के रूप में देखा जा रहा है।
शोधकर्ताओं ने पारंपरिक समुदायों में ऐसी 600 से अधिक जीवाणु प्रजातियों की पहचान की है जो औद्योगिक आबादियों में दुर्लभ या अनुपस्थित बताई गई हैं। लेकिन इन सभी को लाभकारी मान लेना या उनके कम होने को सीधे किसी बीमारी का कारण घोषित करना अभी जल्दबाजी होगी।
आंत और मस्तिष्क के बीच अदृश्य संवाद
वैज्ञानिकों की रुचि केवल पाचन तक सीमित नहीं है। आंत और मस्तिष्क के बीच लगातार चलने वाला संवाद भी अनुसंधान का महत्वपूर्ण विषय बन गया है। इसे गट-ब्रेन एक्सिस कहा जाता है।
आंत और मस्तिष्क तंत्रिकाओं, हार्मोन, प्रतिरक्षा संकेतों तथा सूक्ष्मजीवों द्वारा निर्मित रासायनिक पदार्थों के माध्यम से एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। वेगस तंत्रिका इस संपर्क का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
आंत की अपनी तंत्रिका प्रणाली भी होती है, जिसे कभी-कभी ‘दूसरा मस्तिष्क’ कहा जाता है। यह पाचन संबंधी अनेक गतिविधियों को नियंत्रित करती है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि आंत स्वतंत्र रूप से सोचती या निर्णय लेती है।
शरीर के अधिकांश सेरोटोनिन का निर्माण आंत में होता है, लेकिन आंत में बना सेरोटोनिन सामान्यतः सीधे मस्तिष्क में नहीं पहुंचता। इसलिए इसे खुशी या अवसाद का सीधा नियंत्रक मानना उचित नहीं होगा।
इसी प्रकार कुछ जीवाणु गामा-अमीनोब्यूटिरिक अम्ल जैसे पदार्थ बना सकते हैं। इनके मानसिक स्वास्थ्य पर संभावित प्रभावों का अध्ययन जारी है, लेकिन मनुष्यों में इनके उपचारात्मक लाभ अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हुए हैं।
भोजन के रेशों का विशेष महत्व
आंतों के अनेक सूक्ष्मजीव भोजन में उपस्थित रेशों को तोड़कर ब्यूटायरेट जैसे लघु-श्रृंखला वसीय अम्ल बनाते हैं। ये पदार्थ आंत की कोशिकाओं को ऊर्जा प्रदान करने, उसकी सुरक्षात्मक परत बनाए रखने और प्रतिरक्षा संबंधी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं।
इसलिए साबुत अनाज, दालें, फल, सब्जियां और विविध वनस्पति खाद्य पदार्थ आंतों के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। भोजन में विविधता सूक्ष्मजीव समुदाय को भी प्रभावित कर सकती है।
दूसरी ओर, लंबे समय तक रेशों की कमी वाला असंतुलित आहार आंतों की सूक्ष्मजीवी संरचना को प्रभावित कर सकता है। हालांकि प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक ही प्रकार का आदर्श माइक्रोबायोम निर्धारित करना अभी संभव नहीं है।
क्या आंत की गड़बड़ी चिंता और अवसाद बढ़ाती है?
आंत के सूक्ष्मजीवों और चिंता, अवसाद तथा मस्तिष्क संबंधी अन्य स्थितियों के बीच संबंधों पर अनुसंधान बढ़ रहा है। कुछ अध्ययनों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं वाले व्यक्तियों के सूक्ष्मजीव समुदाय में अंतर पाए गए हैं।
लेकिन संबंध मिलने का अर्थ कारण सिद्ध होना नहीं है। तनाव स्वयं भी आंतों की गतिविधियों और सूक्ष्मजीवों को प्रभावित कर सकता है। इस प्रकार प्रभाव दोनों दिशाओं में संभव है।
कुछ विशेष प्रोबायोटिक जीवाणुओं पर किए गए छोटे अध्ययनों में तनाव या मनोदशा से संबंधित संभावित लाभ दिखाई दिए हैं। फिर भी किसी एक जीवाणु को चिंता या अवसाद का प्रमाणित उपचार नहीं माना जा सकता। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों में चिकित्सकीय उपचार का स्थान ऐसे उत्पाद नहीं ले सकते।
आधुनिक जीवनशैली में क्या बदलना जरूरी है?
आंतों के स्वास्थ्य के लिए किसी चमत्कारी औषधि या महंगे पूरक उत्पाद की अनिवार्यता नहीं है। विविध और संतुलित भोजन, पर्याप्त रेशे, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद तथा चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुसार ही एंटीबायोटिक का उपयोग महत्वपूर्ण उपाय हैं।
दही और अन्य सुरक्षित किण्वित खाद्य पदार्थ भोजन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन सभी किण्वित पदार्थों या प्रोबायोटिक उत्पादों का प्रभाव एक जैसा नहीं होता। स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए। रोगाणुओं से बचाव के आधुनिक उपायों ने असंख्य जीवन बचाए हैं।
इस शोध से निकलने वाला संदेश प्राचीन जीवनशैली में पूरी तरह लौटना नहीं, बल्कि आधुनिक सुविधाओं के साथ बेहतर खानपान और स्वस्थ आदतों को अपनाना है।
प्रगति के साथ जैविक संतुलन भी जरूरी
मानव सभ्यता की प्रगति ने जीवन को अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाया है। लेकिन इस विकास के दौरान भोजन, पर्यावरण और सूक्ष्मजीवों के साथ हमारे संबंध भी बदल गए हैं।
प्राचीन मनुष्य की आंत को आज की तुलना में निश्चित रूप से अधिक स्वस्थ बताने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। फिर भी यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आंतों की सूक्ष्मजीवी विविधता मानव स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण पहलू है।
आधुनिक चिकित्सा की उपलब्धियों को बनाए रखते हुए प्राकृतिक खाद्य विविधता और संतुलित जीवनशैली को महत्व देना ही इस उभरते वैज्ञानिक ज्ञान का सबसे उपयोगी संदेश है।

