महिला अपराधों के मामलों में घिरे 187 सांसद-विधायक, 14 पर दुष्कर्म के मामले
A latest report by the Association for Democratic Reforms (ADR) and National Election Watch (NEW) has raised serious questions about the commitment of political parties towards the safety and dignity of women in India. According to the report, 187 sitting Members of Parliament and Members of Legislative Assemblies have declared criminal cases related to crimes against women in their election affidavits. Of these, 19 are MPs and 168 are MLAs. Of particular concern is the fact that 14 of these representatives have declared cases related to rape.
एडीआर की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा : भाजपा के 106, कांग्रेस के 20 और तेलुगु देशम पार्टी के 18 जनप्रतिनिधियों ने घोषित किए महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित मामले
–जयसिंह रावत
देश में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिबद्धता पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और नेशनल इलेक्शन वॉच (एनईडब्ल्यू) की ताजा रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार देश के 187 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने अपने चुनावी हलफनामों में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित आपराधिक मामले घोषित किए हैं। इनमें 19 सांसद और 168 विधायक शामिल हैं। विशेष चिंता की बात यह है कि इनमें से 14 जनप्रतिनिधियों ने दुष्कर्म से संबंधित मामले भी घोषित किए हैं।
शुक्रवार, 23 अक्टूबर को जारी इस रिपोर्ट में देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के कुल 4,881 मौजूदा सांसदों और विधायकों के चुनावी हलफनामों का विश्लेषण किया गया है। इनमें 772 सांसद और 4,109 विधायक शामिल हैं। देश में कुल 4,899 मौजूदा सांसदों और विधायकों में से 18 के हलफनामे इस विश्लेषण में शामिल नहीं हो सके।
एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच ने वर्ष 2022 से 2026 के बीच हुए आम चुनावों और उपचुनावों में उम्मीदवारों द्वारा निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत प्रपत्र-26 में दर्ज जानकारियों के आधार पर यह अध्ययन किया है। इस अवधि में इस्तीफे, मृत्यु अथवा अन्य कारणों से रिक्त हुई सीटों पर हुए उपचुनावों के हलफनामे भी इसमें शामिल किए गए हैं।
हालांकि, रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि आपराधिक मामलों की जानकारी संबंधित जनप्रतिनिधियों द्वारा चुनाव के समय दिए गए हलफनामों पर आधारित है। इन मामलों की वर्तमान न्यायिक स्थिति अलग हो सकती है। इसलिए किसी जनप्रतिनिधि के विरुद्ध मामला दर्ज होने अथवा लंबित होने का अर्थ उसे दोषी सिद्ध होना नहीं है।
भाजपा के सबसे अधिक 106 जनप्रतिनिधियों पर मामले
राजनीतिक दलों के आधार पर किए गए विश्लेषण में भारतीय जनता पार्टी के सर्वाधिक 106 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित मामले घोषित किए हैं। इसके बाद कांग्रेस के 20 और तेलुगु देशम पार्टी के 18 जनप्रतिनिधि हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के मामलों वाले उम्मीदवारों को चुनावी राजनीति में स्थान देने की समस्या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। हालांकि, संख्या के आधार पर भाजपा सबसे आगे है। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न दलों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की कुल संख्या अलग-अलग है। इसलिए केवल मामलों की संख्या के आधार पर किसी दल के जनप्रतिनिधियों में ऐसे मामलों का अनुपात निर्धारित नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण को चुनावी मुद्दा बनाने वाले प्रमुख राजनीतिक दल भी ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देते रहे हैं, जिनके विरुद्ध महिलाओं से संबंधित अपराधों के मामले दर्ज हैं।
पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 69 जनप्रतिनिधि
राज्यवार विश्लेषण में पश्चिम बंगाल पहले स्थान पर है। वहां 69 मौजूदा सांसदों और विधायकों ने महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित मामले घोषित किए हैं। आंध्र प्रदेश में ऐसे 22 और ओडिशा में 17 जनप्रतिनिधि हैं।
इस प्रकार केवल इन तीन राज्यों में ही 108 जनप्रतिनिधियों ने महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से जुड़े मामले घोषित किए हैं। यह देशभर में ऐसे कुल 187 सांसदों और विधायकों का लगभग 58 प्रतिशत है।
राज्यों के इन आंकड़ों को वहां महिलाओं के विरुद्ध होने वाले कुल अपराधों की दर के समान नहीं माना जाना चाहिए। ये केवल निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के चुनावी हलफनामों में घोषित मामलों की संख्या दर्शाते हैं।
दुष्कर्म के मामलों में 14 सांसद-विधायक
रिपोर्ट का सबसे गंभीर निष्कर्ष दुष्कर्म से संबंधित मामलों को लेकर सामने आया है। महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित मामले घोषित करने वाले 187 जनप्रतिनिधियों में 14 ऐसे हैं, जिन्होंने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 तथा धारा 376(2)(एन) के अंतर्गत मामले घोषित किए हैं। इनमें एक ही महिला के साथ बार-बार दुष्कर्म करने से संबंधित आरोप भी शामिल हैं।
इन 14 जनप्रतिनिधियों में दो लोकसभा सांसद और 12 विधायक हैं।
राजनीतिक दलों के आधार पर भाजपा और कांग्रेस के चार-चार जनप्रतिनिधियों ने दुष्कर्म से संबंधित मामले घोषित किए हैं। भाजपा के चार जनप्रतिनिधियों में दो लोकसभा सांसद और दो विधायक शामिल हैं, जबकि कांग्रेस के सभी चार जनप्रतिनिधि विधायक हैं।
इसके अतिरिक्त तेलुगु देशम पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, नेशनल पीपुल्स पार्टी, भारत आदिवासी पार्टी और ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट के एक-एक विधायक ने भी ऐसे मामले घोषित किए हैं।
यहां भी रिपोर्ट चुनावी हलफनामों में दर्ज आपराधिक मामलों का विवरण प्रस्तुत करती है, न कि संबंधित व्यक्तियों को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने का निष्कर्ष।
देश में प्रतिदिन महिलाओं के विरुद्ध औसतन 1,210 अपराध दर्ज
एडीआर ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का भी उल्लेख किया है। इनके अनुसार वर्ष 2024 में देशभर में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों के कुल 4,41,534 मामले दर्ज किए गए। इस हिसाब से प्रतिदिन औसतन लगभग 1,210 मामले सामने आए।
राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं के विरुद्ध दर्ज अपराधों की दर प्रति एक लाख महिला आबादी पर 64.6 रही, जबकि दिल्ली और तेलंगाना में यह दर राष्ट्रीय औसत से लगभग दोगुनी दर्ज की गई।
ये आंकड़े महिलाओं की सुरक्षा की व्यापक चुनौती को रेखांकित करते हैं। हालांकि, एनसीआरबी के आंकड़े देशभर में दर्ज अपराधों से संबंधित हैं, जबकि एडीआर की रिपोर्ट निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के घोषित आपराधिक मामलों पर केंद्रित है।
उम्मीदवारों के चयन में राजनीतिक दलों की जवाबदेही पर सवाल
एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच ने कहा है कि महिलाओं के विरुद्ध गंभीर अपराधों से संबंधित मामले होने के बावजूद उम्मीदवारों को टिकट दिया जाना भारतीय राजनीति की चिंताजनक स्थिति को दर्शाता है।
संगठनों ने आशंका जताई है कि राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावशाली आरोपी पुलिस जांच को प्रभावित करने, न्यायिक प्रक्रिया में देरी का लाभ उठाने तथा पीड़ित महिलाओं और उनके परिवारों पर दबाव डालने की स्थिति में हो सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार ऐसे गंभीर मामलों में न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता, पुलिस जांच की गुणवत्ता और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है।
एडीआर ने की चुनाव लड़ने पर रोक और त्वरित सुनवाई की मांग
एडीआर और नेशनल इलेक्शन वॉच ने चुनावी राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की भागीदारी रोकने के लिए कई महत्वपूर्ण सुधार सुझाए हैं।
संगठनों ने आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने और दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराधों में दोषसिद्ध व्यक्तियों को चुनाव लड़ने के लिए स्थायी रूप से अयोग्य घोषित करने की सिफारिश की है। साथ ही महिलाओं के विरुद्ध गंभीर अपराधों से संबंधित मामलों वाले जनप्रतिनिधियों को मंत्रिपरिषद में स्थान नहीं देने की मांग की है।
रिपोर्ट में सर्वोच्च न्यायालय के फरवरी 2020 के निर्देशों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राजनीतिक दलों को आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों के चयन के कारण सार्वजनिक करने चाहिए। इन निर्देशों का उल्लंघन करने वाले दलों पर भारी आर्थिक दंड लगाने और अनुपालन के लिए जिम्मेदार पदाधिकारियों की जवाबदेही तय करने की भी सिफारिश की गई है।
संगठनों ने सांसदों और विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मामलों की सुनवाई निर्धारित समयसीमा में पूरी करने, पुलिस जांच को पेशेवर और निष्पक्ष बनाने तथा आवश्यक मामलों में न्यायालय की निगरानी में जांच कराने पर जोर दिया है।
इसके अतिरिक्त मतदाताओं से भी अपील की गई है कि वे उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों में घोषित आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी लेकर मतदान का निर्णय करें।
महिला सुरक्षा के वादों और उम्मीदवारों के चयन में विरोधाभास
रिपोर्ट भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण विरोधाभास की ओर ध्यान आकर्षित करती है। एक ओर राजनीतिक दल महिला सुरक्षा, सम्मान और सशक्तीकरण के लिए कानून बनाने तथा योजनाएं लागू करने का दावा करते हैं, दूसरी ओर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से संबंधित मामले घोषित करने वाले उम्मीदवार भी चुनाव जीतकर संसद और विधानसभाओं में पहुंच रहे हैं।
हालांकि, लोकतांत्रिक व्यवस्था और आपराधिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों के अनुसार आरोप तथा दोषसिद्धि के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर अपराधी नहीं माना जा सकता। इसी कारण चुनावी सुधारों में उम्मीदवारों के अधिकारों, पीड़ितों को न्याय और सार्वजनिक जीवन की शुचिता के बीच संतुलन का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।
एडीआर की रिपोर्ट का व्यापक संदेश यही है कि महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून बनाने अथवा चुनावी घोषणाएं करने से सुनिश्चित नहीं होगी। इसके लिए राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के चयन में पारदर्शिता, गंभीर आपराधिक मामलों की समयबद्ध सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

