92 की उम्र में भी प्रेम और जीवन में कविता खोजते गुलज़ार

Gulzar was born Sampooran Singh Kalra, to a Sikh family in the village of Dina, in what lies in Pakistan today. There is confusion about his exact year of birth, but he thinks it was 1934. His mother died when he was months old and he grew up in a household of seven half-siblings. His father ran a fabric shop in the village and had opened another in Delhi, about 400 miles away. While the rest of the family stayed in the village, he took the child with him to Delhi in the 1940s, where he attended school and helped in the shop. In the evenings, the boy retreated to the shop’s storeroom, where he would sleep, but only after devouring Urdu detective novels by the lantern light. The stall across the street that he would rent the books from became his earliest literary influence, introducing him to writings from across India and around the world translated into Urdu.

– मुजीब मशाल
कवि, गीतकार और फिल्मकार गुलज़ार ने छह दशकों से अधिक समय में अपने गीतों, कविताओं, कहानियों और फिल्मों के जरिए भारतीय जनमानस में प्रेम और संवेदना की एक अलग भाषा रची है। उम्र अब 92 वर्ष की है, लेकिन दुनिया को देखने का उनका विस्मय अब भी किसी बच्चे जैसा है। बादलों में उन्हें आपस में उलझती भेड़ें दिखाई देती हैं, मानसून की बूंदों में आसमान का खेल और पेड़ से गिरते एक पत्ते में पूरी कविता। शायद यही दृष्टि उनके सृजन की सबसे बड़ी ताकत है।
गुलज़ार के सबसे प्रिय गीतों में एक ऐसा भी है, जिसमें दो प्रेमी समय को पकड़कर अपने लिए चुरा लेने की कल्पना करते हैं। शेक्सपियर के ‘ओथेलो’ से प्रेरित फिल्म में आए ‘ओ साथी रे’ में प्रेमी डूबते सूरज को दिन खत्म होने से पहले रोक लेना चाहते हैं। उदासी और शरारत के बीच झूलती यह कल्पना गुलज़ार की कविता की पहचान है—साधारण दृश्य में असाधारण अनुभूति खोज लेना।

मुंबई में छह दशकों से अधिक समय बिताने वाले गुलज़ार ने भारतीय सिनेमा में प्रेम की अभिव्यक्ति को एक विशिष्ट कोमलता दी। उन्होंने बच्चों के लिए किताबें लिखीं, लघु कथाएं और कविता-संग्रह रचे, फिल्मों का निर्देशन किया और पटकथाएं लिखीं। इसके बावजूद रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों में सुंदरता खोजने का उनका विस्मय कभी खत्म नहीं हुआ।
जून के अंत में मुंबई स्थित उनके घर पर हुई मुलाकात में भी यह सहज ही दिखाई दिया। मानसून की बौछारें पड़ रही थीं। उन्होंने बाहर देखते हुए कहा—पूरा शहर गीला है, क्या यह अपने आप में दिलचस्प अनुभूति नहीं है? आसमान में बादलों से कुछ गिर रहा है, जैसे वे आपके साथ खेल रहे हों।
यही काव्य-दृष्टि भारतीय लोकप्रिय सिनेमा पर उनकी सबसे स्थायी छाप है। सिनेमा ने उन्हें आजीविका दी और उनकी कविता को संगीत तथा दृश्यों के ऐसे पंख दिए कि वह भाषाओं, क्षेत्रों और पीढ़ियों की सीमाएं पार कर गई। एक दर्जन से अधिक फिल्मों का निर्देशन और अनेक फिल्मों की पटकथाएं लिखने के अलावा उन्होंने 150 से अधिक फिल्मों के लिए गीत लिखे।
अब 92 वर्ष की आयु में भी उनकी सुबह सूर्योदय के साथ होती है। अपने दो मंजिला घर की निचली मंजिल पर बनी मेज पर वे हर सुबह काम करने बैठ जाते हैं। सूर्योदय उनके लिए आज भी एक नई घटना है। वे कहते हैं कि आसमान ऐसे खुलता है जैसे कपड़े का कोई थान धीरे-धीरे खुल रहा हो।
दशकों से कायम यही अनुशासन उनके विशाल रचना-संसार के पीछे है। हाल के वर्षों की उनकी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में भारत की करीब तीन दर्जन भाषाओं के लगभग 300 कवियों की समकालीन कविताओं का संकलन भी शामिल है। हिंदी और अंग्रेजी अनुवादों के जरिए इन कविताओं को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुंचाने वाली ‘ए पोएम ए डे’ पुस्तक करीब एक दशक की मेहनत का परिणाम थी। इसके पीछे उन विद्यार्थियों से किया गया उनका एक वादा था, जिनकी शिकायत थी कि कविता पाठ्यपुस्तकों में कैद होकर उनके रोजमर्रा के जीवन से दूर होती जा रही है।
उनकी बातचीत का संसार भी कविता तक सीमित नहीं रहता। मुंबई, बचपन, भारतीय सिनेमा में बदलती कहानी कहने की शैली और नई पीढ़ी की घटती ध्यान-अवधि से लेकर टेनिस तक वे उसी उत्सुकता से बात करते हैं। करीब 90 वर्ष की उम्र तक वे नियमित टेनिस खेलते रहे। अब खेलना छोड़ चुके हैं, लेकिन टेलीविजन पर बड़े मुकाबले देखते हैं। रोजर फेडरर के एक हाथ वाले बैकहैंड की चर्चा आते ही उनकी आंखों में चमक दिखाई देती है। उनके लिए उसमें भी एक सौंदर्य है।
गुलज़ार का जीवन दो ऐसे अनुभवों को जोड़ता है, जिन्होंने आधुनिक भारत की चेतना को गहरे प्रभावित किया—1947 का विभाजन और भारतीय कला तथा सिनेमा की वह दुनिया, जिसने विविधताओं से भरे देश में साझा सांस्कृतिक अनुभूतियों को आकार दिया।
विभाजन की हिंसा के प्रत्यक्षदर्शी गुलज़ार ने अपने भीतर भारत की अनेक भाषाओं और संस्कृतियों के प्रभावों को जगह दी। दशकों तक अपनी कला को निखारते हुए उन्होंने ऐसा रचना-संसार बनाया जिसकी सबसे विशिष्ट पहचान उसकी कोमलता है। विभाजन की भयावह स्मृतियां उनके भीतर रहीं, लेकिन वे उनकी संवेदना को कठोर नहीं कर सकीं।
उनके व्यक्तित्व की एक दूसरी विशेषता दुनिया के प्रति लगभग बाल-सुलभ कौतूहल है। उनकी कई पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाली रख़शंदा जलील एक प्रसंग सुनाती हैं। करीब 2019 में दोनों कनाडा की उड़ान पर थे। जलील अपने लैपटॉप पर काम कर रही थीं और गुलज़ार खिड़की के पास बैठे थे। अचानक वे धीरे-धीरे कहने लगे—“भेड़ें, भेड़ें… वे आपस में लड़ रही हैं।”
जलील ने हैरानी से उनकी ओर देखा तो गुलज़ार ने खिड़की से बाहर बादलों की ओर इशारा किया। उन्हें बादल ऐसी भेड़ों जैसे दिखाई दे रहे थे जो आपस में उलझ रही हों।

रोजमर्रा के जीवन के प्रति यही विस्मय उनकी कविताओं और गीतों में बार-बार दिखाई देता है। ‘मेरा कुछ सामान’ में बिछड़ने की पीड़ा को वे सामान लौटाने जैसी साधारण-सी बात के जरिए असाधारण भावनात्मक गहराई देते हैं। ‘छैय्या छैय्या’ में लोक लय और आधुनिकता का मेल है, ‘जय हो’ उत्सवधर्मिता का गीत बन गया और ‘दिल तो बच्चा है जी’ में उम्र के बावजूद मन के भीतर जीवित प्रेम को शरारती अंदाज मिलता है।
गुलज़ार का जन्म संपूर्ण सिंह कालरा के रूप में आज के पाकिस्तान में स्थित दीना में एक सिख परिवार में हुआ था। उनके जन्म-वर्ष को लेकर अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं, लेकिन स्वयं गुलज़ार 1934 को अपना जन्म-वर्ष मानते हैं। जब वे कुछ महीने के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया। वे सात सौतेले भाई-बहनों वाले बड़े परिवार में पले-बढ़े।
उनके पिता दीना में कपड़े की दुकान चलाते थे और उन्होंने दिल्ली में भी एक दुकान खोल रखी थी। परिवार का अधिकांश हिस्सा दीना में रहा, जबकि बालक संपूर्ण को 1940 के दशक में दिल्ली ले आया गया। यहां वे स्कूल जाते और दुकान में हाथ बंटाते थे।

शाम को दुकान के गोदाम में उनका एक अलग संसार बस जाता। वहीं वे सोते भी थे और उससे पहले लालटेन की रोशनी में उर्दू के जासूसी उपन्यास पढ़ते रहते। सड़क के दूसरी ओर किताबें किराए पर देने वाली एक दुकान उनके साहित्यिक जीवन की शुरुआती पाठशाला बनी। वहीं से उन्हें भारत और दुनिया के साहित्य की उर्दू में अनूदित रचनाएं पढ़ने को मिलीं।
उनके जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया जब दुकानदार ने उन्हें रवींद्रनाथ टैगोर की कविताओं के संग्रह ‘द गार्डनर’ का उर्दू अनुवाद पढ़ने को दिया। पुस्तक उन्हें इतनी पसंद आई कि उन्होंने उसे बार-बार किराए पर लिया। आखिरकार वही पहली किताब बनी जिसे, उनके अपने स्वीकार के अनुसार, उन्होंने चुरा लिया था।
कविता का संस्कार स्कूल में भी मिल रहा था। दिल्ली के यूनाइटेड क्रिश्चियन स्कूल में उनके साहित्य शिक्षक एक मुस्लिम मौलवी थे, जो विद्यार्थियों को शेर याद करने के लिए प्रेरित करते थे। गुलज़ार के अनुसार कविता को याद करना केवल शब्दों को याद करना नहीं है। जब किसी शेर का अर्थ धीरे-धीरे मनुष्य के भीतर उतरने लगता है, तभी वास्तविक सीख और शिक्षा शुरू होती है।
शिक्षक विद्यार्थियों को दो समूहों में बांटकर बैत-बाज़ी भी कराते थे। एक समूह के शेर के आखिरी अक्षर से दूसरे समूह को नया शेर सुनाना होता था। गुलज़ार मुस्कराते हुए स्वीकार करते हैं कि कई बार विद्यार्थी इसमें थोड़ी हेराफेरी भी कर लेते थे—किसी शब्द का क्रम बदल देते या अंत को अपनी सुविधा के अनुसार मोड़ देते।
इसी दौर में वे अपनी कविताएं भी लिखने लगे और उनके नीचे ‘गुलज़ार’ नाम लिखते थे। आगे चलकर यही नाम उनकी पहचान बन गया।
फिर आया 1947।
भारत के विभाजन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और आबादी के विस्थापन ने पंजाब को सबसे अधिक प्रभावित किया। दीना में रह रहे गुलज़ार के भाई-बहनों को अपना सामान समेटकर दिल्ली आना पड़ा। लेकिन दिल्ली भी हिंसा से अछूती नहीं रही। किशोर गुलज़ार ने सड़कों पर शव देखे। उन दृश्यों का असर इतना गहरा था कि करीब दो दशक तक वे डरावने सपनों से जागते रहे।
विभाजन का वह आघात उनकी कला की भावनात्मक पृष्ठभूमि का हिस्सा बन गया। उनके लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, भीतर जमा पीड़ा से बाहर निकलने का रास्ता भी बना। वे कहते हैं कि लेखन मनुष्य का आश्रय बन सकता है—अपने को व्यक्त करने, भीतर की चीजों को बाहर निकालने और उनसे कुछ हद तक मुक्त होने का माध्यम।
किशोरावस्था में पिता ने उन्हें मुंबई भेज दिया। दिल्ली का घर पहले ही भरा हुआ था और विभाजन के बाद शरणार्थी शिविरों से आए कई रिश्तेदारों को भी परिवार ने अपने यहां जगह दी थी।
मुंबई में पढ़ाई जारी रखते हुए गुलज़ार ने कई साल एक कार गैराज में काम किया। दुर्घटनाग्रस्त गाड़ियों की मरम्मत के दौरान उन्हें पुराने रंग से हूबहू मिलता रंग तैयार करना होता था। शायद रंगों के सूक्ष्म अंतर पहचानने का वह अभ्यास भी उनकी कलात्मक दृष्टि का हिस्सा बन गया। इसी दौर में उन्होंने पगड़ी छोड़ दी और बाल कटवा लिए, जिससे उनके पिता प्रसन्न नहीं थे।
किताबें हालांकि उनका आश्रय बनी रहीं। 1950 के दशक में मुंबई के रंगमंच, साहित्य और प्रगतिशील सांस्कृतिक हलकों से उनका संपर्क हुआ। इन्हीं परिचितों में से एक मित्र ने उनके लिए भारतीय सिनेमा का दरवाजा खोला। प्रसिद्ध निर्देशक बिमल रॉय को एक गीतकार की जरूरत थी और युवा गुलज़ार को उनके पास ले जाया गया। यहीं से उस लंबे सफर की शुरुआत हुई जिसने भारतीय फिल्म संगीत को अनेक यादगार गीत दिए।
उनका पहला फिल्मी गीत एक स्त्री के भीतर चल रही उस उथल-पुथल को अभिव्यक्त करता था जो प्रेम में स्वयं को पाने और खो देने के बीच झूल रही थी। इसके बाद गुलज़ार केवल गीतकार नहीं रहे। वे पटकथा लेखन और निर्देशन की ओर बढ़े और आगे चलकर एक दर्जन से अधिक फिल्मों का निर्देशन किया।
फिल्म जगत ने उन्हें परिवार भी दिया। उन्होंने प्रसिद्ध अभिनेत्री राखी से विवाह किया। विवाह के कुछ समय बाद दोनों अलग रहने लगे। गुलज़ार ने कभी इस रिश्ते को अपनी “जिंदगी की सबसे लंबी छोटी कहानी” कहा था। उनकी बेटी मेघना गुलज़ार आगे चलकर स्वयं फिल्म निर्देशक बनीं। मेघना के शुरुआती 13 जन्मदिनों पर गुलज़ार ने उन्हें हर बार बच्चों की एक नई कहानी की किताब दी, जिसे उन्होंने स्वयं लिखा था।
फिल्म निर्माण और गीत लेखन में बड़ी सफलता के बावजूद गुलज़ार ने कविता लिखना कभी नहीं छोड़ा। कविता उनके लिए रचनात्मक अभिव्यक्ति का सबसे निजी और स्वतंत्र माध्यम रही है। उनके शब्दों में, कविता मनुष्य की अपनी प्रतिबद्धता और अपना विचार है, जो उसके भीतर अंकुरित होता है।
1999 में अपनी आखिरी फिल्म निर्देशित करने के बाद उन्होंने निर्देशन से दूरी बना ली और अपना अधिकांश समय लेखन, विशेषकर कविता, को देना शुरू किया। फिल्मों के लिए गीत लिखना उन्होंने पूरी तरह नहीं छोड़ा, लेकिन अब वे चुनिंदा निर्देशकों के साथ ही काम करते हैं—ऐसे फिल्मकारों के साथ जो कविता की प्रकृति समझते हों और उन्हें अपनी तरह लिखने की स्वतंत्रता दें।
उनकी दिनचर्या आज भी सरल और अनुशासित है। वे भोर में उठते हैं और रात करीब दस बजे सो जाते हैं। उम्र ने टेनिस जैसी कुछ प्रिय गतिविधियां उनसे जरूर छीन ली हैं, लेकिन पढ़ना, लिखना और एकांत आज भी उनके दिन के केंद्र में हैं। वे पत्नी राखी की कही एक बात अक्सर स्नेह से दोहराते हैं—अगर तुम कवि नहीं होते तो काफी साधारण आदमी होते।
लेकिन उनके भीतर एक जगह ऐसी है जहां समय शायद कभी आगे नहीं बढ़ा—दीना।
2013 में भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में अपेक्षाकृत शांत दौर के बीच गुलज़ार पाकिस्तान गए और अपने पैतृक गांव दीना भी पहुंचे। बचपन की जगह पर दशकों बाद लौटना उनके लिए असाधारण रूप से भावुक अनुभव था। गांव के लोगों के नाम लिखे एक संदेश में उन्होंने स्वीकार किया कि स्मृतियों की बाढ़ ने उन्हें भीतर तक भर दिया था। उन्हें बस कुछ पल अकेले बैठकर रो लेने की इच्छा हुई।
आज भी जब उनसे दीना के बारे में पूछा जाता है तो वे केवल अपने गांव की बात नहीं करते। प्रश्न को वे जीवन, स्मृति और जड़ों के व्यापक अर्थ तक ले जाते हैं। उनका मानना है कि जीवन हर क्षण मनुष्य को छूता रहता है। फर्क केवल इतना है कि हमारे भीतर उसे ग्रहण करने वाले ‘एंटीना’ खुले हैं या नहीं।
यही कहते-कहते उनकी नजर एक दृश्य पर टिक जाती है। जैसे कोई पत्ता पेड़ से अलग होकर हवा में तैर रहा हो—धीरे-धीरे नीचे आता हुआ।
गुलज़ार उस पत्ते को केवल गिरते हुए नहीं देखते। उनके लिए प्रश्न यह है कि इस ताजे पत्ते ने अपनी शाखा क्यों छोड़ी? शाखा से धरती तक उसकी छोटी-सी यात्रा में क्या कहानी छिपी है? क्या वह उस मिट्टी को छूने जा रहा है जहां उसकी जड़ें हैं? क्या गिरना अंत है या किसी नए चक्र की शुरुआत?
और यहीं शायद गुलज़ार की पूरी रचनात्मक दृष्टि का रहस्य छिपा है।
वे कहते हैं—मुझे उस गिरते हुए पत्ते में कविता दिखाई देती है। जरूरी नहीं कि आपको भी उसी क्षण दिखाई दे। लेकिन कविता आपको इतना सजग जरूर कर सकती है कि अगली बार कोई पत्ता हवा में तैरता हुआ नीचे आए तो आप उसे केवल गिरता हुआ पत्ता न समझें। एक क्षण रुकें, उसे देखें और उसके भीतर छिपी कहानी को महसूस करें।
92 वर्ष की उम्र में भी गुलज़ार शायद यही कर रहे हैं—हमारी रोजमर्रा की दुनिया में चुपचाप बिखरी कविता की ओर हमारा ध्यान खींच रहे हैं।
