धर्म/संस्कृति/ चारधाम यात्राब्लॉग

दीपावली के अनेक रूप, गोवा की भोर से जौनसार की दियाई तक

This article  highlights the diverse, regional manifestations of Diwali across India, moving beyond the mainstream narrative of Lord Ram’s return. It explores unique traditions: burning Narkasur effigies in Goa, worshipping ancestors with flaming jute stalks in Puri, and celebrating livestock and harvests during Jharkhand’s ‘Sohraay’. In Uttarakhand, customs vary significantly, from creating ‘Aipan’ floor art to celebrating ‘Igas Bagwal’ with fire rings eleven days later, or ‘Budhi Diwali’ a month later. Ultimately, the author emphasizes that these varied customs beautifully reflect local ecosystems, ancestral reverence, and folklore, urging readers to appreciate cultural diversity over blind superstition.

— जयसिंह रावत —

गोवा में दीपावली की शुरुआत उस वक्त हो जाती है, जब रात का अंधेरा अभी छंटा भी नहीं होता। गांवों और मोहल्लों में रात भर दिखाए गए नरकासुर के पुतले भोर से पहले जला दिए जाते हैं। पुरी में इसी पर्व पर लोग जूट की सूखी डंडियां जलाकर अपने पुरखों को याद करते हैं। उत्तराखंड के जौनसार-बावर में दीपावली का एक स्थानीय रूप करीब महीने भर बाद दिखाई देता है। वहां उसे ‘दियाई’ कहते हैं। इन तीन दृश्यों से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक ही पर्व को देश के अलग-अलग इलाकों ने अपनी स्मृतियों, लोककथाओं और जीवन-पद्धति से कैसे जोड़ा है।

कहीं नरकासुर का दहन, कहीं काली पूजा

उत्तर भारत के बड़े हिस्से में दीपावली का परिचित दृश्य है घर की सफाई, चौखट पर दीये, लक्ष्मी-गणेश की पूजा और मिठाई का आदान-प्रदान। राम के अयोध्या लौटने की कथा भी इस पर्व से जुड़ी है। गोवा में कृष्ण और नरकासुर की कथा प्रमुखता से सामने आती है। वहां बांस, कागज और कपड़े से नरकासुर के विशाल पुतले बनाने में मोहल्ले के लोग मिलकर जुटते हैं। कुछ जगह उनकी झांकियां निकलती हैं और प्रतियोगिताएं होती हैं। उत्तर भारत में दशहरे पर रावण के पुतले का दहन देखने वाले पाठक गोवा की इस परंपरा से सहज ही जुड़ सकते हैं। फर्क यह है कि यहां पुतला दीपावली की भोर से पहले जलाया जाता है।

पश्चिम बंगाल में इसी अमावस्या की रात मां काली की पूजा होती है। इसे श्यामा पूजा भी कहते हैं। कोलकाता सहित अनेक स्थानों पर प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं और रात में पूजा होती है। उधर, ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर की 22 सीढ़ियों से जुड़ी ‘बड़बड़िया डाका’ की रीति दीपावली को पुरखों की स्मृति से जोड़ती है। जूट की सूखी डंडियों का गट्ठर जलाकर ऊपर उठाया जाता है। लोकमान्यता में उसकी लौ पूर्वजों को राह दिखाने का प्रतीक है। घर की चौखट पर रखा दीप जहां स्वागत का भाव लिए होता है, वहीं पुरी में उठाई गई लौ उन लोगों की याद दिलाती है जो कभी उसी घर-परिवार का हिस्सा थे।

फसल और पशुधन के नाम भी एक पर्व

झारखंड के कुछ इलाकों में दीपावली के आसपास सोहराय मनाया जाता है। मुंडा, उरांव और संताल सहित कई समुदायों में इस पर्व का संबंध फसल और पशुधन से है। गाय-बैलों को सजाया जाता है, दीप जलाए जाते हैं और गीत गाए जाते हैं। खेती में जिन पशुओं का साल भर साथ मिलता है, उनके प्रति आभार जताने का यह अवसर है। सोहराय का समय भी हर जगह एक जैसा नहीं है। कुछ इलाकों में यह दीपावली के आसपास आता है, जबकि संताल परगना के कुछ हिस्सों में जनवरी में मनाया जाता है। उसकी अपनी पहचान समझने के लिए इस फर्क को ध्यान में रखना जरूरी है।

दक्षिणी ओडिशा के परजा, सओरा और गदबा जैसे समुदायों में तीन दिन की ‘दियाली’ में गाय-बैलों की पूजा का विशेष स्थान है। इन परंपराओं में समृद्धि का अर्थ रोजमर्रा के जीवन से समझ में आता है। जिस परिवार की आजीविका खेत से चलती है, उसके लिए अच्छी फसल और स्वस्थ पशुधन भी संपन्नता हैं। सोहराय और दियाली की रस्मों में खेती, पशुधन और परिवार का यही रिश्ता दिखाई देता है।

पहाड़ में फिर लौटता है दीपों का पर्व

उत्तराखंड में दीपावली का कैलेंडर भी स्थानीय परंपराओं के साथ बदलता है। गढ़वाल में दीपावली के ग्यारह दिन बाद इगास बग्वाल मनाई जाती है। इसकी खास पहचान है ‘भैलो’ खेलना। चीड़ की जलती लकड़ियों के छोटे गट्ठर घुमाने पर अंधेरे में आग के घेरे बनते हैं। एक लोककथा कहती है कि राम के अयोध्या लौटने का समाचार पहाड़ों में ग्यारह दिन देर से पहुंचा। इस कथा के साथ लोकगीत, पारंपरिक पकवान और सामूहिक उत्सव की अपनी जगह है।

जौनसार-बावर के जौनसारी समुदाय की ‘दियाई’, जिसे बूढ़ी दीपावली भी कहते हैं, करीब एक महीने बाद अगली अमावस्या के आसपास आती है। यहां लोकगीत और सामूहिक नृत्य उत्सव की पहचान हैं। एक ही राज्य में कहीं ग्यारह दिन बाद भैलो खेला जाता है और कहीं अगली अमावस्या पर दियाई मनाई जाती है। पहाड़ के इन दो उत्सवों को उनकी स्थानीय पहचान के साथ देखने पर समझ आता है कि ‘बूढ़ी दीपावली’ जैसे प्रचलित नाम के भीतर भी अलग-अलग परंपराएं हैं।

परंपरा के साथ विवेक भी

दीपावली से जुड़ी हर धारणा को उसी तरह स्वीकार करना जरूरी नहीं है, जिस तरह हम किसी लोकगीत या पारिवारिक रीति को अपनाते हैं। हवा से दीया बुझ जाए तो उसे फिर जलाया जा सकता है। उसमें अनिष्ट का संकेत ढूंढ़ने से त्योहार की खुशी घटती है। इसी तरह उल्लू को लक्ष्मी का वाहन मानने की मान्यता से कुछ लोग यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उसकी बलि देने से धन मिलेगा या कोई सिद्धि प्राप्त होगी। इस दावे का कोई प्रमाण नहीं है। किसी जीव को आस्था में सम्मान देना और उसी की जान लेकर समृद्धि की आशा करना परस्पर विरोधी बातें हैं।

दीपावली के ये अलग-अलग रूप बताते हैं कि लोग अपनी दुनिया में किन चीजों को सहेजना चाहते हैं। पुरी में कोई अपने पुरखों को याद करता है, झारखंड के किसी गांव में किसान अपने बैलों को सजाता है और जौनसार में लोग अगली अमावस्या पर लोकगीतों के बीच फिर जुटते हैं। दीपावली को समझने के लिए इन छोटे दृश्यों को देखना भी उतना ही जरूरी है, जितना रोशनी से सजे किसी बड़े शहर को देखना।

उत्तराखंड की दीपावली में ऐपण, बग्वाल और भैलो

कुमाऊं में दीपावली की तैयारी घर की देहरी से शुरू होती है। गेरू से लीपी देहरी और आंगन पर चावल के घोल से सफेद आकृतियां बनाई जाती हैं। इस लोककला को ‘ऐपण’ कहते हैं। पूजा की चौकी सजाने के साथ देहरी से पूजास्थल की ओर जाते छोटे-छोटे पदचिह्न बनाए जाते हैं। इन्हें ‘लक्ष्मी के पैर’ कहते हैं और घर में समृद्धि के स्वागत का प्रतीक मानते हैं। कई परिवारों में गन्ने और केले के पत्तों से लक्ष्मी का स्वरूप बनाने की परंपरा भी है। कुमाऊं में दीपावली का एक पुराना नाम ‘च्यूड़ा बग्वाल’ भी है, जिसमें धान से बने च्यूड़े की जगह रही है।

गढ़वाल में कार्तिक अमावस्या की दीपावली को ‘बग्वाल’ भी कहते हैं। उस शाम घरों की देहरियों और आंगनों में दीप जलते हैं। गढ़वाल के कई इलाकों में इसके ग्यारह दिन बाद इगास बग्वाल पर गांव के लोग फिर जुटते हैं। इसकी खास पहचान ‘भैलो’ है। चीड़ की जलती लकड़ियों के छोटे गट्ठर जब घुमाए जाते हैं, तो अंधेरे में आग के घेरे बनते हैं। लोकगीतों और पारंपरिक पकवानों के बीच मनाई जाने वाली इगास से एक लोककथा भी जुड़ी है। उसके अनुसार, राम के अयोध्या लौटने का समाचार पहाड़ों में ग्यारह दिन बाद पहुंचा था।

देहरादून जिले के जौनसार-बावर में जौनसारी समुदाय की ‘दियाई’ का समय अलग है। इसे बूढ़ी दीपावली भी कहते हैं और कार्तिक की दीपावली के करीब एक महीने बाद, अगली अमावस्या के आसपास मनाते हैं। लोकगीत और सामूहिक नृत्य इस उत्सव की पहचान हैं। इस तरह उत्तराखंड में दीपावली के अलग-अलग दृश्य दिखाई देते हैं। कुमाऊं में देहरी पर बने लक्ष्मी के सफेद पदचिह्न, गढ़वाल में इगास की रात घूमता भैलो और जौनसार में अगली अमावस्या पर गूंजते लोकगीत।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!