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कैंसर चिकित्सा में नया अध्याय: वीईजीएफआर1 की संरचना ने दिखाई नई राह

चित्र 2: बाह्यकोशिकीय डोमेन (ईसीडी) से जुड़ने वाला लिगैंड रिसेप्टर डिमराइजेशन और टीएम-जेएम सेगमेंट के फिर से बनने को प्रेरित करता है। वीईजीएफआर 1 में जेएम अवरोध का धीमी गति से होना सी-टर्मिनल टेल पर क्षणिक टायरोसिन फॉस्फोराइलेशन की ओर ले जाता है। वीईजीएफआर 2 या वीईजीएफआर1 म्यूटेंट में जेएम अवरोध की त्वरित रिलीज टायरोसिन फॉस्फोराइलेशन को बनाए रखने के लिए फिर से तैयार करती है। बाएँ: जेएम अवरोध की धीमी गति से रिलीज और प्रोटीन टायरोसिन फॉस्फेट (पीटीपी) गतिविधि के बीच एक संवेदनशील संतुलन के कारण वीईजीएफआर1 की लिगैंड-स्वतंत्र सक्रियता को रोक दिया जाता है

 

By- Jyoti Rawat

शोधकर्ताओं ने एक महत्वपूर्ण आणविक तंत्र की खोज की है, जिसमें कोशिका सतह पर स्थित एक विशेष रिसेप्टर वृद्धि कारकों को नियंत्रित करने, कोशिका वृद्धि, अस्तित्व, चयापचय और आवागमन को विनियमित करने के साथ-साथ कैंसर जैसी बीमारियों की प्रक्रिया को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

वीईजीएफआर1 (VEGFR1) नामक यह रिसेप्टर-एंजाइम सामान्य परिस्थितियों में अपने लिगैंड (हार्मोन-सदृश अणु) की अनुपस्थिति में स्वयं सक्रिय होने से बचता है। यह शोध ऐसे छोटे अणुओं के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, जो वीईजीएफआर1 की निष्क्रिय अवस्था को स्थिर बनाए रखकर कोलोन और गुर्दे के कैंसर के उपचार में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

रिसेप्टर टायरोसिन काइनेज (आरटीके) कोशिका सतह पर स्थित ऐसे रिसेप्टर होते हैं, जो बाह्य कोशिकीय संकेतों को नियंत्रित कोशिकीय प्रतिक्रियाओं में परिवर्तित करते हैं। जब कोई लिगैंड रिसेप्टर से जुड़ता है, तो कोशिका के भीतर स्थित टायरोसिन काइनेज सक्रिय हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप कई टायरोसिन अणुओं में फॉस्फेट समूह जुड़ते हैं, जो विभिन्न सिग्नलिंग कॉम्प्लेक्सों के निर्माण में सहायक होते हैं। ये कॉम्प्लेक्स कोशिका वृद्धि, विकास तथा प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया जैसी अनेक जैविक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं।

लिगैंड की अनुपस्थिति में आरटीके का स्वतः सक्रिय होना अक्सर कैंसर, मधुमेह और स्व-प्रतिरक्षित विकारों जैसी कई गंभीर बीमारियों से जुड़ा होता है। इसी कारण वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि कोशिकाएं इन एंजाइमों को निष्क्रिय अवस्था में कैसे बनाए रखती हैं और रोग की स्थिति में यह नियंत्रण कैसे समाप्त हो जाता है।

कोलकाता स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) के शोधकर्ताओं ने वैस्कुलर एंडोथीलियल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर (वीईजीएफआर) परिवार के एक सदस्य वीईजीएफआर1 का अध्ययन किया। वीईजीएफआर परिवार नई रक्त वाहिकाओं के निर्माण (एंजियोजेनेसिस) की प्रक्रिया का प्रमुख नियंत्रक माना जाता है। यह प्रक्रिया भ्रूण विकास, घाव भरने, ऊतक पुनर्जनन तथा ट्यूमर निर्माण जैसी जैविक गतिविधियों के लिए आवश्यक है।

शोधकर्ताओं के लिए यह तथ्य विशेष रूप से रोचक रहा कि वीईजीएफआर परिवार के दो प्रमुख सदस्य—वीईजीएफआर1 और वीईजीएफआर2—एक-दूसरे से भिन्न व्यवहार करते हैं। जहां वीईजीएफआर2 बिना लिगैंड के भी स्वतः सक्रिय हो सकता है, वहीं वीईजीएफआर1 अत्यधिक मात्रा में उपस्थित होने पर भी स्वतः सक्रिय नहीं होता। यह एक प्रकार के “मृत एंजाइम” की तरह व्यवहार करता है और अपने लिगैंड वीईजीएफ-ए से वीईजीएफआर2 की तुलना में लगभग दस गुना अधिक मजबूती से जुड़ता है। इसके सक्रिय होने का संबंध कैंसर से जुड़े दर्द, स्तन कैंसर में ट्यूमर कोशिकाओं के जीवित रहने तथा कोलोरेक्टल कैंसर कोशिकाओं के प्रसार से पाया गया है।

आईआईएसईआर कोलकाता के डॉ. राहुल दास और उनकी टीम ने यह जानने का प्रयास किया कि वीईजीएफआर1 स्वतः सक्रिय क्यों नहीं होता। उनके अध्ययन में पता चला कि केवल वीईजीएफआर1 में पाया जाने वाला एक विशेष “आयनिक लैच” इसकी निष्क्रिय अवस्था को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह आयनिक लैच जक्सटामेम्ब्रेन खंड को काइनेज डोमेन से जोड़कर वीईजीएफआर1 की ऑटोइनहिबिटेड (स्वतः निष्क्रिय) संरचना को स्थिर बनाए रखता है।

शोधकर्ताओं ने यह भी प्रस्तावित किया कि कोशिकीय टायरोसिन फॉस्फेटेज वीईजीएफआर1 की गतिविधि को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आईआईएसईआर कोलकाता की एनालिटिकल बायोलॉजी फैसिलिटी में डीएसटी-फिस्ट समर्थित उपकरणों की सहायता से किए गए अध्ययन में यह भी संकेत मिला कि फॉस्फेट मॉड्यूलेटर कैंसर में बनने वाली असामान्य नई रक्त वाहिकाओं को नियंत्रित करने की चिकित्सीय क्षमता रखते हैं।

नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित यह शोध वीईजीएफआर सिग्नलिंग की असामान्य सक्रियता से उत्पन्न रोग स्थितियों को समझने और उनके उपचार के नए विकल्प विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। शोधकर्ताओं का मानना है कि वीईजीएफआर1 की ऑटोइनहिबिटेड अवस्था को लक्षित करने वाले छोटे अणु भविष्य में मानव कोलोरेक्टल कार्सिनोमा तथा गुर्दे के कैंसर जैसे रोगों के अधिक प्रभावी उपचार का आधार बन सकते हैं।

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