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आकाशगंगा जीएन-जेड11 की पेचीदा कहानी: गायब होते और फिर दिखते धूल के बादल

Astronomers could soon be compelled to rethink the ways of formation and evolution of the earliest galaxies in our Universe. The latest spectroscopic results from GN-z11 — identified as one of the distant and early galaxies– has confirmed a complete absence of dust particles from its surroundings for an interim time period despite possessing a very high star formationrate. The process of star formation and the subsequent stellar evolution inevitably generates massive amounts of dust and makes the host galaxy opaque to some extent due to the apparent view of a thick veil around it. This textbook-like phenomenon has been missing in GN-z11’s behaviour, leaving astronomers amazed beyond measure. A compact galaxy containing dense matter, GN-z11, was first discovered in 2015 by the Hubble Space Telescope (HST). GN-z11 displays a high redshift (of the order z = 10.95).

खगोलविद अब यह मानने लगे हैं कि कई पुरानी आकाशगंगाओं में भी समान अपारदर्शिता दिख सकती हैं लेकिन उनकी पहचान नहीं हो पाई। मगर, हाल ही में चालू हुए जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप से प्राप्‍त बेहतर डेटा के साथ निकट भविष्य में उच्च रेडशिफ्ट वाली आकाशगंगाओं का अध्ययन कहीं अधिक जटिल और रोमांचक हो सकता है।

-Edited by -Jyoti Rawat-

खगोलविदों को शायद अब ब्रह्मांड की आरंभिक आकाशगंगाओं की कहानी फिर से लिखनी पड़े। बेहद दूर स्थित और प्रारंभिक काल की मानी जाने वाली आकाशगंगा GN-z11** से मिले ताज़ा स्पेक्ट्रोस्कोपिक संकेतों ने एक चौंकाने वाला तथ्य उजागर किया है—वहां तारों का निर्माण तो तीव्र गति से हो रहा था, लेकिन किसी समय उसके आसपास धूल कण लगभग गायब थे। यह खोज वैज्ञानिकों के लिए किसी पहेली से कम नहीं।

आम तौर पर जब किसी आकाशगंगा में तेज़ी से तारे बनते हैं, तो उनके विकास और विस्फोटों से भारी मात्रा में धूल उत्पन्न होती है। यही धूल आकाशगंगा को आंशिक रूप से अपारदर्शी बना देती है। लेकिन GN-z11** इस सामान्य नियम से अलग व्यवहार करती दिखी—वह चमकीली और लगभग पारदर्शी बनी रही।

इस कॉम्पैक्ट और घनी आकाशगंगा की खोज 2015 में Hubble Space Telescope द्वारा की गई थी। इसका रेडशिफ्ट लगभग 10.95 है, जो संकेत देता है कि हम इसे उस समय की अवस्था में देख रहे हैं जब ब्रह्मांड की आयु महज 40–42 करोड़ वर्ष थी। आश्चर्यजनक रूप से, इतनी कम उम्र में ही इसने लगभग एक अरब सौर द्रव्यमान के बराबर तारे बना लिए थे। तुलना करें तो यह हमारी अपनी आकाशगंगा Milky Way के मौजूदा तारकीय द्रव्यमान का लगभग तीन प्रतिशत है।

धूल की इस रहस्यमयी अनुपस्थिति को समझने के लिए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान Raman Research Institute के वैज्ञानिकों ने विस्तृत अध्ययन किया। वरिष्ठ प्रोफेसर Biman Nath और उनके सहयोगियों ने अनुमान लगाया कि अत्यंत उग्र गतिशील घटनाओं—विशेषकर सुपरनोवा विस्फोटों—ने कुछ समय के लिए धूल की परत को नष्ट या बिखेर दिया होगा।

उनके कंप्यूटर सिमुलेशनों से पता चला कि 2 से 2.5 करोड़ वर्षों के समय-मान में तारों के तीव्र निर्माण से उत्पन्न ऊर्जा धूल की परत को “फाड़ने” के लिए पर्याप्त थी। यह एक अस्थायी अवस्था थी। सुपरनोवा विस्फोटों के बाद फैला हुआ गैसीय खोल सिकुड़ने लगा और लगभग 50 से 80 लाख वर्षों के भीतर धूल फिर से जमा होकर आकाशगंगा को धुंधला बनाने लगी। यानी पारदर्शिता और अपारदर्शिता का यह चक्र रुक-रुककर चलता रहा।

प्रो. नाथ ने अपने रूसी सहयोगियों—इवगेनी ओ. वासिलीव, सर्गेई ए. ड्रोज्डोव और यूरी ए. शचेकिनोव—के साथ हवाई द्वीप के मौना केआ स्थित Keck Observatory से प्राप्त पांच वर्षों के अवलोकनों का विश्लेषण किया। उनका शोध ‘डस्ट-फ्री स्टारबर्स्ट गैलेक्सीज एट रेडशिफ्ट जेड > 10’ शीर्षक से Royal Astronomical Society की पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसमें यह संभावना प्रस्तुत की गई है कि उच्च रेडशिफ्ट वाली कुछ आकाशगंगाएं अपने विकास के शुरुआती चरणों में अस्थायी रूप से धूल-रहित रह सकती हैं।

यह निष्कर्ष ब्रह्मांड की शुरुआती संरचनाओं को समझने के लिए बेहद अहम है। वैज्ञानिक अब मानने लगे हैं कि कई प्राचीन आकाशगंगाएं भी ऐसे ही चरणों से गुज़री होंगी, लेकिन सीमित डेटा के कारण उनकी पहचान नहीं हो सकी। हाल में सक्रिय हुए James Webb Space Telescope से मिल रहे उच्च-गुणवत्ता के आंकड़े भविष्य में इन रहस्यों की और परतें खोल सकते हैं।

संभव है कि ब्रह्मांड के आरंभिक इतिहास की यह नई कहानी हमें यह समझने में मदद करे कि प्रकाश और धूल के इस अनंत खेल में आकाशगंगाएं कैसे जन्म लेती हैं, बदलती हैं और समय के साथ अपनी पहचान गढ़ती हैं।

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