आखिर साढ़े तीन साल से सरकार के पास दबी मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट हुई सार्वजनिक

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उत्तराखंड सूचना आयोग के आदेश पर कार्यवाही पूर्ण कर विधानसभा के समक्ष रखी गयी
गृह विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली सुधार के लिये चेतावनी

देहरादून, 14 जुलाइ (उहि)। उत्तराखंड में मानवाधिकार संरक्षण के कितने भी दावे किये जाये लेकिन हकीकत कुछ और ही हैै। कई बार सूचना मांगने पर उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग ने 2012 से 2018 तक 7 वर्षों की अलग-अलग रिपोर्ट के स्थान पर एक रिपोर्ट 20 दिसम्बर 2018 को उत्तराखंड शासन के गृह विभाग को उपलब्ध करा दी लेकिन उसके द्वारा इसे विधानसभा के समक्ष रखने की कार्यवाही उत्तराखंड सूचना आयोग के आदेश पर ही हुयी। आखिकार 2012-2018 व 2019 की वार्षिक रिपोर्ट विधानसभा के जून 2022 के सत्र में पटल पर रख दी गयी। गृह विभाग के अधिकारियों ने 40 माह में जो कार्यवाही नहीं की थी, वह उत्तराखंड सूचना आयोग के विभागीय कार्यवाही के नोटिस के बाद मात्र दो माह में ही पूर्ण कर ली। सूचना आयोग ने गृह विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली सुधार के लिये चेतावनी जारी करने के आदेश भी किये हैं।

काशीपुर निवासी सूचना अधिकार कार्यकर्ता नदीम उद्दीन ने अपने सूचना प्रार्थना पत्र से उत्तराखंड मानव अधिकार आयोेग की सरकार को प्रस्तुत वार्षिक/विशेष रिपोर्टों, इस पर कार्यवाही तथा उन्हें विधानसभा के समक्ष रखने सम्बन्धी सूचनायें मांगी थी। इसके उत्तर में पहले तो लोक सूचना अधिकारी ने अतिरिक्त शुल्क रू. 260 की मांग की लेकिन जब इस शुल्क का भुगतान प्रेषित कर दिया गया तो आयोग की वार्षिक रिपोर्ट/विशेष रिपोर्ट के सुरक्षा एवं गोपनीयता के दृष्टिगत दिया जाना संभव नहीं है लिखते हुुये उपलब्ध कराने से इंकार कर दिया। इस पर श्री नदीम ने उत्तराखंड सूचना आयोग को द्वितीय अपील की। उत्तराखंड सूचना आयोग के सूचना आयुक्त विपिन चन्द्र की पीठ ने अपील की 11 अप्रैल 2022 को प्रथम सुनवाई की।

नदीम के अपील प्रार्थना पत्र के तथ्योें से सहमत होते हुये श्री विपिन चन्द्र ने सूचना उपलब्ध न कराने तथा विधानसभा के समक्ष उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट न रखने पर कठोर रूख अपनाया। श्री विपिन ने अपने आदेेश दि0 11-04-2022 में स्पष्ट लिखा कि तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी/श्री धीरज कुमार, अनुभाग अधिकारी गृह अनुभाग-5 उत्तराखंड शासन देहरादून एवं वर्तमान लोक सूचना अधिकारी/श्री धर्मेन्द्र कुमार द्विवेदी, अनुभाग अधिकारी गृह अनुभाग-5 उत्तराखंड शासन देहरादून द्वारा अपने दायित्वों/कर्तव्योें का निर्वहन सुचारू रूप से नहीं किया है। राज्य मानवाधिकार आयोग की वार्षिक रिपोर्ट/विशेष रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण हैै, क्योेंकि उक्त रिपोर्ट राज्य वासियों के मानवाधिकार से संबंधित है एवं उक्त रिपोर्ट को समय से मंत्रिमंडल के सम्मुख व विधानसभा के पटल पर रखने की जिम्मेदारी प्रशासन की हैै। यदि उक्त दोनों अधिकारियों द्वारा प्रकरण में सुचारू रूप से कार्य करते हुए उत्तराखंड मानव अधिकार आयोग की वार्षिक रिपोर्ट/विशेष रिपोर्ट विधानसभा के समक्ष विचार हेतु रखते तो विचारोपरांत उक्त जानकारी/सूचना अपीलार्थी को प्रेषित की जा सकती थी। स्पष्ट हैै कि उपरोक्त दोनों अधिकारीगण अपने कार्य के प्रति लापरवाही एवं उदासीनता बरतते हैं और अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य ही मात्र अनुस्मारक पत्र भेजकर खानापूर्ति करते हैैं। दोनों अधिकारी गण द्वारा यह व्यवहार अनुचित एवं दंडनीय है।

दोनों अधिकारियों के विरूद्ध धारा 20(2) के अन्तर्गत विभागीय कार्यवाही तथा धारा 19(8) के अन्तर्गत क्षतिपूर्ति दिलाने के लिये नोटिस दिया तथा आगामी तिथि 29 जून 2022 नियत की। सूचना आयुक्त विपिन चन्द्र के समक्ष 29 जून 2022 को हुई सुनवाई में गृह विभाग के लोक सूचना अधिकारी ने आयोग में लिखित रूप से अनुपालन आख्या प्रस्तुत की जिसमें अवगत कराया कि सूचना आयोग के आदेश दिनांक 11-04-2022 के अनुपालन में उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग द्वारा अपनी वार्षिक रिपोर्टों पर की गयी संस्तुतियों पर विभिन्न विभागों द्वारा की गयी कार्यवाही के सम्बन्ध में समन्वयन स्थापित करने हेतु गृह विभाग के पत्रांक 410 दिनांक 18 मई 2022 द्वारा अपर मुख्य सचिव, गृह विभाग की अध्यक्षता में दिनांक 25-05-2022 को बैठक आहूत की गयी जिसके क्रम में विभिन्न विभागों द्वारा उपलब्ध करायी गयी आख्यानुसार उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग की वार्षिक रिपोर्ट 2012-18 व 2018-19 के सम्बन्ध में संस्तुति/सूचनायें बिन्दुओं पर शासन द्वारा कृत कार्यवाही के विवरण पर मा0मुख्यमंत्री का अनुमोदन प्राप्त करते हुये शासन के पत्रांक 532 दिनांक 13 जून 2022 द्वारा सचिव, उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग तथा पत्रांक 531 से प्रमुख सचिव विधायी एवं संसदीय कार्य विभाग को कृत कार्यवाही की आख्या सदन में प्रस्तुत करने हेतु प्रेषित किया गया। उत्तराखंड विधानसभा की कार्यसूची दिनांक 16 जून 2022 के बिन्दु संख्या 04 के माध्यम से उक्त रिपोर्टो को सदन के पटल पर प्रस्तुत किया जा चुका हैै जिसके क्रम में वांछित वार्षिक रिपोेर्ट को सार्वजनिक किया जा सकता हैै।

सूचना आयुक्त विपिन चन्द्र ने आयोग के आदेश के अनुपालन पर संतुष्ट होते हुये  नदीम की इस अपील मे कार्यवाही तो समाप्त कर दी तथा अधिकारियों को दिया विभागीय कार्यवाही का नोटिस वापस ले लिया लेकिन लोक सूचना अधिकारी धर्मेन्द्र कुमार द्विवेदी/अनुभाग अधिकारी तथा तत्कालीन लोक सूूचना अधिकारी धीरज कुमार अनुभाग अधिकारी को कठोर चेतावनी निर्गत करते हुये भविष्य के लिये सचेत किया गया कि वे कार्यालय मेें अपनी कार्यशैली में सुधार लायें, अपनी जिम्मेदारी खुद समझें एंव भविष्य में जो भी उत्तरदायित्व उन्हें सौंपे जाये उनका पूर्ण निष्ठा से निर्वहन करें। यदि भविष्य में इन अधिकारियों द्वारा इस प्रकार की ़त्रुटि की जाती हैै तो उनके विरूद्ध अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कार्यवाही की जायेगी।

विपिन चन्द्र नेे नदीम को 10 दिन के भीतर मानवाधिकार आयोग की रिपोर्टों की प्रतियां पंजीकृत डाक सेे निःशुल्क प्रेषित करने का भी आदेश दिया। साथ ही श्री नदीम को क्षतिपूर्ति के बिन्दु पर स्पष्ट किया कि उन्होेंने आयोग की आदेश की अपेक्षानुसार क्षति की लिखित आख्या प्रस्तुत नहीं की है। ऐसा प्रतीत होता हैै कि उनका उद्देश्य उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग की वार्षिक रिपोर्ट को सार्वजनिक कराना था, न कि व्यक्तिगत रूप से क्षतिपूर्ति प्राप्त करना था। अपीलार्थी की इस भावना को ध्यान में रखते हुये क्षतिपूर्ति के बिन्दु पर विचार नहीं किया जा रहा है।

 

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