‘ भाजपा नीव के पत्थरों को कैसे भूल गई ?

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-डा0 योगेश धस्माना

पौड़ी के सामाजिक राजनीतिक जीवन में पहले हिंदू महासभा जनसंघ और अंत में अपने खून -पसीने से भाजपा को सींचने वालों को उनकी विचारधारा वाले नेताओं ने भुला दिया है I
1952 में हिंदू महासभा के बैनर पर अल्मोड़ा से रामदत जोशी और पौड़ी से एडवोकेट घनानंद बहुगुणा ने 1957 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुनाव लड़ कर जनसंघ को एक जनाधार देने वाले नेताओं में थे I 1962 में अल्मोड़ा से रामदत जोशी को टिकट देने वाले पहली बार जीतने वाले प्रत्याशी भी बने I वही गढ़वाल से शेर सिंह दानू चमोली से जनसंघ की आधारशिला बने दुर्भाग्यवश अब भाजपा ने इन नेताओं और उनके परिवार को ही भुला दिया है I

इस तरह 1975 में आपातकाल के दौर में 19 माह की कड़ी सजा भुगतने वालों में प्रमुख रूप से बलदेव सिंह बंगारी , गोपाल सिंह रावत , कैलाश जुगराण , गोविंदराम ढींगरा , नरेंद्र उनियाल, गोपीचंद सचदेव, आदि , अनेक नेता प्रमुख थे I इनके परिजनो ने संघ और संगठन के कार्यक्रमो मे परिवार तक को झोकी दिया था I 1950 में पौड़ी बस स्टैंड पर पहले कॉफी हाउस और और फिर अपर बाजार में नारायण होटल एंड रेस्टोरेंट को शुरू करने वाले बलदेव सिंह बंगारी स्वयं संघ के कार्यक्रमो को पौड़ी और इस्के आसपास के क्षेत्र में विस्तार देने का काम कर रहे थे I तब उस काम में उनी धर्म पत्नि श्यामा देवी ने घर पर ही कार्यकर्ताओ के भोजन और आवास का प्रबंध करने का जिम्मा संभाला I

उनकी पुत्री विमला रावत बताती हैं कि कई बार जिला प्रशासन और सी.आई.डी ने उनके घर पर भी छापे मारी की I किंतु श्यामा देवी अपने मिशन में जुटी रहती थी I ‘ अलका आर्ट ‘ के नाम से चर्चित गोपाल रावत , लुंगी सिंह जी , ऋषि बल्लभ , सुंदरियाल सिंह जी , सुमन लता भदोला , गुलाब सिंह बिष्ट , उन् प्रमुख लोगों में थे, जिन्होने गढ़वाल में जनसंघ को जनाधार दिया बाद में प्रमोद धस्माना , क्षेत्रपाल उपाध्याय , राजेश्वर उनियाल, राकेश सिंह , गुलाब सिंह ने भी संगठन के कामों को आगे बढ़ाया I

1974 में जब उत्तर प्रदेश के प्रान्तीय विधायक के चुनाव के लिए पहाड़ की जनता अपने मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा को पौड़ी से जांच करने के लिए , पौड़ी से चुनाव मे निर्विरोध भेजना चाहती थी किन्तु जनसंघ के प्रत्याशी गुलाब सिंह जिन्होने 5 लाख रुपय देने का प्रलोभन देकर बैठाने का भी प्रयत्न किया गया, किन्तु उन सिद्धांतों के लिए उन्होने चुनाव से हटने से इनकार कर दिया। आखिरकार हेमवती नंदन बहुगना को इलाहाबाद से ही चुनाव लडना पड़ा I आज दुर्भाग्यवश संघ और संगठन के गुमनाम परिवार की सुध लेने वाला कोई भी भाजपाई नेता दिखाई नहीं देता।

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