दुर्गा पूजा केअवसर विशेष : पर यह सब किसलिए ….?

– गोविन्द प्रसाद बहुगुणा
दुर्गा पूजा के इस अवसर पर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘स्त्रियाँ’ की कुछ पंक्तियाँ स्मरण हो आईं, तो उन्हें साझा करने का मन हुआ।
आज महिला सशक्तीकरण और मातृशक्ति के सम्मान के नारे खूब लगाए जाते हैं। नारी को देवी और शक्ति का स्वरूप बताकर उसकी आराधना की जाती है। लेकिन इन नारों और वास्तविकता के बीच कितना बड़ा अंतर है, यह हमारे समाज की घटनाएँ बार-बार उजागर करती हैं।
जब महिलाएँ अपने अधिकारों की माँग करती हैं, तो कई बार उन्हें प्रताड़ना, अपमान और अभद्र व्यवहार का सामना करना पड़ता है। यह सब सार्वजनिक रूप से, लोगों की आँखों के सामने होता है, लेकिन ऐसे अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस बहुत कम लोग दिखाते हैं। विडंबना यह है कि मातृशक्ति के सम्मान की बात करने वाले भी अक्सर ऐसे अवसरों पर मौन साध लेते हैं।
ऐसे में एक गंभीर प्रश्न उठता है कि यदि हम जीवित स्त्री की गरिमा, उसके अधिकारों और आत्मसम्मान की रक्षा नहीं कर सकते, तो देवी के रूप में मातृशक्ति की पूजा का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है? आखिर यह दुर्गा पूजा किसलिए और किसके लिए है?
इन्हीं प्रश्नों के संदर्भ में मैथिलीशरण गुप्त की कविता ‘स्त्रियाँ’ के कुछ अंश प्रस्तुत हैं। विशेष रूप से पुत्र और पुत्री के समान सम्मान तथा कन्या जन्म के प्रति समाज की मानसिकता पर उनकी पंक्तियाँ आज भी विचार करने को विवश करती हैं।
‘स्त्रियाँ’ — मैथिलीशरण गुप्त
पूजन किया पति का स्त्रियों ने भक्ति-पूर्ण विधान से,
अंचल पसार प्रणाम कर फिर की विनय भगवान् से—
“विश्वेश! हम अबला जनों के बल तुम्हीं हो सर्वदा,
पतिदेव में मति, गति तथा दृढ़ हो हमारी रति सदा।” ॥१६१॥
हैं प्रीति और पवित्रता की मूर्ति-सी वे नारियाँ,
हैं गेह में वे शक्तिरूपा, देह में सुकुमारियाँ।
गृहिणी तथा मन्त्री स्वपति की शिक्षिता हैं वे सती,
ऐसी नहीं हैं वे कि जैसी आजकल की श्रीमती। ॥१६२॥
घर का हिसाब-किताब सारा है उन्हीं के हाथ में,
व्यवहार उनके हैं दयामय सब किसी के साथ में।
पाक-शास्त्र वे विशारदा हैं और वैद्यक जानतीं,
सबको सदा सन्तुष्ट रखना धर्म अपना मानतीं। ॥१६३॥
आलस्य में अवकाश को वे व्यर्थ ही खोती नहीं,
दिन क्या, निशा में भी कभी पति से प्रथम सोती नहीं।
सीना, पिरोना, चित्रकारी जानती हैं वे सभी—
संगीत भी, पर गीत गन्दे वे नहीं गाती कभी। ॥१६४॥
संसार-यात्रा में स्वपति की वे अटल अश्रान्ति हैं,
हैं दुःख में वे धीरता, सुख में सदा वे शान्ति हैं।
शुभ सान्त्वना हैं शोक में वे, और औषधि रोग में,
संयोग में सम्पत्ति हैं, बस हैं विपत्ति वियोग में। ॥१६५॥
सन्तान
जब हैं स्त्रियाँ यों देवियाँ, सन्तान क्यों उत्तम न हो?
उन बालकों के सरल, सुन्दर भाव तो देखो अहो!
ऊषाऽगमन से जाग वे भी ईश-गुण गाने लगे—
या कुंज फूले देख बन्दी भृंग उड़ जाने लगे! ॥१६६॥
हैं हृष्ट-पुष्ट शरीर से, माँ-बाप के वे प्राण हैं—
जो सर्वदा करते दृगों की भाँति उनका त्राण हैं।
वे जायँ जब तक गुरुकुलों में, ज्ञान का घर है जहाँ—
तब तक उन्हें कुछ-कुछ पढ़ाती आप माताएँ यहाँ। ॥१६७॥
है ठीक पुत्रों के सदृश ही पुत्रियों का मान भी,
क्या आज की-सी है दशा, जो हो न उनका ध्यान भी!
हैं उस समय के जन न अब-से जो उन्हें समझें बला,
होंगे न दोनों नेत्र किसको एक-से प्यारे भला? ॥१६८॥
देखो, अहा! वे पुत्रियाँ हैं या विभव की वृद्धियाँ,
अवतीर्ण मानो हैं हुई प्रत्यक्ष उनके ऋद्धियाँ।
हा! अब उन्हीं के जन्म से हम डूबते हैं शोक में,
पर हो न उनका जन्म तो हों पुत्र कैसे लोक में? ॥१६९॥
मैथिलीशरण गुप्त की इन पंक्तियों में तत्कालीन सामाजिक मान्यताओं की झलक भी मिलती है, लेकिन पुत्र और पुत्री के समान महत्व तथा कन्या जन्म के प्रति भेदभाव पर उनका प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है। विशेष रूप से उनकी यह पंक्ति— ‘होंगे न दोनों नेत्र किसको एक-से प्यारे भला?’ —समाज को याद दिलाती है कि बेटा और बेटी दोनों समान स्नेह, सम्मान और अवसरों के अधिकारी हैं।
आज विचारणीय प्रश्न यही है कि क्या मातृशक्ति के प्रति हमारा सम्मान केवल पूजा-पंडालों, धार्मिक अनुष्ठानों और भाषणों तक सीमित रह गया है? क्या देवी की प्रतिमा के सामने श्रद्धा से सिर झुकाने वाला समाज अपने सामने अपमानित होती स्त्री के पक्ष में भी उतने ही साहस से खड़ा होता है?
स्त्री का वास्तविक सम्मान उसके अधिकारों, स्वतंत्रता, सुरक्षा और गरिमा के प्रति हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। देवी की आराधना तभी सार्थक होगी, जब समाज की प्रत्येक स्त्री को भी वही सम्मान, न्याय और गरिमा मिले, जिसकी हम पूजा में कामना और उद्घोषणा करते हैं।

