एल नीनो की दस्तक: क्या मानसून पर मंडरा रहा है सूखे और भीषण गर्मी का खतरा?
The India Meteorological Department (IMD) has officially declared that El Niño has developed in the equatorial Pacific Ocean and is likely to strengthen during the monsoon season. Sea surface temperatures have crossed the El Niño threshold, with the Niño 3.4 region showing warming above 0.5°C. This raises fears of a weaker monsoon, as India’s agriculture (especially rain-fed kharif crops) is highly dependent on rainfall. IMD has forecasted rainfall at 92% of the long-period average. Historical El Niño years (1987, 2002, 2009, 2015) often saw droughts. The Indian Ocean Dipole (IOD) is currently neutral, offering limited offset. Experts urge farmers to adopt water conservation, drought-resistant varieties, and crop diversification. Preparation is essential to mitigate impacts on water, power, health, and the economy.

–जयसिंह रावत-
भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने आधिकारिक रूप से पुष्टि कर दी है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एल नीनो की स्थिति विकसित हो चुकी है और मानसून के दौरान इसके और अधिक मजबूत होने की संभावना है। यह सूचना ऐसे समय में आई है जब देश के अधिकांश हिस्से पहले ही भीषण गर्मी, जल संकट और मौसम की बढ़ती अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं। मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि एल नीनो मध्यम या मजबूत स्तर तक पहुंचता है तो इसका असर मानसून, कृषि उत्पादन, जल संसाधनों और आम जनजीवन पर दिखाई दे सकता है।
एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो तब उत्पन्न होती है जब प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। आईएमडी के अनुसार समुद्र की सतह का तापमान अब एल नीनो की सीमा को पार कर चुका है और Niño 3.4 क्षेत्र का तीन महीने का औसत तापमान भी 0.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया है। समुद्र और वायुमंडल दोनों में हो रहे परिवर्तनों ने इस स्थिति की पुष्टि कर दी है। मौसम विभाग के मॉनसून मिशन कूपल्ड फोरकास्ट सिस्टम के अनुसार मानसून के अधिकांश समय में मध्यम से मजबूत एल नीनो बने रहने की संभावना है।
मानसून पर असर की आशंका
भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। देश की लगभग आधी कृषि भूमि वर्षा आधारित है। यही कारण है कि एल नीनो का नाम सामने आते ही किसानों, जल प्रबंधकों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ जाती है। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि एल नीनो वाले अधिकांश वर्षों में भारत में सामान्य से कम वर्षा हुई है। वर्ष 1987, 2002, 2009 और 2015 जैसे वर्षों में एल नीनो के साथ गंभीर सूखे की स्थिति भी देखने को मिली थी।
आईएमडी पहले ही अनुमान जता चुका है कि इस वर्ष मानसूनी वर्षा दीर्घकालिक औसत की लगभग 92 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि यह राष्ट्रीय स्तर का अनुमान है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर वर्षा का वितरण असमान हो सकता है। कहीं सामान्य वर्षा होगी तो कहीं गंभीर कमी देखने को मिल सकती है।
इस बार चिंता इसलिए भी अधिक है क्योंकि भारतीय महासागर द्विध्रुव (आईओडी) फिलहाल तटस्थ स्थिति में है। सामान्यतः सकारात्मक आईओडी एल नीनो के नकारात्मक प्रभावों को कुछ हद तक संतुलित कर देता है। वर्ष 2023 में यही हुआ था, जब एल नीनो के बावजूद सकारात्मक आईओडी ने भारतीय मानसून को संभाल लिया था। लेकिन इस वर्ष फिलहाल ऐसी कोई मजबूत राहत दिखाई नहीं दे रही है, हालांकि जापान मौसम एजेंसी ने बाद में सकारात्मक आईओडी बनने की कुछ संभावना व्यक्त की है।
खेती, जल संकट और बढ़ती गर्मी
यदि मानसून कमजोर पड़ता है तो इसका सबसे पहला असर खरीफ फसलों पर पड़ेगा। धान, मक्का, सोयाबीन, दालें और अन्य वर्षा आधारित फसलें प्रभावित हो सकती हैं। कम वर्षा की स्थिति में सिंचाई पर निर्भरता बढ़ेगी और भूजल दोहन में तेजी आ सकती है। जिन क्षेत्रों में पहले से जल संकट है, वहां हालात और कठिन हो सकते हैं।
कृषि विशेषज्ञ किसानों को जल संरक्षण तकनीकों को अपनाने, सूखा सहनशील किस्मों का प्रयोग करने, फसल विविधीकरण बढ़ाने और फसल बीमा योजनाओं का लाभ लेने की सलाह दे रहे हैं। बदलते मौसम के दौर में पारंपरिक खेती पद्धतियों के साथ वैज्ञानिक कृषि प्रबंधन की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है।
एल नीनो का प्रभाव केवल वर्षा तक सीमित नहीं रहता। यह वैश्विक तापमान को भी बढ़ाता है। पिछले कुछ वर्ष पृथ्वी के इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में दर्ज किए गए हैं। ऐसे में एल नीनो भारत में हीटवेव की घटनाओं को और तीव्र बना सकता है। इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं, बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती है और पेयजल संकट गहरा सकता है।
हिमालयी राज्यों के लिए भी चुनौती
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों में एल नीनो का प्रभाव अलग स्वरूप में दिखाई दे सकता है। यहां सामान्य से कम वर्षा के साथ-साथ वर्षा का वितरण भी असंतुलित हो सकता है। कई बार पूरे मौसम में वर्षा कम रहती है, लेकिन कुछ दिनों में अत्यधिक वर्षा होकर बादल फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं को जन्म देती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन और हिमालयी पारिस्थितिकी की संवेदनशीलता के कारण इस प्रकार की चरम मौसम घटनाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
बदलती जलवायु और बढ़ती अनिश्चितता
एल नीनो कोई नई घटना नहीं है, लेकिन जलवायु परिवर्तन ने इसके प्रभावों को अधिक जटिल और अनिश्चित बना दिया है। महासागरों के लगातार गर्म होने से एल नीनो और ला नीना जैसी घटनाओं की प्रकृति बदल रही है। यही कारण है कि अब केवल मानसून की कुल वर्षा नहीं, बल्कि उसका वितरण और चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति भी चिंता का विषय बन चुकी है।
हालांकि हर एल नीनो वर्ष भारत के लिए खराब साबित नहीं होता। देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसके प्रभाव अलग-अलग हो सकते हैं और कुछ राज्यों में सामान्य वर्षा भी हो सकती है। फिर भी मौजूदा संकेत यह बताते हैं कि आगामी महीनों में मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रखने और कृषि, जल प्रबंधन तथा आपदा तैयारी को प्राथमिकता देने की आवश्यकता होगी।
फिलहाल मौसम विभाग की चेतावनी को एक सतर्क संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। यह घबराने का नहीं, बल्कि तैयारी का समय है। यदि एल नीनो अनुमान के अनुसार मजबूत होता है तो इसका प्रभाव केवल खेतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जल, ऊर्जा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लगभग हर क्षेत्र में महसूस किया जा सकता है। ऐसे में विज्ञान आधारित पूर्वानुमानों को गंभीरता से लेना और समय रहते तैयारी करना ही सबसे प्रभावी उपाय होगा। (लेखक इस न्यूज़ पोर्टल के मानद संपादकीय सलाहकार हैं -एडमिन)
