केदारनाथ में धींगामस्ती ले डूबेगी, अतिथि देवो भव की परंपरा को क्यों लग रहा पलीता

–दिनेश शास्त्री–
केदारनाथ धाम की यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के साथ बदसलूकी की घटना पहली बार नहीं हुई है। हर बार लीपापोती होती रही, कभी ऐसी कार्रवाई नहीं हुई जो नजीर बन सके और कोई घोड़ा वाला बदसलूकी करने से पहले अंजाम के बारे में जरूर सोचे। मित्र पुलिस मित्रता इस तरह निभाती आई है कि घोड़ा चलाने वाले खुद को पूरी सड़क का मालिक समझ बैठे हैं।
उत्तराखंड की सरकार के गाल पर केदारनाथ मार्ग पर घोड़ा संचालक ही नहीं कई गुस्ताख लोग तमाचा मारते आए हैं। अतिथि देवो भव: की बात नेताओं के भाषणों में अच्छी लगती है लेकिन धरातल पर स्थिति एकदम उलट है। विडंबना यह है कि पिछले 22 सालों में राज्य में ऐसा तंत्र विकसित नहीं कर पाए हैं कि श्रद्धालुओं में यह संदेश जाए कि सचमुच अतिथि देवो भव: के सूत्र वाक्य पर यात्रा संभव है। निसंदेह दस जून की घटना अपने तरह की पहली घटना है जब भीमबली के पास दिल्ली के श्रद्धालुओं की संवेदनशीलता का पुरस्कार उन्हें लाठी डंडों से पीट कर दिया गया। अगर इस तरह के तत्वों को अतीत में ब्लैक लिस्ट कर हमेशा के लिए यात्रा मार्ग पर धंधे से बाहर कर दिया गया होता तो यह घटना न होती। घटना के बाद मुख्यमंत्री का संज्ञान लेना, फिर गिरफ्तारी और तमाम तरह की खानापूर्ति होगी लेकिन मूल सवाल जस का तस है कि आखिर वह अतिथि देवो भव: का वास्तविक माहौल हम कब तक बना पाएंगे। यह जिम्मेदारी अकेले सरकार की नहीं है। सरकार को पर्यटन और तीर्थाटन से जो राजस्व मिलता है वह नौ फीसदी के आसपास है। उसमें कांवड़ मेला है चारधाम और पूर्णागिरी समेत साहसिक पर्यटन भी शामिल है। इसे 25 फीसद तक बढ़ाया जा सकता है, तब शायद सरकार को आबकारी की जरूरत भी नहीं होगी लेकिन इस दिशा में टिक कर काम करने की जरूरत है। लफ्फाजी की नहीं और दुर्भाग्य से आज तक लफ्फाजी ज्यादा हुई है और काम कम। कभी पर्यटन प्रदेश तो कभी ऊर्जा प्रदेश, जड़ी बूटी, ऑर्गेनिक और न जाने कितने प्रदेशों के सपने बुने गए लेकिन महारत एक भी क्षेत्र में हासिल नहीं हुई। खैर इस मुद्दे पर अलग से बात करेंगे। आज अतिथि देवो भव: पर ही केंद्रित रहा जाए।
अभी हाल में कुछ दुखद खबरें सामने आई। बदरीनाथ धाम में मंदिर समिति का ही कार्मिक श्रद्धालु से धन लेकर दर्शन करवाते पकड़ा गया तो केदारनाथ में शराब तस्करी करते लोग पकड़े गए और तीसरी दुखद घटना श्रद्धालुओं के साथ मारपीट की है जिसने देवभूमि को बुरी तरह शर्मसार किया है।
आप भी देख रहे होंगे कि केदारनाथ यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या हर साल नया रिकॉर्ड बना रही है। केदारनाथ आपदा के बाद जबसे पुनर्निर्माण कार्य नजर आने लगे, श्रद्धालुओं की संख्या बदरीनाथ से ज्यादा होने लगी है जबकि बदरीनाथ की यात्रा ज्यादा सुगम है ठीक गंगोत्री की तरह, जहां मंदिर के पास तक मोटर मार्ग उपलब्ध है। उसकी तुलना में केदारनाथ धाम सर्वाधिक दुर्गम माना जा सकता है। इस अवसर को वहां कारोबार कर रहे हर वर्ग की कोशिश यह है कि आज कमाई कर ली जाए, पता नहीं कल यह मौका मिलेगा भी या नहीं। 8 गुणा 8 साइज के कमरे के पांच हजार रुपए एक रात के वसूलने की बात इसी साल सामने आई है जबकि सुविधा के नाम पर उस कमरे में एक मग तक नहीं रखा था। यात्रा मार्ग पर खासकर हेलीपैड के पास ज्यादा महंगाई दर्ज हुई है। ये काम तो सरकार को ही करना था कि खाने पीने की चीजों और रहने ठहरने की व्यवस्था के रेट निर्धारित किए जाएं लेकिन इसके लिए शर्त यही है कि आपकी कथनी और करनी में सचमुच अतिथि देवो भव की धारणा हो न कि पाखंड।
एक सवाल सहज ही पूछा जा सकता है कि वैष्णो देवी की यात्रा पर हर साल लाखों नहीं बल्कि करोड़ों लोग जाते हैं लेकिन न तो कटरा में कमरों के रेट के मामले में लूट है और न खाने पीने की चीजों के दाम आसमान पर हैं। आखिर क्या वजह है कि वहां घोड़ा डंडी, पिट्ठू के दाम निर्धारित हैं, केदारनाथ की तरह नहीं कि मांग बढ़ जाए तो दाम भी बढ़ जाए। यह नहीं भूलना चाहिए कि यात्रा पर आने वाले श्रद्धालु ही लाखों परिवारों का पेट भर रहे हैं, उनके साथ लूट, मारपीट और अभद्रता उनका मोह भंग करने का कारक बन सकती है। यह धारणा बदलनी होगी कि हम सेवा के बदले सारे मेवा आज ही बटोर लें। यकीन मानिए यह धारणा हाल के वर्षों में बलवती हुई है कि जितना कमाना है, आज ही कमा लो, न जाने कल सुबह होगी भी या नहीं। इस प्रवृत्ति पर कमाई करने वालों को बाबा केदार का ही स्मरण कर लेना चाहिए और साथ ही भरोसा भी कि अनेक पीढ़ियों की रोजी रोटी इसी धाम से चलती आ रही है। तब भी भूखे नहीं सोए थे तो कल भी भूखे नहीं रहेंगे। लिहाजा कुछ तो धर्म कर्म भी जरूर करें। याद रखना होगा कि आज कमाया हुआ बेतहाशा पैसा कल तक भी चलेगा, इस बात की गारंटी शायद भोले बाबा भी न दें। वर्ष 2013 की आपदा से अगर सबक नहीं लिया अथवा एक दशक में ही उन जख्मों को भुला दिया है तो राम ही रखवाला है। समस्या यह है कि दुर्जनों के कर्मों की सजा उन बेगुनाह लोगों को भी भुगतनी पड़ती है, जिनका यात्रा कारोबार से कोई सीधा सरोकार नहीं है लेकिन वे इसी भूभाग में रह रहे हैं। यह तो वही बात है “बसी कुसंग चाहत कुशल” ।
केदारनाथ की विधायक पिछले दिनों मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की गुहार लगाने आई थी कि सरकार ने जो अपेक्षाएं की थी अथवा जो ताना बाना बुना था, वह धरातल पर नहीं उतारा जा सका है लेकिन नतीजा क्या रहा? यह स्थिति निराशा के भंवर में धकेलने वाली है।
निसंदेह प्रदेश में पर्यटन को व्यवस्थित करने के लिए अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। समय रहते अगर यह सब हो जाए तो राज्य की छवि भी बेहतर होगी और श्रद्धालु भी बार बार आना चाहेंगे। किंतु इस तरह के दुखद हादसे नकारात्मक संदेश ही देंगे। जरूरत इसी बात की है कि जमीनी हकीकत को देखने के लिए नियंता लोग एसी कमरों से बाहर आएं अन्यथा देवभूमि का बहुत बड़ा नुकसान हो जायेगा, उसकी भरपाई संभव नहीं होगी।
