उत्तर प्रदेश की सियासत में जातियों का नया गणित और 2027 की चुनावी चुनौती
भाजपा के सामने सत्ता-विरोधी रुझान और सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती, अखिलेश यादव के पीडीए प्रयोग की अग्निपरीक्षा, मायावती की संभावित भूमिका और ब्राह्मण मतदाताओं की बदलती राजनीतिक प्राथमिकताएँ
–उषा रावत –
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही 2027 में होने हैं, लेकिन राजनीतिक दलों की तैयारियों और सामाजिक समीकरणों में बदलाव के संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं। देश की सबसे अधिक विधानसभा सीटों वाले इस राज्य की राजनीति अब केवल हिंदुत्व बनाम सामाजिक न्याय अथवा भाजपा बनाम समाजवादी पार्टी के पुराने खाँचों में नहीं समेटी जा सकती। जातीय पहचान, कल्याणकारी योजनाएँ, नेतृत्व की विश्वसनीयता, स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसे विषय आगामी चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। विशेष रूप से ब्राह्मण मतदाताओं की राजनीतिक भूमिका और पिछड़े, दलित तथा अल्पसंख्यक समुदायों के बीच नए गठबंधनों की संभावनाएँ महत्वपूर्ण हो गई हैं।
अंग्रेजी दैनिक द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित दो राजनीतिक विश्लेषण इस बदलते परिदृश्य को समझने का उपयोगी आधार प्रस्तुत करते हैं। इंद्रजीत राय ने उत्तर प्रदेश में सत्ता-विरोधी रुझान, विपक्ष की रणनीति, चुनावी प्रबंधन और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के संभावित प्रभावों पर विचार किया है। दूसरे विश्लेषण में शशांक चतुर्वेदी, डेविड एन. गेलनर और संजय कुमार पांडेय ने ब्राह्मण समुदाय की ऐतिहासिक राजनीतिक भूमिका और उसके बदलते चुनावी व्यवहार की पड़ताल की है। इन दोनों अध्ययनों से उठने वाले सवालों को उत्तर प्रदेश के व्यापक राजनीतिक इतिहास और हाल के चुनावी परिणामों के संदर्भ में देखना आवश्यक है।
विधानसभा और लोकसभा के अलग-अलग जनादेश
उत्तर प्रदेश के हालिया चुनावी परिणामों में एक दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 403 में से 255 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। समाजवादी पार्टी को 111 और बहुजन समाज पार्टी को केवल एक सीट मिली। लेकिन दो वर्ष बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बदल गई। भाजपा 2019 की 62 सीटों से घटकर 33 पर आ गई, जबकि समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीत लीं। सपा-कांग्रेस गठबंधन की कुल 43 सीटें भाजपा के लिए स्पष्ट राजनीतिक चेतावनी थीं।
हालाँकि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मतदाताओं की प्राथमिकताएँ अलग हो सकती हैं। राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रति समर्थन का अर्थ राज्य सरकार से संतुष्टि नहीं है और राज्य सरकार की लोकप्रियता का मतलब राष्ट्रीय चुनाव में समान परिणाम भी नहीं होता। भाजपा के सामने चुनौती यही है कि वह 2022 का जनादेश दोहरा पाएगी या 2024 में उभरे असंतोष का विस्तार होगा।
लगातार दस वर्षों के शासन के बाद भाजपा को तीन स्तरों पर सत्ता-विरोधी भावनाओं का सामना करना पड़ सकता है। पहला राज्य सरकार के कामकाज से जुड़ा असंतोष, दूसरा केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति प्रतिक्रिया और तीसरा स्थानीय विधायकों के विरुद्ध शिकायतें। इन तीनों का प्रभाव हर विधानसभा क्षेत्र में समान नहीं होगा। यही कारण है कि उम्मीदवारों के चयन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों का महत्व बढ़ गया है।
ब्राह्मण राजनीति की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय की भूमिका केवल उसकी आबादी से निर्धारित नहीं होती। राज्य की आबादी में उसकी हिस्सेदारी लगभग नौ से ग्यारह प्रतिशत अनुमानित है, लेकिन राजनीतिक प्रभाव कई क्षेत्रों में इससे अधिक रहा है। स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक कांग्रेस के नेतृत्व और सत्ता संरचना में ब्राह्मण नेताओं का वर्चस्व था। गोविंद बल्लभ पंत, संपूर्णानंद, चंद्रभानु गुप्त, कमलापति त्रिपाठी और नारायण दत्त तिवारी जैसे नेताओं ने राज्य की राजनीति को दिशा दी।
मंडल आयोग की सिफारिशों के क्रियान्वयन और राम मंदिर आंदोलन के बाद राजनीतिक समीकरण बदलने लगे। पिछड़ी जातियों और दलित समुदायों के राजनीतिक उभार ने कांग्रेस के पुराने सामाजिक गठबंधन को कमजोर किया। इसी दौर में भाजपा ने हिंदुत्व के साथ सामाजिक विस्तार की रणनीति अपनाई और ब्राह्मण समुदाय उसके प्रमुख समर्थक वर्गों में शामिल हो गया।
वर्ष 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण सामाजिक गठबंधन के माध्यम से इस स्थापित समीकरण को चुनौती दी। बसपा ने 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। यह प्रयोग बताता है कि उत्तर प्रदेश में किसी जाति का समर्थन स्थायी रूप से एक ही दल के पास नहीं रहता। हालाँकि उस विजय को केवल ब्राह्मण समर्थन का परिणाम मानना भी गलत होगा। उसमें दलित आधार, अन्य जातियों की भागीदारी और उम्मीदवारों के चयन की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
क्या भाजपा से ब्राह्मण मतदाता दूर हो रहे हैं?
वर्तमान राजनीतिक चर्चा में ब्राह्मण समुदाय के एक हिस्से में उपेक्षा की भावना का उल्लेख हो रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, प्रशासनिक नियुक्तियों और कुछ धार्मिक विवादों को लेकर असंतोष की धारणाएँ सामने आई हैं। लेकिन इन धारणाओं को पूरे समुदाय का राजनीतिक रुख मान लेना जल्दबाजी होगी।
भाजपा के पास अब भी मजबूत संगठन, व्यापक सामाजिक गठबंधन और ब्राह्मण नेताओं का महत्वपूर्ण प्रतिनिधित्व है। फिर भी चुनाव में केवल विपक्ष के पक्ष में मतों का स्थानांतरण ही निर्णायक नहीं होता। किसी समर्थक वर्ग के मतदान प्रतिशत में गिरावट भी परिणाम बदल सकती है। जिन सीटों पर जीत का अंतर कुछ हजार मतों का होता है, वहाँ यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
ब्राह्मण मतदाताओं की इसी संभावित भूमिका को देखते हुए समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा भी सक्रिय हैं। कांग्रेस ने आराधना मिश्रा को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अपने पुराने सामाजिक आधार से दोबारा जुड़ने का संकेत दिया है। अखिलेश यादव ने पीडीए की व्याख्या में ‘पंडित’ को भी स्थान देने का प्रयास किया है।
अखिलेश यादव के पीडीए की अग्निपरीक्षा
समाजवादी पार्टी ने पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों को जोड़ने के लिए पीडीए का राजनीतिक सूत्र प्रस्तुत किया। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में इस रणनीति को उल्लेखनीय सफलता मिली। विशेष रूप से गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलित समुदायों तक पहुँचने के प्रयास ने सपा की पारंपरिक मुस्लिम-यादव पहचान को विस्तार दिया।
लेकिन लोकसभा की सफलता को विधानसभा की जीत में बदलना आसान नहीं होगा। इसके लिए सामाजिक गठबंधन को स्थानीय स्तर पर टिकाऊ बनाना पड़ेगा। उम्मीदवारों के चयन में विभिन्न समुदायों को प्रतिनिधित्व देने के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि एक समूह को जोड़ने के प्रयास में दूसरा समूह अलग न हो जाए।
कांग्रेस के साथ गठबंधन भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। दोनों दलों के बीच सीटों के बँटवारे और स्थानीय कार्यकर्ताओं की प्रतिस्पर्धा से तनाव उत्पन्न हो सकता है। राजनीतिक सहयोग तभी प्रभावी होगा, जब मतदाताओं के बीच भी परस्पर स्वीकार्यता विकसित हो।
मायावती की भूमिका को नज़रअंदाज़ करना भूल होगी
बहुजन समाज पार्टी की विधानसभा में उपस्थिति भले ही लगभग समाप्त हो गई हो, लेकिन उसका सामाजिक आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा को लगभग 12.9 प्रतिशत और 2024 के लोकसभा चुनाव में लगभग 9.4 प्रतिशत मत मिले।
यह मत प्रतिशत चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। विशेषकर त्रिकोणीय मुकाबलों में बसपा के उम्मीदवार भाजपा और सपा दोनों की संभावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं। मायावती की चुनौती अपने परंपरागत दलित आधार को पुनर्गठित करने और अन्य समुदायों का विश्वास प्राप्त करने की है।
यदि बसपा पुनर्जीवित होती है तो उसका नुकसान केवल किसी एक दल को होगा, यह निश्चित नहीं है। परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि किस क्षेत्र में उसके उम्मीदवार किस सामाजिक समूह का समर्थन प्राप्त करते हैं।
कल्याणकारी योजनाएँ और मतदाता सूची का सवाल
जातीय समीकरणों के अतिरिक्त कल्याणकारी योजनाएँ भी महत्वपूर्ण रहेंगी। मुफ्त राशन, आवास, किसान सहायता, महिलाओं से संबंधित योजनाएँ और प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ भाजपा के लिए समर्थन जुटाने के साधन हैं। दूसरी ओर विपक्ष रोजगार, महँगाई, भर्ती परीक्षाओं, किसानों की आय और स्थानीय समस्याओं को प्रमुख मुद्दे बनाने का प्रयास करेगा।
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण भी राजनीतिक विवाद का विषय बन सकता है। विपक्ष को आशंका है कि पात्र मतदाताओं के नाम हटने से चुनावी प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सूची की शुद्धता और प्रत्येक पात्र नागरिक का मताधिकार सुनिश्चित करना है। इस प्रक्रिया का मूल्यांकन आरोपों के बजाय पारदर्शिता, अपील की सुविधा और वास्तविक निष्कासन के प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
कानून-व्यवस्था बनाम सामाजिक न्याय
योगी आदित्यनाथ सरकार कानून-व्यवस्था, सड़क निर्माण, निवेश, धार्मिक पर्यटन और प्रशासनिक सख्ती को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती रही है। विपक्ष बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, पुलिस कार्रवाई और नागरिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न उठाता है।
अक्टूबर 2026 में सामने आए एक समाचार18 सर्वेक्षण में कानून-व्यवस्था को मतदाताओं की प्रमुख चिंताओं में पाया गया। सर्वेक्षण ने भाजपा गठबंधन को बढ़त भी दिखाई। हालाँकि ऐसे सर्वेक्षण उस समय की जनधारणा के संकेत होते हैं, अंतिम चुनाव परिणाम की गारंटी नहीं।
यही तथ्य विपक्ष के लिए भी महत्वपूर्ण है। केवल सत्ता-विरोधी भावनाओं के आधार पर चुनाव जीतने की अपेक्षा पर्याप्त नहीं होगी। उसे शासन का विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना पड़ेगा।
जातीय अंकगणित से आगे का चुनाव
उत्तर प्रदेश का 2027 का चुनाव संभवतः तीन स्तरों पर लड़ा जाएगा। पहला सामाजिक गठबंधनों की मजबूती, दूसरा सरकार और विपक्ष के नेतृत्व की विश्वसनीयता तथा तीसरा मतदान केंद्र तक समर्थकों को पहुँचाने की संगठनात्मक क्षमता।
भाजपा के सामने अपने परंपरागत समर्थकों को बनाए रखते हुए पिछड़ी और दलित जातियों में विस्तार कायम रखने की चुनौती है। समाजवादी पार्टी को पीडीए की सामाजिक विविधता को स्थायी राजनीतिक विश्वास में बदलना होगा। कांग्रेस को अपनी सीमित संगठनात्मक शक्ति बढ़ानी होगी और बसपा को यह साबित करना होगा कि वह अब भी स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्तर प्रदेश का मतदाता किसी एक जातीय पहचान या धार्मिक मुद्दे से पूरी तरह परिभाषित नहीं होता। एक ही परिवार में कल्याणकारी योजनाओं का लाभ, रोजगार की चिंता, सामाजिक प्रतिष्ठा और राजनीतिक विचारधारा अलग-अलग चुनावी प्राथमिकताएँ पैदा कर सकते हैं।
इसलिए 2027 का चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि लखनऊ की सत्ता किसके हाथ में होगी। वह यह भी बताएगा कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में हिंदुत्व, सामाजिक न्याय और जातीय प्रतिनिधित्व के बीच किस प्रकार का नया संतुलन उभर रहा है। वर्ष 2024 ने सिद्ध किया कि स्थापित राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। अब देखना यह है कि 2027 में यह परिवर्तन स्थायी दिशा लेता है या भाजपा अपनी संगठनात्मक शक्ति और व्यापक सामाजिक आधार के सहारे तीसरी बार सत्ता प्राप्त करती है।

