शिक्षा/साहित्य

भारतीय शिक्षा परंपरा, मैकॉले की नीति और समकालीन शिक्षा पर हुआ मंथन


मुरादाबाद,  26 अक्टूबर । । तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी (TMU) के ‘सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम’ (CIKS) के तत्वावधान में “औपनिवेशिक संपर्क से मैकॉले के मिनट और अंग्रेज़ी शिक्षा प्रणाली का विकास” विषय पर 18वीं राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव का सफल आयोजन किया गया। इस दौरान विशेषज्ञों ने भारतीय पारंपरिक शिक्षा व्यवस्था, गुरु-शिष्य संस्कृति और औपनिवेशिक शिक्षा नीतियों के दूरगामी प्रभावों पर विस्तार से चर्चा की।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की वंदना से हुआ। कॉन्क्लेव में वर्धमान कॉलेज (बिजनौर) के प्राचीन इतिहास विभाग के प्रो. यशवेंद्र धाका और ‘ध्यानशाला’ के संस्थापक व शिक्षाविद् शुभम सिंह ने बतौर विशेषज्ञ वक्ता अपने विचार साझा किए।

डिग्री और रोजगार तक सीमित न रहे शिक्षा : वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना या रोजगार पाना नहीं होना चाहिए। इसका मूल उद्देश्य छात्र-छात्राओं में ज्ञान, विवेक, नैतिक मूल्यों, रचनात्मकता, स्वतंत्र चिंतन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है। शुभम सिंह ने “भारत की शिक्षाः एक सभ्यता का संघर्ष” विषय पर अपने विचार रखते हुए तक्षशिला और नालंदा जैसे प्राचीन ज्ञान केंद्रों की गौरवशाली विरासत का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में भारतीय शिक्षा की बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपराओं को समझना बेहद जरूरी है।

मैकॉले मिनट और वुड्स डिस्पैच पर चर्चा : व्याख्यान के दौरान 1835 के मैकॉले मिनट, ‘अधोमुखी निस्पंदन सिद्धांत’ (Downward Filtration Theory) और 1854 के वुड्स डिस्पैच जैसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक प्रसंगों पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय शिक्षा व्यवस्था, इसकी भाषा, पाठ्यक्रम, शिक्षण-पद्धति और संस्थागत संरचना में बड़े बदलाव किए गए। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के विकासक्रम को समझने के लिए इन ऐतिहासिक नीतियों का आलोचनात्मक अध्ययन बेहद आवश्यक है।

मातृभाषा में शिक्षा और शोध पर जोर : कार्यक्रम में मातृभाषा और अन्य भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक सामग्री विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच सार्थक संवाद स्थापित करके ही शिक्षा को अधिक समावेशी और उपयोगी बनाया जा सकता है। इसके लिए शोध, अनुवाद और परियोजना-आधारित अध्ययन को प्रोत्साहित करना जरूरी है। भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन शिक्षा से जोड़ने के लिए केवल अतीत का गुणगान पर्याप्त नहीं है, बल्कि बौद्धिक प्रमाणों के आधार पर इसका गंभीर अध्ययन होना चाहिए।

इस महत्वपूर्ण कॉन्क्लेव में TMU के कुलपति प्रो. वी.के. जैन, डीन-अकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन, कॉलेज ऑफ एजुकेशन के प्राचार्य व कन्वीनर डॉ. विनोद कुमार जैन और CIKS की कोऑर्डिनेटर डॉ. अलका अग्रवाल समेत कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. माधव शर्मा ने किया।

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