धूल के कणों से खुलेंगे सूर्य जैसे तारों के अंतिम दौर के रहस्य
-ज्योति रावत –
सूर्य जैसे तारों के जीवन के अंतिम दौर को समझने में उनके आसपास फैली धूल अहम सुराग दे सकती है। भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने ‘आईसी 2003’ नाम की ग्रहीय नीहारिका का अध्ययन कर पाया कि धूल के कण उसके भीतर की गैस के तापमान को प्रभावित करते हैं। गणना में धूल को शामिल करने पर नीहारिका और उसके केंद्र में बचे तारे के तापमान और द्रव्यमान के अनुमान भी बदल गए। यह अध्ययन उन तारों के विकास को समझने में मदद कर सकता है, जिनकी सतह पर जीवन के अंतिम दौर में हाइड्रोजन बहुत कम रह जाती है।
ग्रहीय नीहारिका गैस और धूल का एक चमकीला आवरण है। सूर्य जैसे तारे अपने जीवन के अंतिम दौर में बाहरी परतें छोड़ते हैं, जिनसे यह आवरण बनता है। पीछे बचा छोटा और बेहद गर्म केंद्रीय तारा पराबैंगनी किरणें छोड़ता है। ये किरणें आसपास की गैस के परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन अलग कर देती हैं। इस प्रक्रिया को आयनीकरण कहते हैं। इसी गैस से उठती चमक दूरबीन में दिखाई देती है। छोटी दूरबीनों से देखने पर ऐसी कुछ नीहारिकाएं ग्रहों जैसी गोल दिखाई देती थीं। इसी समानता से उन्हें ‘ग्रहीय नीहारिका’ नाम मिला। सूर्य के भी करीब पांच अरब वर्ष बाद अपने जीवन के अंतिम चरणों की ओर बढ़ने का अनुमान है।
अधिकांश ग्रहीय नीहारिकाओं के केंद्रीय तारों पर हाइड्रोजन की एक पतली परत बची रहती है। करीब एक चौथाई में सतह पर हाइड्रोजन कम और हीलियम अधिक होती है। इनमें से कुछ तारों से तेज गति से पदार्थ बाहर निकलता है और उनके प्रकाश के विश्लेषण में हीलियम, कार्बन और ऑक्सीजन के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। ऐसे केंद्रीय तारों को वुल्फ–रेयेट प्रकार का कहा जाता है। आईसी 2003 के केंद्र में भी इसी प्रकार का एक तारा है। इन तारों की सतह से हाइड्रोजन कब और कैसे कम होती है, यह अब भी शोध का विषय है। उनके आसपास फैली गैस और धूल की बनावट में इस बदलाव के सुराग मिल सकते हैं।
धूल को गणना में शामिल करने से बदले अनुमान
वैज्ञानिकों ने तमिलनाडु के कवलूर स्थित वेणु बप्पू वेधशाला की 2.3 मीटर की दूरबीन से आईसी 2003 के प्रकाश का विश्लेषण किया। अध्ययन की प्रमुख लेखिका और शोध छात्रा के. खुशबू के अनुसार, दल ने आईयूई उपग्रह के पराबैंगनी और आईआरएएस उपग्रह के अवरक्त प्रेक्षणों का भी उपयोग किया। इन आंकड़ों को साथ रखकर वैज्ञानिकों ने आकलन किया कि नीहारिका के अलग-अलग हिस्सों में गैस का तापमान तय करने में धूल की कितनी भूमिका है।
अध्ययन के सहलेखक प्रो. सी. मुथुमरियाप्पन के अनुसार, केंद्रीय तारे की किरणें धूल के कणों से इलेक्ट्रॉन निकाल सकती हैं। ये इलेक्ट्रॉन अपनी ऊर्जा आसपास की गैस को देते हैं, जिससे वह गर्म होती है। गणना में इस प्रक्रिया और धूल के कणों के अलग-अलग आकारों को शामिल करने से यह समझने में मदद मिली कि नीहारिका में जगह-जगह तापमान क्यों बदलता है। तापमान का बेहतर अनुमान मिलने से वैज्ञानिक यह भी समझ सकते हैं कि गैस में किसी तत्व की मात्रा मापने के अलग-अलग तरीकों से अलग नतीजे क्यों आते हैं।
अध्ययन में केंद्रीय तारे की चमक, तापमान और द्रव्यमान का भी अनुमान लगाया गया। गणना के अनुसार, जिस मूल तारे से आईसी 2003 बनी, उसका शुरुआती द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का करीब 3.26 गुना था। धूल के असर को शामिल करने से मिले ये अनुमान उस तारे के शुरुआती जीवन से लेकर उसके मौजूदा स्वरूप तक की कड़ियां जोड़ने में मदद कर सकते हैं।

