देश के लगभग 40 प्रतिशत जिलों में बढ़ी बाढ़ की संवेदनशीलता
आईआईटी रुड़की के अध्ययन में बाढ़ और सूखे की दोहरी चुनौती उजागर, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप आपदा प्रबंधन पर जोर
रुड़की, 19 अक्टूबर। जलवायु परिवर्तन और बदलती जल परिस्थितियों के कारण भारत में बाढ़ तथा सूखे की दोहरी चुनौती गंभीर होती जा रही है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) रुड़की के वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में सामने आया है कि वर्ष 2001 से 2011 के बीच देश के लगभग 40 प्रतिशत जिलों में बाढ़ के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी। इसी अवधि में सूखे के प्रति अत्यधिक संवेदनशील जिलों का अनुपात भी बढ़ा है। अध्ययन का महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि बाढ़ और सूखे को अलग-अलग आपदाएं मानकर तैयार की जाने वाली योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। कई क्षेत्रों में दोनों प्रकार के खतरों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ने की आशंका को देखते हुए समन्वित आपदा प्रबंधन की आवश्यकता है।
आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर मोहित प्रकाश मोहंती के नेतृत्व में किए गए इस अध्ययन में देश के 591 जिलों की परिस्थितियों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने वर्ष 2001 और 2011 के सामाजिक, आर्थिक, जनसांख्यिकीय तथा बुनियादी ढांचे से संबंधित आंकड़ों की तुलना कर यह जानने का प्रयास किया कि विभिन्न क्षेत्रों में बाढ़ और सूखे के प्रति संवेदनशीलता किन कारणों से बढ़ रही है।
अध्ययन के अनुसार वर्ष 2001 में देश के 16.5 प्रतिशत जिले बाढ़ के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में थे। वर्ष 2011 तक इनका अनुपात बढ़कर 21.4 प्रतिशत हो गया। इसी तरह सूखे के प्रति अत्यधिक संवेदनशील जिलों का अनुपात 10.6 प्रतिशत से बढ़कर 18.1 प्रतिशत पहुंच गया। इस प्रकार दस वर्षों के दौरान बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील जिलों की हिस्सेदारी में 4.9 प्रतिशत अंक और सूखे के मामले में 7.5 प्रतिशत अंक की वृद्धि दर्ज की गई।
जिलावार विश्लेषण में पाया गया कि 39.76 प्रतिशत जिलों में बाढ़ के प्रति संवेदनशीलता बढ़ी, जबकि 10.83 प्रतिशत जिलों में सूखे की संवेदनशीलता में वृद्धि हुई। हालांकि लगभग 38 प्रतिशत जिलों में सूखे के प्रति संवेदनशीलता कम भी हुई। इससे स्पष्ट होता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में जलवायु और जल संसाधनों से जुड़े खतरों का प्रभाव एक समान नहीं है। कुछ क्षेत्रों में परिस्थितियां अधिक प्रतिकूल हुई हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत सुधार दर्ज किया गया है।
अध्ययन इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाता है कि किसी क्षेत्र में बाढ़ या सूखे की संवेदनशीलता केवल वर्षा की मात्रा अथवा प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती। आबादी की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, उपलब्ध संसाधन, बुनियादी सुविधाएं और आपदाओं का सामना करने की क्षमता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए आपदा प्रबंधन की योजनाएं तैयार करते समय स्थानीय परिस्थितियों और जिलावार जोखिम का आकलन आवश्यक है।
शोध के निष्कर्ष नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से उन क्षेत्रों में, जहां अत्यधिक वर्षा और पानी की कमी जैसी विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं, जल संसाधन प्रबंधन तथा आपदा से निपटने की तैयारियों में बेहतर समन्वय की जरूरत है। अध्ययन में वर्ष 2001 से 2011 के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है, इसलिए इसके निष्कर्ष उस अवधि में संवेदनशीलता के बदलाव को दर्शाते हैं, न कि वर्तमान वर्ष में बाढ़ या सूखे की वास्तविक घटनाओं की संख्या को।

