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उपाधियां और व्याधियां सबसे अधिक भारत में ही हैं

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
उपनाम/उपाधि रखने का ज्यादा रिवाज भारत में ही अधिक प्रचलन में है। यहां एक -एक हाथ लंबी उपाधियां नाम के साथ जुड़ी होती हैं । विदेशों में तो शायद ही कोई विद्वान स्वयं को जगद्गुरू या विश्वगुरु कहते होंगे।

यूनानी दार्शनिक Aristotle ने जब अपने गुरु प्लेटो को My Perceptor!! यानी * गुरु* जी कह कर संबोधित किया था तो प्लेटो ने गंभीरतापूर्वक यह कहा- “देखो भाई , मैं आज के दिन दुनिया में सबसे समझदार आदमी हूं जो अभी जिन्दा है क्योंकि मैं यह जानता हूं कि मैं कुछ नहीं जानता, फिर मैं तुम्हारा गुरु कैसे हुआ? -I am the wisest man alive , for I know one thing,and that is that I know nothing.How can I be your Perceptor ? “) यह संवाद उनके ग्रंथ The Republic में है।

लंबी उपाधियां धारण करने वाले संत महंतो की तरह यहां राजाओं की भी लंबी उपाधियां होती थी।

पौराणिक कथाओं में कुछ स्वेच्छाचारी राजाओं के नाम उनके चरित्र का भी परिचय देते हैं जैसे देवताओं के राजा इन्द्र के तीन नाम -सहस्राक्ष और सहस्रनयन और नाकपति था , रावण का नाम दशानन और दशकंध, फिर एक राजा सहस्रबाहु को सब जानते हैं ।

राजाओं/सत्ताधारियों को अपनी असुरक्षा का भय बहुत रहता था इसलिए उनकी इन्टैलीजैंस विंग में हज़ारों सैनिक जासूस के रुप में नियुक्त रहते थे जो उनको सूचना देते रहते थे, तो यही लोग प्रैक्टिकली उनकी हज़ारों आंखें और भुजाएं होती थी । आधुनिक समय में भी सेना की टुकड़ी को वाहिनी कहा जाता है ।

धर्म (भुजा) से ही Army शब्द बना होगा। खैर मूल बात यह है उपाधियां आदमी को अहंकारी बनाती है वह नार्मल आदमी की तरह व्यवहार करना छोड़ देता है। पौराणिक कथाओं में एक शक्तिशाली पात्र हनुमान को ही देखता हूं जो सबसे विनम्र और सामर्थ्य वाली पुरुष था …
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