पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन का गंभीर संकट

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-जयसिंह रावत

विश्व के समक्ष आज जलवायु परिवर्तन एक गंभीर चुनौती है। मानवजनित क्रिया-कलाप जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारक हैं। मानव जनित कारणों ने दुनियां के योजनाकारों, सरकारों तथा राजनीतिज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। भारत के संदर्भ में तो जलवायु का महत्व आर्थिक विकास से भी जुड़ा हुआ है। भारत की अर्थव्यवस्था पर जलवायु का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। भारत में, मौसम विज्ञान संबंधी रिकॉर्ड वर्षा की मात्रा में अधिक परिवर्तन न होते हुए भी वायु तापमान में वृद्धि की ओर संकेत करते हैं।

आमतौर पर किसी भी क्षेत्र में पाये जाने वाले मौसम को ही वहां की जलवायु कहा जाता है। जलवायु का सीधा अर्थ है कि क्षेत्र विशेष में तापमान, औसतन वर्षा तथा विभिन्न ऋतुओं में हवा के रुख से है। जलवायु मुख्य रूप से वहां की भौगोलिक संरचना से नियंत्रित होती है फिर भी उस पर मानवीय गतिविधियों का भी काफी प्रभाव पड़ता है। ये सब सूर्य से प्राप्त होने वाली ऊर्जा से ही संचालित होते हैं।

एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका और चीन में वर्ष 2007 में ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन भारत की तुलना में चार गुणा ज्यादा रहा है। ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और रूस के बाद भारत 5वें स्थान पर आता है। यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य है कि भारत की नीतियों एवं तत्परता के परिणामस्वरूप वर्ष 1994 से 2007 की अवधि में उत्सर्जन की तीव्रता में 30 प्रतिशत की कमी आई है। भारत इस क्रम को जारी रखते हुए उत्सर्जन की तीव्रता में 20-25 प्रतिशत तक की कमी लाने के लिए प्रयत्नशील है।

विश्व स्तरीय मानदण्डों के अनुसार पृथ्वी पर ऑक्सीजन-कार्बन-डाई-ऑक्साइड के संतुलन को बनाये रखने के लिए एक तिहाई (1/3 ) भूमि पर जंगल होने चाहियें। लेकिन आजकल घने जंगल दुनिया में 20-21 प्रतिशत और भारत में केवल 12-13 प्रतिशत भूमि पर ही रह गये हैं। यद्यपि भारत का वनावरण 21.71 प्रतिशत तक है, लेकिन इसमें खुले वन अधिक हैं।  राजस्थान में तो वनों की हालत और भी दयनीय है। वहां 8-9 प्रतिशत भूमि पर ही वन बचे हैं। जब वृक्ष नहीं, वन नहीं तो वन्यजीव भी नहीं बचेंगे। वनों के घटने से अब पक्षी बहुत कम दिखने में आते हैं और रंग-बिरंगी तितलियां तक दुर्लभ होती जा रही हैं। ईंधन के लिए, फर्नीचर के लिए, भारत और कुछ अन्य देशों में शवदाह के जिए बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष पर्यावरण की जितनी हानि हो रही है, उसका पूरा अनुमान लगाना तो कठिन है, किन्तु यह स्पष्ट है कि उससे ग्लोबल वार्मिंग में वृद्धि हो रही है, भू-जल का संरक्षण नहीं हो पा रहा है, मिट्टी का अपरदन तथा जैव विविधता का विनाश तेजी से हो रहा है

विदित ही है कि हमारा वायुमण्डल कई प्रकार की गैसों का मिश्रण है। जलवायु पर वायुमण्डल और जलमण्डल का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। वायुमण्डल के इन घटकों में नाइट्रोजनए ऑक्सीजन एवं कार्बनडाई ऑक्साइड का सभी जीवधारियों (वनस्पति-वर्ग एवं प्राणी-वर्ग) के जीवन चक्र से सीधा संबंध है। यद्यपि कार्बन-डाई-ऑक्साइड की वायुमंडल में बहुत कम मात्रा पाई जाती है, किन्तु पृथ्वी पर जीवन क्रम को संचालित करने, वायुमण्डल की संरचना (बनावट) और उसके घटकों के बीच मात्रात्मक संतुलन बनाए रखने की दृष्टि से उसकी  अहम भूमिका है क्योंकि प्राणियों के लिए हानिकारक समझी जाने वाली कार्बनडाई ऑक्साइड हरे पेड़-पौधों के लिए बहुत ही आवश्यक है।

कार्बन-डाई-ऑक्साइड, कार्बन-मोनो-ऑक्साइड, सल्फर-डाई- ऑक्साइड एवं नाइट्रस ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें उत्सर्जित हो रही हैं। वे पर्यावरण को प्रदूषित कर रही हैं, वनस्पतियों का विनाश कर रही हैं तथा प्राणिजगत के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। मनुष्य में कैंसर, श्वसन संबंधी अनेक रोग, नेत्र रोग, मोतियाबिन्द जैसी बीमारियां उत्पन्न कर रही हैं। इन सब गतिविधियों का अन्ततोगत्वा जलवायु पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है।  विनाश को टालने के लिए तत्काल आवश्यकता है कार्बन-डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन की मात्रा में बड़ी कमी लाई जाए तथा सीएफसीज़ के वैकल्पिक यौगिक काम में लिए जाए।

 

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