नेहरू और पटेल : मतभेदों की आड़ में ऐतिहासिक साझेदारी को नकारने का राजनीतिक प्रपंच
— गोविन्द प्रसाद बहुगुणा-
पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के संबंधों में गहरे मतभेद और परस्पर विरोध की जो धारणा आज कुछ कट्टरपंथी विचारधारा के लोगों द्वारा प्रचारित की जा रही है, वह ऐतिहासिक तथ्यों की एकतरफा और भ्रामक व्याख्या है। विशेष रूप से नेहरूजी की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से दोनों महान नेताओं के संबंधों को अनावश्यक रूप से विवादास्पद बनाया जाता रहा है। मैंने नेहरूजी और सरदार पटेल के बीच हुए निजी एवं महत्वपूर्ण पत्राचार का गंभीरता से अध्ययन किया है। मुझे उनमें कहीं भी ऐसी व्यक्तिगत शत्रुता अथवा स्थायी वैचारिक खाई दिखाई नहीं दी, जिसके आधार पर दोनों को एक-दूसरे का कट्टर विरोधी सिद्ध किया जा सके। निस्संदेह, कुछ राष्ट्रीय और प्रशासनिक प्रश्नों पर उनके दृष्टिकोण अलग थे, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में विचारों की भिन्नता स्वाभाविक है। इस प्रकार के मतभेद तो एक ही परिवार में दो भाइयों अथवा पिता और पुत्र के बीच भी होते रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके पारस्परिक विश्वास, आत्मीयता और साझा उद्देश्यों में कोई कमी आ गई थी। दोनों नेताओं का पत्राचार आज भी ऐतिहासिक अभिलेखों में सुरक्षित है और इतिहास की गंभीर पड़ताल करने वाला कोई भी व्यक्ति उसका अध्ययन कर सकता है।
वास्तव में नेहरू और पटेल के संबंधों को समझने के लिए तत्कालीन परिस्थितियों, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के सामने उपस्थित असाधारण चुनौतियों और दोनों नेताओं की अलग-अलग कार्यशैलियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। नेहरू आधुनिक, लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले भारत के निर्माण का स्वप्न देख रहे थे, जबकि पटेल राष्ट्रीय एकीकरण, प्रशासनिक दृढ़ता और आंतरिक स्थिरता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे थे। ये प्राथमिकताएं परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की एक-दूसरे की पूरक आवश्यकताएं थीं। अनेक मुद्दों पर उनके बीच असहमतियां अवश्य थीं, लेकिन दोनों महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे संघर्ष से निकले हुए साथी थे और स्वतंत्र भारत की एकता तथा अखंडता के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध थे।
यह भी ऐतिहासिक तथ्य है कि नेहरू और पटेल के बीच कश्मीर, हैदराबाद, विदेश नीति तथा कुछ प्रशासनिक निर्णयों को लेकर वास्तविक मतभेद सामने आए थे। महात्मा गांधी को भी कभी-कभी दोनों के बीच समन्वय स्थापित करने की आवश्यकता महसूस हुई थी। किंतु इन असहमतियों को व्यक्तिगत शत्रुता का प्रमाण मान लेना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। दोनों नेताओं ने स्वतंत्र भारत की पहली सरकार में साथ काम किया। पटेल ने उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री के रूप में नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। देशी रियासतों के एकीकरण में पटेल के असाधारण योगदान को नेहरू ने भी स्वीकार किया। दूसरी ओर, पटेल ने भी अनेक अवसरों पर नेहरू के नेतृत्व और राष्ट्रीय योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त किया। विशेष रूप से गांधीजी की हत्या के बाद दोनों नेताओं के पत्राचार में पारस्परिक विश्वास और साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखाई देती है।
इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज कुछ लोग सरदार पटेल का महिमामंडन करने के लिए नेहरू को छोटा दिखाना आवश्यक समझते हैं। ऐसा करते समय वे भूल जाते हैं कि दोनों नेता किसी एक राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्र निर्माण की साझा विरासत हैं। पटेल की महानता सिद्ध करने के लिए नेहरू को बदनाम करना उतना ही अनुचित है, जितना नेहरू की उपलब्धियों को रेखांकित करने के लिए पटेल के योगदान को कम करके आंकना। दोनों की कार्यशैली, व्यक्तित्व और राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग थीं, लेकिन स्वतंत्र, एकजुट और सशक्त भारत का निर्माण उनका साझा लक्ष्य था।
इतिहास का मूल्यांकन वर्तमान राजनीतिक सुविधाओं और पूर्वाग्रहों से नहीं, बल्कि प्रामाणिक दस्तावेजों, पत्राचार और तत्कालीन परिस्थितियों के समग्र अध्ययन से होना चाहिए। नेहरू और पटेल को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत करना स्वतंत्र भारत के निर्माण में उनकी ऐतिहासिक साझेदारी के साथ अन्याय है।

