जौनसार में जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगाने की मांग
केंद्र के फैसले तक प्रमाणपत्र जारी न करने और पूर्व में जारी सभी प्रमाणपत्रों की जांच की मांग
देहरादून, 26 अक्टूबर। जौनसार-बावर क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने को लेकर विवाद एक बार फिर सामने आया है। आरटीआई कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता विकेश नेगी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और देहरादून जिला प्रशासन से मांग की है कि केंद्र सरकार के अंतिम निर्णय तक जौनसार क्षेत्र में नए अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने पर रोक लगाई जाए। उन्होंने पूर्व में जारी प्रमाणपत्रों की पात्रता की जांच कराने की भी मांग की है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में अनुसूचित जनजाति संबंधी अभिलेखों में दर्ज ‘जन्नासरी’ शब्द के स्थान पर ‘जौनसारी’ शब्द संशोधित कराने के लिए केंद्र सरकार को संस्तुति भेजने का निर्णय लिया गया है। लंबे समय से इस मुद्दे को उठा रहे अधिवक्ता विकेश नेगी ने इस निर्णय के बाद प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
नेगी का आरोप है कि पूर्ववर्ती सरकारों के गलत निर्णयों के कारण जौनसार क्षेत्र में बड़ी संख्या में अपात्र व्यक्तियों ने अनुसूचित जनजाति आरक्षण का लाभ उठाया है, जबकि वास्तविक रूप से वंचित समुदाय आज भी विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। उनका कहना है कि कोल्टा और बाजगी समुदाय के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि जौनसार क्षेत्र के ब्राह्मण, खस और क्षत्रिय समुदायों के ऐसे व्यक्तियों को भी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं, जो उनके अनुसार इस आरक्षण के पात्र नहीं हैं। नेगी ने 28 नवंबर 2000 के बाद जारी प्रमाणपत्रों की वैधता पर भी सवाल उठाते हुए उनकी व्यापक जांच कराने की मांग की है।
अधिवक्ता नेगी के अनुसार, 1967 के संबंधित संवैधानिक प्रावधानों तथा लोकुर समिति की रिपोर्ट में अनुसूचित जनजाति की पहचान के लिए समुदाय आधारित मानदंडों का उल्लेख है। उनका तर्क है कि केवल किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र का निवासी होने के आधार पर अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक सूची में संशोधन का अधिकार संसद को है और राज्य सरकार अपने स्तर पर इसमें बदलाव नहीं कर सकती।
नेगी ने जिला प्रशासन से मांग की कि जिन व्यक्तियों को निर्धारित पात्रता के विपरीत प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं, उनकी जांच कर नियमानुसार निरस्तीकरण की कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का निर्णय आने तक नए प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया स्थगित रखी जानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि यह मामला उच्च न्यायालय में भी विचाराधीन है और न्यायालय ने राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा है। नेगी ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इस संबंध में आवश्यक कदम नहीं उठाए तो वह दोबारा न्यायालय की शरण ले सकते हैं।
हालांकि, मंत्रिमंडल द्वारा केंद्र को शब्द संशोधन की संस्तुति भेजने के निर्णय से पूर्व में जारी सभी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र स्वतः अवैध नहीं हो जाते। उनकी वैधता का निर्धारण संबंधित संवैधानिक प्रावधानों, लागू नियमों और सक्षम प्राधिकारी अथवा न्यायालय के निर्णय के आधार पर ही किया जा सकता है।

