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एसआईआर ही रद हो जाए तो …


-अरुण श्रीवास्तव देहरादून-
एक समय वो चुनाव आयोग का प्रमुख नारा हुआ करता था ‘कोई मतदाता पीछे न छूटे, पहले मतदान, फ़िर जलपान और अखबारों में भी पढ़ने को मिलता था कि, मीलों की दूरी तय कर पहुंचीं पोलिंग पार्टियां। यही नहीं दूर की पोलिंग पार्टियों को काफ़ी पहले इसलिए रवाना कर दिया जाता था ताकि एक भी मतदाता वोट डालने के अपने अधिकार से वंचित न हो जाए। बताते चलें कि तब 40-45 फीसद ही वोट पड़ते थे। वैसे भी पहली बार वोट डालने वाले का पहला अधिकार मताधिकार ही होता था। अब वो दिन आ गया है कि, इस अधिकार के इस्तेमाल के लिए भांति भांति के कागज़/दस्तावेज दिखाने पड़ रहे हैं, नये वोटर हैं तो अपने बाबा-दादा का नाम मतदाता सूची में तलाशना होगा। यदि आपके दादा-दादी, नाना-नानी का नाम नहीं है तो आप भी मतदाता सूची में शामिल नहीं हो सकते।
माना किसी के बाबा-दादा अति क्रांतिकारी रहे हों और उनका इस चुनावी प्रक्रिया में विश्वास नहीं रहा इसलिए वो वोटर नहीं बने तो हमारे पोते-पोती सिर पटक रह जाएं तब भी डिजिटल युग के मतदाता हो नहीं सकते।
खोदा पहाड़ निकली चुहिया वो भी मरी हुई : सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से मिली एक जानकारी में चुनाव आयोग ने बताया कि गत वर्ष उसने पूरे देश में एसआईआर शुरू करने का कोई निर्णय नहीं लिया था और मांगी गई निर्णय संबंधी फाइल भी उपलब्ध नहीं है। तो ये है विश्व गुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत के चुनाव आयोग की विश्वसनीयता? यह जवाब हर जागरुक मतदाता के मन में ये सवाल निश्चित रूप से  पैदा करेगा। क्योंकि 24 जून 2025 को चुनाव आयोग ने स्वयं बिहार में एसआईआर शुरू करने का आदेश जारी किया था और न्यायपालिका ने
आयोग ज्यादातर फैसले खुद ही लेता है, खुद ही परिवर्तन करता है जबकि कुछ फैसले लेने का अधिकार चुनाव आयोग को नहीं सरकार का है। आयोग जो भी फैसला लेगा वो सर्वसम्मति से होगा या बहुमत से। हाल ही में दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने इस तरह के मनमाने फैसले के खिलाफ सरकार को एक दो नहीं 14 शिकायती लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानी की तरफ ध्यान आकर्षित किया। मज़ेदार बात यह है कि इसका खुलासा उक्त अधिकारियों ने नहीं दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अखबार ने किया था। बावजूद इसके नतीज़ा सिफ़र रहा। इधर कुछ वर्षों से देखने को मिल रहा है कि देश में बच्चे तो पैदा तो हो रहे हैं, लेकिन मतदाता बनने से पहले ही कहीं गुम हो जा रहे हैं! यानी वयस्क नहीं हो पा रहे और मतदाता नहीं बन पा रहे। चुनाव आयोग का कहना है हमें मतदाता सूची शुद्ध करनी है सो पुरानी सूची से साबित करो कि उसमें नाम था कि नहीं! अब लोकतंत्र के इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु कौन है और जयद्रथ कौन ये तय करना अदालत का काम है।
अदालत ही धृतराष्ट्र बन जाए तो : याचिकाओं की शक्ल में कुछ सवाल पहुंचे अदालत में। कुछ को सुना गया। तो कुछ पर निर्देश भी हुए।
कुछ दलीलें इतनी सटीक की कि उन्हें “जजों” ने भी सराहा।
फिर मिली एक और तारीख। एसआईआर चलता रहा और तारीखें मिलतीं रहीं। लोकतंत्र में शायद यही न्यायिक प्रक्रिया है। अगर यही न्यायिक प्रक्रिया है तो इससे अच्छी तो सत्य नारायण की कथा है। अंत में स्रोता प्रसाद तो लेकर घर जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर पर रोक लगाने के बजाए उसकी प्रक्रिया को जीवनदान दिया, सुरक्षा कवच बढ़ाए। कोर्ट का अपना आदेश
मनवाने के लिए भी नाको चने चबाने पड़े। आयोग आधार को पहचान न मानने पर अड़ा रहा। अंत में इसे सबसे अंत में शामिल करने पर सहमत हुआ।
जब कोर्ट में बड़ी संख्या में जीवित मतदाताओं को मरा बताया गया तो कोर्ट ने कहा कि हमारे सामने पेश करें, योगेन्द्र यादव ने कोर्ट के सामने पेश किया। नतीजा ‘ढाक के तीन पात’ रहा। बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम काटने पर पश्चिम बंगाल की तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद अपनी पैरवी की, कोर्ट ने ममता और योगेन्द्र के दलीलों की तारीफ भर की, नतीजे पर कोई असर नहीं दिखा।
चुनाव आयोग की भूमिका है : जिस सूची को नागरिक ने वर्षों से अपनी मतदाता पहचान माना, उसी नागरिक से अब उसकी नागरिकता/पात्रता के प्रमाण मांगे जा रहे हैं।  इस पूरी कवायद में मतदाता किसका है उसे खुद ही नहीं पता कि वो बिहार का मतदाता हैं या बंगाल का और साबित करने का ठीकरा भी उसी के सर पर है। बावजूद इसके कि वो बचपन से देखता आया है कि उसके बाबा-दादा, नाना-नानी के पास हर चुनाव से पहले चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कर्मचारी आते थे और सामान्य जानकारी ले जाते थे। न वोटर कार्ड ज़रूरी था और आधार कार्ड। पासपोर्ट तक तो बात पहुंचतीं ही नहीं थी। नेता प्रतिपक्ष ने समय-समय पर संवाददाता सम्मेलन कर तमाम खामियों की ओर आयोग ध्यान आकृष्ट कराया पर उससे कोई सबक लेने के बजाए आयोग के मुखिया ने एलओपी को धमकी भरे लहजे में कहा कि वे देश से माफी मांगें, एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करें अन्य विकल्प नहीं है उनके पास। जबकि अनेक ठोस सबूत सार्वजनिक किए गए। एक विदेशी युवती की फोटो वोटर लिस्ट में दर्जनों जगह चस्पा थी। एक कमरे के मकान में कई सौ के पते दर्ज दिखाए गए थे और नंबर भी कई शून्य के साथ। बंगाल चुनाव के पहले लाखों मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए तो वोट पड़ने के बाद नब्बे फीसद बहाल कर दिये गये। लोकसभा और दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी इसी तरह का खेल हुआ। चुनाव समाप्त होते ही चालिस फीसद मतदाता अपने पते से गायब हो गए। महाराष्ट्र में पांच साल में वोटरों की तादाद उतनी नहीं बढ़ी जितनी पांच माह में बढ़ गई थी। अनेक राज्यों में बड़ी संख्या में वोटरों के नाम काटे गए, तर्क यह दिया गया कि, वे दूसरे राज्यों में शिफ्ट हो गए हैं पर किसी भी राज्य में शिफ्टेड वोटरों की संख्या उतनी नहीं बढ़ी जितनी अन्य राज्यों में घटी। सुनवाई के दौरान किसी मी-लार्ड न अपनी ‘जिज्ञासा’ प्रकट की कि, यदि काटे गए वोटरों की संख्या से कम अंतर पर प्रत्याशी विजई हुए तो…ऐसा हुआ भी पर न्यायालय ने तवज्जो नहीं दी। चंडीगढ़ के मेयर के चुनाव में आब्जर्वर बेइमानी करते रंगे हाथों पकड़ा गया, कोर्ट ने चुनाव भी रद किया पर उस मतदान अधिकारी को दंडित नहीं किया। नतीजा बेइमानों के हौसले बुलंद होते गए।
पिछले लोकसभा चुनाव के आसपास कई विधानसभा चुनाव में वोटिंग का समय समाप्त होने के बाद वोट देने वालों का प्रतिशत आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गई तो उत्तर प्रदेश में बिना आवेदन के 60 हजार मतदाताओं के नाम अपने आप जुड़ जाने की सूचना भी आ रही है। इन सब कारनामों के बीच चुनाव आयोग ने जो कारनामा किया  वो है फार्म 6 में परिवर्तन। यह फार्म नये मतदाताओं के लिए होता है। पहले कोई भी वयस्क आसानी से इसकी औपचारिकताएं पूरी कर वोटर लिस्ट में शामिल हो जाता था। नये नियम के तहत उसे साबित करना पड़ेगा कि उसके बाबा-दादा, नाना-नानी मतदाता थे कि नहीं। आपके मतदाता होने के लिए उनका मतदाता होना जरूरी हो गया। चूंकि फार्म ऑनलाइन है इसलिए बिना ये औपचारिकता पूरी किये आगे बढ़ ही नहीं सकते।
यदि एसआईआर ही रद्द हो जाए तो :
तो? क्या काटे गए लाखों लाख नाम अपने आप मतदाता बन जाएंगे? पश्चिम बंगाल उप चुनाव में 18 हजार मतदाता दूसरी बार भी वोट नहीं डाल पाए जबकि ऐसे ही लोगों का उपहास उड़ाते हुए एक जज महोदय ने कहा था, …तो क्या हुआ अगली बार वोट दे दीजिएगा जैसे वोट देने का अधिकार किसी जज साहब ने नहीं दिया था। न किसी सरकार ने दिया था और न चुनाव आयोग ने और न न्यायपालिका ने। ये अधिकार अपनी जनता को देश के संविधान ने दिया था।
फिर वही सवाल क्या जिनके पास पुराने कागज नहीं हैं, उनसे कोई माफी मांगेगा? क्या बीएलओ को फिर से कहा जाएगा जाइए, जिनको ढूंढ़कर लाए थे, उन्हें वापस ढूंढ़िए। और सबसे बड़ा सवाल
जिस मतदाता को लोकतंत्र में अपने अस्तित्व का प्रमाण देना पड़ा, क्या एसआईआर रद्द होने के बाद उसका वह समय, पैसा और परेशानी भी वापस होगी? एसआईआर रद होने पर पहले चुनीं गई सरकार का क्या होगा…? एसआईआर ही रद हो जाता है तो क्या पहले के चुनाव रद हो जाएंगे? सम्राट चौधरी और शुभेंदु अधिकारी अपनी अपनी कुर्सी छोड़ देंगे?

( लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं, जिनसे एडमिन और  इस पोर्टल के प्रबंधन का सहमत होना जरुरी नहीं है )

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