जलवायु संकट : मानव स्वास्थ्य पर मंडराता वैश्विक खतरा
Climate change has evolved into a profound threat to human health, life expectancy, productivity and economic progress, with the heaviest burden falling on developing nations. Drawing on the latest Lancet Commission report, the article highlights that limiting global warming to about 1.8°C could avert nearly 1.89 billion healthy life-years lost between 2025 and 2100. Rising heat-related mortality, air pollution (seven million premature deaths yearly), antimicrobial resistance and cascading risks in South Asia—especially India, where 76% of the population faces extreme heat—are examined. Himalayan glacier melt, water scarcity and disrupted healthcare access compound the crisis. Effective mitigation through clean energy, resilient health systems and integrated policies can still safeguard future generations.- JSR

-जयसिंह रावत –
जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण, मौसम और प्राकृतिक आपदाओं का विषय नहीं रह गया है। यह मानव स्वास्थ्य, जीवन प्रत्याशा, श्रम उत्पादकता और आर्थिक विकास के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। बढ़ता तापमान, प्रदूषित हवा, रोगाणुओं में दवाओं के प्रति बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता तथा बदलते रोग चक्र दुनिया के सामने एक ऐसा संकट खड़ा कर रहे हैं, जिसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब और विकासशील देशों पर पड़ने की आशंका है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार समय रहते प्रभावी कदम उठाए जाएँ तो आने वाली पीढ़ियों के अरबों स्वस्थ जीवन-वर्ष बचाए जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पत्रिका द लैंसेट से जुड़े शोधों और लैंसेट आयोग की नवीनतम रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि आज की पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य नीतियों का प्रभाव इस पूरी शताब्दी में मानव जीवन पर पड़ेगा। विशेष रूप से दक्षिण एशिया, जिसमें भारत भी शामिल है, के लिए यह चुनौती कहीं अधिक गंभीर है। यहाँ विशाल जनसंख्या, वायु प्रदूषण, बढ़ता शहरीकरण, गर्मी का प्रकोप और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव पहले से मौजूद हैं।इस संकट का आकलन केवल मौतों की संख्या से नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य वैज्ञानिक इसके लिए अक्षमता-समायोजित जीवन-वर्ष का उपयोग करते हैं। इसमें असमय मृत्यु के कारण खोए गए जीवन-वर्षों और बीमारी अथवा अक्षमता के साथ बिताए गए वर्षों, दोनों को शामिल किया जाता है। इस दृष्टि से जलवायु परिवर्तन का वास्तविक नुकसान सामान्य मृत्यु आँकड़ों से कहीं अधिक व्यापक है।
2100 तक 189 करोड़ स्वस्थ जीवन–वर्ष बचाने की संभावना
अक्टूबर 2026 में बर्लिन में आयोजित विश्व स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत 21वीं सदी में वैश्विक स्वास्थ्य के खतरों पर लैंसेट आयोग की रिपोर्ट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। आयोग ने 204 देशों और क्षेत्रों के आँकड़ों का अध्ययन करके मानव स्वास्थ्य और अस्तित्व के लिए 17 बड़े खतरों की पहचान की है। इनमें जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण, महामारी, रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध, कुपोषण, मोटापा, आर्थिक असमानता और मानसिक स्वास्थ्य जैसी चुनौतियाँ शामिल हैं। परमाणु युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल को संभावित अस्तित्वगत खतरों के रूप में भी चिह्नित किया गया है।आयोग के अनुसार यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को लगभग 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए, जबकि उच्च तापवृद्धि वाले परिदृश्य में यह 4.4 डिग्री तक पहुँच सकती है, तो वर्ष 2025 से 2100 के बीच करीब 189 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्षों की क्षति रोकी जा सकती है। यह कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं, बल्कि अलग-अलग नीतिगत और तापवृद्धि परिदृश्यों की तुलना से प्राप्त अनुमान है। विस्थापन, सूखा और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले अनेक अप्रत्यक्ष प्रभाव इसमें पूरी तरह शामिल नहीं हैं। इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भविष्य में होने वाली स्वास्थ्य क्षति अपरिहार्य नहीं है। उसका बड़ा हिस्सा आज लिए जाने वाले नीतिगत निर्णयों पर निर्भर करता है। ऊर्जा उत्पादन, परिवहन, औद्योगिक उत्सर्जन, नगर नियोजन और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करके इस नुकसान को कम किया जा सकता है।
गर्मी और प्रदूषण से बढ़ती मौतें
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष लगभग 70 लाख असमय मौतें होती हैं। प्रदूषित हवा में मौजूद अत्यंत सूक्ष्म कण फेफड़ों से रक्त परिसंचरण तक पहुँचकर हृदय रोग, पक्षाघात, श्वसन संबंधी बीमारियों और फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं। वर्ष 2025 की लैंसेट काउंटडाउन रिपोर्ट ने जलवायु संकट के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों की और गंभीर तस्वीर प्रस्तुत की। उसके अनुसार 1990 के दशक के मुकाबले गर्मी से संबंधित मृत्यु दर में 23 प्रतिशत वृद्धि हुई है और अब दुनिया में प्रतिवर्ष अनुमानतः 5.46 लाख मौतें अत्यधिक गर्मी से जुड़ी हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार 2024 में जंगलों की आग से उत्पन्न सूक्ष्म कणों के प्रदूषण के कारण लगभग 1.54 लाख मौतें होने का अनुमान लगाया गया। ये आँकड़े संकेत करते हैं कि जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण को अलग-अलग समस्याओं के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। जीवाश्म ईंधन का दहन दोनों संकटों का एक प्रमुख साझा कारण है। इसलिए स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण केवल तापमान नियंत्रित करने का उपाय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य में निवेश भी है।
भारत की 76 प्रतिशत आबादी भीषण गर्मी के जोखिम में
भारत के संदर्भ में यह संकट और चिंताजनक है। विज्ञान एवं पर्यावरण से जुड़े अनुसंधान संस्थानों के आकलन के अनुसार देश के लगभग 57 प्रतिशत जिले अत्यधिक गर्मी के उच्च अथवा बहुत उच्च जोखिम वाली श्रेणी में हैं। इन जिलों में देश की लगभग 76 प्रतिशत आबादी निवास करती है। ऊर्जा, पर्यावरण और जल परिषद के अध्ययन में 734 जिलों में से 417 को उच्च या बहुत उच्च जोखिम वाला पाया गया।
राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में देश में लू लगने के 48,156 संदिग्ध मामले दर्ज हुए। उसी वर्ष गर्मी से संबंधित 430 मौतें दर्ज की गईं, जिनमें 161 पुष्ट और 269 संदिग्ध थीं। यह संख्या स्वास्थ्य निगरानी व्यवस्था में दर्ज मामलों की है; गर्मी से जुड़ी सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मौतों का पूर्ण अनुमान नहीं। भारत में अत्यधिक गर्मी का सबसे अधिक प्रभाव खुले वातावरण में काम करने वाले मजदूरों, किसानों, निर्माण श्रमिकों, यातायात कर्मचारियों, बुजुर्गों और पहले से बीमार व्यक्तियों पर पड़ता है। गर्मी के कारण केवल लू ही नहीं लगती, बल्कि निर्जलीकरण, गुर्दों की समस्याएँ और हृदय संबंधी जटिलताएँ भी बढ़ सकती हैं। तेजी से फैलते शहरों में कंक्रीट के निर्माण, घटते हरित क्षेत्र और सड़कों से निकलने वाली ऊष्मा के कारण रात में भी तापमान पर्याप्त नहीं गिरता। इस शहरी ऊष्मा प्रभाव से शरीर को दिनभर की गर्मी से उबरने का अवसर कम मिलता है। इसलिए शहरी नियोजन को भी स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाना आवश्यक है।
रोगाणुओं पर बेअसर होती दवाएँ
लैंसेट आयोग ने रोगाणुरोधी प्रतिरोध को भी वैश्विक स्वास्थ्य के बड़े खतरों में शामिल किया है। यह समस्या तब उत्पन्न होती है जब जीवाणु तथा अन्य रोगाणु उन दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, जिनसे पहले उनका उपचार संभव था। इस संकट को केवल जलवायु परिवर्तन का परिणाम नहीं माना जा सकता। एंटीबायोटिक दवाओं का अनावश्यक उपयोग, अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण की कमी, पशुपालन में दवाओं का अनुचित इस्तेमाल और दूषित पर्यावरण इसके महत्वपूर्ण कारण हैं। हालाँकि तापमान, बाढ़ और जल प्रदूषण में बदलाव संक्रमण तथा प्रतिरोधी रोगाणुओं के प्रसार को प्रभावित कर सकते हैं।इसका परिणाम यह हो सकता है कि सामान्य संक्रमणों का उपचार भी कठिन और महँगा हो जाए। शल्य चिकित्सा, कैंसर उपचार और गहन चिकित्सा जैसी सेवाएँ भी प्रभावी एंटीबायोटिक दवाओं पर निर्भर करती हैं। इसलिए रोगाणुरोधी प्रतिरोध से निपटने के लिए चिकित्सकीय अनुशासन के साथ सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण आवश्यक हैं।
हिमालय में जलवायु संकट के अतिरिक्त खतरे
भारत के हिमालयी राज्यों के लिए जलवायु परिवर्तन का स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव दोहरा है। एक ओर तापमान और मौसम चक्र में बदलाव हो रहा है, दूसरी ओर हिमनदों के पिघलने, भूस्खलन, अतिवृष्टि और जलस्रोतों के प्रभावित होने से जीवन की बुनियादी सुविधाएँ संकट में पड़ सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय एकीकृत पर्वतीय विकास केंद्र (इसीमोड) की 2023 की हिमालय संबंधी रिपोर्ट के अनुसार हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में 2011 से 2020 के बीच हिमनदों के पिघलने की गति पिछले दशक की तुलना में 65 प्रतिशत अधिक रही। अधिक उत्सर्जन वाले परिदृश्य में इस शताब्दी के अंत तक क्षेत्र के वर्तमान हिमनद आयतन का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा समाप्त होने की आशंका जताई गई है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्यों में इसका स्वास्थ्य से सीधा संबंध है। प्राकृतिक जलस्रोतों में कमी से सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। बाढ़ और भूस्खलन के कारण स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुँच बाधित होती है। सड़कें टूटने पर गर्भवती महिलाओं, गंभीर रोगियों और दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों को समय पर उपचार उपलब्ध कराना कठिन हो जाता है।पर्वतीय क्षेत्रों में बदलते तापमान और वर्षा के साथ रोगवाहक मच्छरों के संभावित विस्तार, जलजनित संक्रमण तथा आपदाओं के बाद मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की निगरानी भी जरूरी है। इसीलिए हिमालय में जलवायु अनुकूलन की योजनाओं को केवल सड़क, बाँध और भवन निर्माण तक सीमित रखने के बजाय स्वास्थ्य सुरक्षा से जोड़ना होगा।
कुपोषण, मोटापा और आर्थिक असमानता का संकट
लैंसेट आयोग का अध्ययन जलवायु परिवर्तन के साथ उन सामाजिक परिस्थितियों को भी रेखांकित करता है, जो मानव स्वास्थ्य की संवेदनशीलता बढ़ाती हैं। आयोग के अनुसार मोटापे से जुड़े जोखिम कम करने की प्रभावी नीतियों द्वारा 2100 तक लगभग 2,310 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्षों की संभावित क्षति रोकी जा सकती है। शिक्षा में सुधार से लगभग 1,610 करोड़ और आय संबंधी असमानताओं को कम करने से लगभग 1,380 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्ष बचाए जा सकने का अनुमान है। ये अलग-अलग जोखिमों के मॉडल आधारित अनुमान हैं; इन्हें जोड़कर कुल लाभ निकालना उचित नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन खाद्य उत्पादन, पोषण और आजीविका को भी प्रभावित करता है। अनियमित वर्षा, सूखा और अत्यधिक तापमान कृषि उत्पादकता घटा सकते हैं। खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने का सबसे अधिक प्रभाव कम आय वाले परिवारों पर पड़ता है। इस प्रकार पर्यावरणीय संकट धीरे-धीरे पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के संकट में बदल सकता है।विश्व स्वास्थ्य संगठन के पुराने लेकिन व्यापक रूप से उद्धृत आकलन के अनुसार 2030 से 2050 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण कुपोषण, मलेरिया, अतिसार और गर्मी से प्रतिवर्ष लगभग ढाई लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। यह अनुमान केवल कुछ चयनित स्वास्थ्य प्रभावों पर आधारित है, इसलिए इसे जलवायु परिवर्तन से होने वाली समस्त संभावित मृत्यु का आँकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए नीतिगत परिवर्तन जरूरी
जलवायु परिवर्तन का सामना करने के लिए केवल अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करने की है, जो अत्यधिक गर्मी, बाढ़, महामारी, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान भी प्रभावी ढंग से काम कर सके।भारत में इसके लिए जिला स्तर पर गर्मी से बचाव की कार्ययोजनाएँ, स्वच्छ पेयजल, रोग निगरानी, आपदा-सुरक्षित अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण और समय पर चेतावनी देने वाली व्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से श्रमिकों के लिए सुरक्षित कार्य अवधि, पेयजल, विश्राम और छाया की व्यवस्था को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। लैंसेट आयोग ने भविष्य के स्वास्थ्य खतरों से निपटने के लिए तीन व्यापक प्राथमिकताएँ निर्धारित की हैं—संकटों के लिए तैयार स्वास्थ्य प्रणालियाँ, वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचार में निवेश तथा उभरते खतरों की सतत निगरानी। आयोग का मानना है कि संकट उत्पन्न होने के बाद प्रतिक्रिया देने की अपेक्षा पहले से रोकथाम और तैयारी करना अधिक प्रभावी है। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध कार्रवाई को विकास के विरोध में खड़ा करना भी उचित नहीं है। स्वच्छ ऊर्जा, बेहतर सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा-कुशल भवन, वृक्षावरण और प्रदूषण नियंत्रण से पर्यावरण के साथ मानव स्वास्थ्य को भी लाभ पहुँचता है। इससे उपचार पर होने वाले खर्च और बीमारियों के कारण कार्यदिवसों की क्षति को कम किया जा सकता है।
आज के निर्णय तय करेंगे अगली पीढ़ियों का स्वास्थ्य
लैंसेट आयोग की चेतावनी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि जलवायु संकट का भविष्य अभी पूरी तरह निर्धारित नहीं हुआ है। वैज्ञानिक अनुमानों में संभावित क्षति के साथ उसे रोकने की गुंजाइश भी दिखाई गई है। यही कारण है कि 189 करोड़ स्वस्थ जीवन-वर्ष बचाने की संभावना केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि नहीं, बल्कि मानवता के सामने उपलब्ध नीतिगत विकल्प का संकेत है। भारत जैसे देश के लिए यह प्रश्न विशेष महत्व रखता है, जहाँ एक ओर आर्थिक विकास और बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना है, वहीं दूसरी ओर विशाल जनसंख्या को गर्मी, प्रदूषण, बीमारियों और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रखना है। जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध कार्रवाई को केवल पर्यावरण मंत्रालयों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय मानने का समय बीत चुका है। इसे स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, श्रम, ऊर्जा और आर्थिक नियोजन की साझा प्राथमिकता बनाना होगा। क्योंकि जलवायु संकट की वास्तविक कीमत केवल पिघलते हिमनदों, नष्ट होती फसलों और क्षतिग्रस्त संपत्तियों में नहीं, बल्कि उन अनगिनत स्वस्थ जीवन-वर्षों में भी चुकानी पड़ सकती है, जिन्हें समय रहते लिए गए निर्णयों से बचाया जा सकता है।
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ABOUT AUTHOR : Jay Singh Rawat is a distinguished Indian journalist, author, and political commentator with over 48 years of experience in journalism. A recipient of prestigious journalism awards, including the K.C. Kulish International Award, he has authored several acclaimed reference books on Uttarakhand’s history, politics, culture, and social movements, contributing significantly to regional historiography.

