निजाम हैदराबाद के कुछ रोचक किस्से …

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
हैदराबाद आये और चार मीनार नहीं देखी तो यात्रा अधूरी मानी जाती है लेकिन मेरी दिलचस्पी यह जानने में अधिक थी कि निज़ाम हैदराबाद के बारे में जो कई खुशफमियाँ और गलत फहमियां सुनी हैं वे कितनी सच है।
यहाँ की ऐतिहासिक चार मीनार के बारे में तो आपको गूगल और विकिपीडिआ में पर्याप्त सूचना मिल जायेगी कि इसका निर्माण 1591 में हुआ था और अब यह हैदराबाद, तेलंगाना में स्थित एक स्मारक और मस्जिद है जिसकी प्रसिद्धि विश्व स्तर पर है ।
हैदराबाद के निज़ाम के बारे में प्रचलित यही बात सुनी हुई थी कि वह नम्बर एक का कंजूस आदमी था और उसके पास अकूत दौलत का खजाना था। लेकिन यहां उपलब्ध सूचना से पता चला जो निजाम के सेवकों और सहायकों ने अखबारों के जरिए खुलासा किया कि मीर उस्मान अलीखां निजाम सामाजिक हित में उदारता से दान दिया करते थे और उनको यह पसंद नहीं था कि अपने ऊपर कोई फालतू पैसा खर्च करें ।
इस तथ्य की आंशिक पुष्टि स्व० Mr.K.P.S.Menon,ICS की किताब से भी होती है। मेनन सहाब आजादी के बाद भारत के विदेश सचिव और राजदूत भी रहे तथा और वह हैदराबाद स्टेट के आखिरी दिनों में यहाँ के रेज़िडेंट जनरल के रूप में भी नियुक्त रहे ।
अपनी आत्मकथा Many Worlds में वे लिखते हैं कि पहली बार जब मैं निज़ाम से मिला तो उन्होंने मुझे चार मीनार सिगरेट ऑफर की, जो उनकी अपनी प्रोडक्ट थी -लेकिन मेरा ब्रांड वह नहीं था फिर भी मैंने संकोचवश उसे स्वीकार कर जेब में रख दिया -फिर अपनी ब्रांड की सिगरेट निकाली और उन्हें भी ऑफर की ।
उन्होंने एक नहीं दो सिगरेट मेरी डिब्बी में से खींच ली -लेकिन पी नहीं बल्कि संभाल कर रख ली -फिर वे अपनी चार मीनार सिगरेट पीने लगे और मैं अपनी ब्रांड पीने लगा -ठीक एक साल बाद जब मेरा निज़ाम सहाब से फिर मिलना हुआ, तो उस समय के स्वागत सत्कार में उन्होंने मुझे मेरी ब्रांड की वही सिगरेट निकालकर मुझे दी जो उन्होंने एक साल पहले मेरी सिगरेट डिब्बी से खोंसकर संभाल दी थी। वह कंजूस तो नहीं थे लेकिन निहायत किफायत बरतने वाले इंसान थे। वे कहते थे कि पब्लिक मनी को अपनी शानो-शौकत पर खर्च करना गलत है ।
इस मायने में वह गांधी जी की तरह सादगी पसन्द इंसान थे । बहुत पहले मैने दीवान जर्मनी दास की लिखी एक किताब पढ़ी थी जिसका टाइटिल*महाराजा* था। उसमें एक किस्सा यह था कि निजाम उस्मान अली और दत्तिया के महाराज के बीच गहरी दोस्ती थी।
निजाम को घी-मक्खन खाने का शौक था तो उसने दत्तिया के महाराजा से फरमाइश की । महाराजा ने एक दर्जन घी मक्खन के कनस्तर निजाम को भिजवा दिए । निजाम बहुत खुश हुआ और उसने वे सब कनस्तर अपने मालखाने में रखवा दिए जिनकी रोज निगरानी करवाता था ।
दो साल तक वे कनस्तर जब मालखाने पड़े रहे तो उनसे भयंकर बदबू आने लगी लेकिन किसी कर्मचारी की हिम्मत नहीं हुई यह कहने की । निजाम के प्रधानमंत्री ने जब यह सुना और देखा तो उसने निजाम को कनस्तर बाहर फेंकवाने की अर्ज की । निजाम ने उसको गाली देकर भगा दिया। फिर मंदिर के एक पुजारी रेड्डी को बुलाया कि इन घी के कनस्तरों का इस्तेमाल मंदिर में करो । पुजारी ने कहा भगवान को सड़ा माल नहीं चढ़ाते । फिर निजाम ने पुलिस कोतवाल को बुलाया कि इसको गरीबों में बांट दो। कोतवाल कनस्तर ले गया और उसने सारे कनस्तर चुपचाप कहीं नालों और गढ्ढों में फिंकवा दिया । आकर खुशी खुशी निजाम को कहा सब कनस्तर गरीबों में बंटवा दिए हैं जनता बड़ी खुश है । कोतवाल को प्रमोशन मिल गया …
