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सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों समेत सभी लोगों के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल को मौलिक अधिकार बताया

 

सी-सीम से निपटने के लिए डेटाबेस बनाने का निर्देश

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों समेत हर व्यक्ति के लिए इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल को ‘मौलिक अधिकार’ घोषित करते हुए केंद्र सरकार को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार सामग्री (सी-सीम) की पहचान कर उसे हटाने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सोशल मीडिया खातों के लिए ‘चाइल्ड मोड’ शुरू करने का सुझाव भी दिया। इसके तहत माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी पर विशेष जोर देने की बात कही गई।

अदालत ने कहा, “हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत इंटरनेट तक पहुंच और उसके इस्तेमाल का अधिकार हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। हमारे बच्चों को भी, उनकी उम्र चाहे जो हो, वही अधिकार प्राप्त हैं। उन्हें इस अधिकार से पूरी तरह वंचित करना उतना ही अतार्किक होगा, जितना यह कहना कि एक निश्चित उम्र से कम के बच्चों की अंतरात्मा ऐसी नहीं है, जिसकी रक्षा की जानी चाहिए, या उनके पास अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता नहीं है, जिसे व्यक्त करने का अवसर मिलना चाहिए। हमारे बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं।”

अदालत ने ये टिप्पणियां जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस (जेआरसीए) एवं अन्य बनाम एस. हरीश एवं अन्य मामले की सुनवाई के दौरान कीं। जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों का भारत का सबसे बड़ा नेटवर्क है। जेआरसी 300 से अधिक संगठनों के साथ मिलकर बाल यौन शोषण, चाइल्ड ट्रैफिकिंग और बाल विवाह के खिलाफ काम करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इंटरनेट बच्चों के लिए अभी सुरक्षित जगह नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली कंपनियां हानिकारक सामग्री की पहचान कर उसे हटाने में विफल रहती हैं, तो इसकी सजा बच्चों को इंटरनेट से दूर रखकर नहीं दी जा सकती। ऐसा करना पीड़ित को ही समस्या मान लेने जैसा होगा।

अदालत ने सी-सीम की पहचान करने और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय हैश एवं यूआरएल सूची डेटाबेस स्थापित करने का निर्देश दिया। उसने कहा कि डेटाबेस में किसी भी सामग्री को शामिल करने से पहले कई स्तरों पर उसकी पुष्टि की जानी चाहिए। अंतिम जांच कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञों द्वारा की जाए, जो स्वतंत्र रूप से यह तय करें कि संबंधित सामग्री सी-सीम की श्रेणी में आती है या नहीं। डेटाबेस में दर्ज प्रत्येक प्रविष्टि का इस्तेमाल डिजिटल प्लेटफॉर्म संचालित करने वाली कंपनियां अपनी वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री का मिलान करने और उससे मेल खाने वाली सामग्री को हटाने के लिए करेंगी। कानून प्रवर्तन एजेंसियां भी इसी प्रक्रिया का इस्तेमाल कर डेटाबेस में दर्ज सामग्री से मेल खाने वाली अन्य सामग्री की पहचान करेंगी, उसका पता लगाएंगी और उसे हटाएंगी।

यदि किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म को डेटाबेस में दर्ज किसी प्रविष्टि से मेल खाने वाली सामग्री मिलती है, यानी ऐसी सी-सीम सामग्री जिसका स्रोत पहले से ज्ञात है, तो उसे बिना किसी अतिरिक्त पुष्टि की प्रतीक्षा किए तत्काल निष्क्रिय कर हटाना होगा। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय समय-समय पर इन दिशा-निर्देशों और मानक संचालन प्रक्रियाओं में संशोधन करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इस उद्देश्य से दिशा-निर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएं तैयार करने के साथ-साथ कानून में जरूरी संशोधन करने का भी निर्देश दिया।

सोशल मीडिया अकाउंट के लिए ‘चाइल्ड मोड’ शुरू करने के सुझाव पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके तहत बच्चों के अकाउंट डिफॉल्ट रूप से निजी रखे जा सकते हैं। अनजान वयस्कों की ओर से संपर्क करने और संदेश भेजने पर पाबंदियां लगाई जा सकती हैं। इसके अलावा, बच्चों को दिखाई जाने वाली विज्ञापन सामग्री और अन्य कंटेंट पर भी नियंत्रण रखा जा सकता है। ऐसे उपाय कम उम्र के बच्चों, विशेषकर किशोरावस्था से पहले के बच्चों, के लिए लागू किए जा सकते हैं। इसके लिए माता-पिता की सहमति की पुष्टि के उचित और उचित तरीके अपनाए जाने चाहिए।

अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों, राष्ट्रीय एवं राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों तथा अन्य संबंधित पक्षों को भी निर्देश दिया कि वे बच्चों को इंटरनेट के सुरक्षित इस्तेमाल के तरीके सिखाने के लिए कदम उठाएं। बच्चों को ऑनलाइन अपनी निजी जानकारी और निजता की सुरक्षा करना सिखाया जाए। साथ ही, उन्हें बहला-फुसलाकर शोषण के जाल में फंसाने, यौन शोषण के लिए ब्लैकमेल करने और इस तरह की अन्य शोषणकारी एवं दुर्व्यवहारपूर्ण गतिविधियों के संकेत पहचानने के बारे में जागरूक किया जाए।

इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का ने कहा कि सरकार के सहयोग से भारत अब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए दुनिया के सबसे मजबूत ढांचों में से एक तैयार कर सकता है। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने एक स्पष्ट और व्यावहारिक रोडमैप दिया है। इसमें सामग्री को तत्काल हटाना, दो घंटे के भीतर पुलिस को इसकी सूचना देना, समर्पित शिकायत अधिकारियों की नियुक्ति और शिकायत दर्ज कराने के लिए एक समान व्यवस्था लागू करना शामिल है।”

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस की ओर से पेश अधिवक्ता रचना त्यागी ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के अपने फैसले की बात को सबसे स्पष्ट शब्दों में दोहराया है। बच्चों की सुरक्षा के मामले में कोई भी प्लेटफॉर्म, चाहे वह कितना ही बड़ा या ताकतवर क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। अदालत ने साफ कर दिया है कि बाल यौन शोषण सामग्री को चुपचाप हटा देना ही पर्याप्त नहीं है। पॉक्सो कानून के तहत इसकी सूचना पुलिस को देना अनिवार्य है। कानूनी संरक्षण की आड़ में चुप्पी साधने की छूट नहीं मिल सकती।”

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