गढ़वाल विवि में ‘भारतीय भाषाओं में पुस्तक लेखन’ कार्यशाला का आगाज
श्रीनगर (गढ़वाल), 15 अक्टूबर। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचएनबीजीयू) के चौरास परिसर स्थित अकादमिक गतिविधि केंद्र में मंगलवार को ‘भारतीय भाषाओं में पुस्तक लेखन हेतु शिक्षकों की क्षमता संवर्धन’ विषय पर दो दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। शिक्षा मंत्रालय (भारत सरकार) की ‘भारतीय भाषा समिति’ के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला में उत्तराखंड के 25 से अधिक विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के शिक्षाविदों, संकाय सदस्यों और शोधार्थियों ने हिस्सा लिया।
इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य 22 भारतीय भाषाओं में विद्यालयी और उच्च शिक्षा के लिए उच्च गुणवत्ता वाली ‘संवादात्मक डिजिटल पुस्तकों’ (इंटरैक्टिव डिजिटल बुक्स) के रूप में अध्ययन सामग्री तैयार करना है, ताकि देश भर में बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा मिल सके।
“पुस्तकें लिखकर व्यक्ति अमृत पिए बिना भी अमर हो सकता है” – कुलपति: उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्री प्रकाश सिंह ने भारत की समृद्ध बौद्धिक विरासत के संरक्षण में इस पहल के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “पुस्तकें लिखकर व्यक्ति अमृत पिए बिना भी अमर हो सकता है।” कौटिल्य के अर्थशास्त्र के 15वें अध्याय (अनुसंधान पद्धति) का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्राचीन भारतीय साहित्य में निहित ज्ञान की गहराई पर प्रकाश डाला। कुलपति ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि “पुस्तक लेखन ही वास्तविक राष्ट्र निर्माण है।”
बजट 2025 में 2.5 लाख पुस्तकें विकसित करने का लक्ष्य : शिक्षा मंत्रालय की भारतीय भाषा समिति के अकादमिक समन्वयक एवं विषय विशेषज्ञ डॉ. चंदन श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में बताया कि केंद्रीय बजट 2025 में 2.5 लाख पुस्तकें विकसित करने का प्रस्ताव रखा गया है। उन्होंने भारतीय भाषाओं के संवर्धन में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि बहुभाषी सामग्री के विकास से एक संपूर्ण उद्योग खड़ा करने की संभावनाएं हैं। साथ ही, उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुवाद केवल शब्दों का रूपांतरण नहीं होना चाहिए, बल्कि मूल रचनाओं की भावना और अर्थ भी सुरक्षित रहने चाहिए।
राज्य के 25 से अधिक संस्थानों की रही भागीदारी : कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि बिड़ला परिसर के निदेशक प्रो. हरभजन सिंह चौहान रहे। समन्वयक डॉ. आलोक सागर गौतम ने अतिथियों का स्वागत करते हुए उत्तराखंड में पुस्तक प्रकाशन की प्रक्रिया और शिक्षाविदों के सामूहिक सहयोग की संभावनाओं पर विस्तारपूर्वक चर्चा की। कार्यशाला में कुल 75 प्रतिभागियों ने सहभागिता की, जिनमें 65 संकाय सदस्य, 8 शोधार्थी और 2 विद्यार्थी शामिल थे।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. कविता भट्ट ने किया। कार्यशाला की रूपरेखा तैयार करने में राज्य समन्वयक प्रो. नारायण दत्त, डॉ. अलका सूरी, अकादमिक समन्वयक डॉ. रचना विश्वकर्मा और डॉ. सुधांशु भूषण का विशेष योगदान रहा।
इस अवसर पर प्रो. आर. एस. नेगी, प्रो. सीमा धवन, प्रो. डी. एस. नेगी, प्रो. एम. एस. नेगी, प्रो. सुरेंद्र सिंह बिष्ट और प्रो. बी. पी. नैथानी सहित विश्वविद्यालय के अनेक संकाय सदस्य एवं शिक्षाविद् उपस्थित रहे। यह कार्यशाला समावेशी और सुलभ शैक्षणिक संसाधन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

