दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला – नहीं दिखा सकते प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री

नयी दिल्ली, 26 अगस्त। दिल्ली हाई कोर्ट ने 25 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री से संबंधित एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन (सीआईसी) के 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) को 1978 के बैचलर ऑफ आर्ट्स (बीए) कोर्स के रिकॉर्ड्स सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था। यह मामला आरटीआई (सूचना का अधिकार) अधिनियम के तहत व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन को लेकर चर्चा में रहा।
मामले की पृष्ठभूमि
2016 में एक आरटीआई कार्यकर्ता ने दिल्ली विश्वविद्यालय से 1978 के बैचलर ऑफ आर्ट्स कोर्स के सभी छात्रों के रिकॉर्ड्स की जांच की मांग की थी, जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री से संबंधित जानकारी भी शामिल थी। सीआईसी ने तब डीयू को निर्देश दिया था कि वह इन रिकॉर्ड्स को उपलब्ध कराए, क्योंकि मोदी ने सार्वजनिक रूप से अपनी डिग्री का उल्लेख किया था। डीयू ने इस आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में अपील दायर की, जिसमें तर्क दिया गया कि यह जानकारी व्यक्तिगत है और इसका खुलासा गोपनीयता का उल्लंघन होगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में दलील दी कि विश्वविद्यालय के पास 1978 की बीए डिग्री मौजूद है, लेकिन इसे सार्वजनिक करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला
25 अगस्त 2025 को, न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने डीयू की अपील को स्वीकार करते हुए सीआईसी के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर जोर दिया:
- व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता: कोर्ट ने माना कि शैक्षणिक रिकॉर्ड्स, जैसे डिग्री, मार्कशीट और परिणाम, आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(j) के तहत “व्यक्तिगत जानकारी” की श्रेणी में आते हैं। ऐसी जानकारी का खुलासा तभी संभव है जब यह स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हित में हो, जैसे भ्रष्टाचार या अनियमितता का मामला। इस मामले में, कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई मजबूत सार्वजनिक हित साबित नहीं हुआ।
- सीआईसी का आदेश अनुचित: कोर्ट ने कहा कि सीआईसी का 2016 का आदेश “अनुचित” था, क्योंकि इसमें डिग्री की वैधता पर कोई सीधा सवाल नहीं उठाया गया था। आरटीआई केवल 1978 के सभी छात्रों के रिकॉर्ड्स की जांच की मांग कर रही थी, जो गोपनीयता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
- सार्वजनिक हित का अभाव: कोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रधानमंत्री की डिग्री पर कोई ठोस संदेह नहीं उठाया गया था, और आरटीआई का उपयोग केवल सामान्य जांच के लिए किया गया, जो कानून के दायरे से बाहर था।
- आरटीआई की सीमाएं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता को बढ़ावा देना है, लेकिन यह व्यक्तिगत गोपनीयता के अधिकार को नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसलिए, डीयू अब इन रिकॉर्ड्स को साझा करने के लिए बाध्य नहीं है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं
- विपक्ष की प्रतिक्रिया: कांग्रेस ने इस फैसले को “अकल्पनीय” करार दिया और दावा किया कि प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता सार्वजनिक हित का विषय है। पार्टी ने मांग की कि मोदी अपनी डिग्री स्वयं सार्वजनिक करें ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
- सत्ताधारी पक्ष का रुख: सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और समर्थकों ने इस फैसले का स्वागत किया, इसे व्यक्तिगत गोपनीयता की जीत बताया। उनका कहना था कि यह मामला अनावश्यक रूप से राजनीतिक विवाद का हिस्सा बनाया गया था।
- सामाजिक चर्चा: सोशल मीडिया, विशेष रूप से एक्स पर, इस फैसले को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कुछ यूजर्स ने कोर्ट के गोपनीयता पर जोर देने के फैसले का समर्थन किया, जबकि अन्य ने इसे पारदर्शिता की कमी के रूप में देखा।
मामले का महत्व
यह फैसला न केवल प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री से जुड़े विवाद को प्रभावित करता है, बल्कि आरटीआई अधिनियम के दायरे और व्यक्तिगत गोपनीयता के अधिकार पर भी व्यापक प्रभाव डालता है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों की निजी जानकारी भी गोपनीयता के दायरे में आती है, जब तक कि उसका खुलासा स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हित में न हो। यह मामला भविष्य में आरटीआई के उपयोग और व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे से संबंधित मामलों में एक मिसाल के रूप में देखा जा सकता है।
भविष्य की संभावनाएं
हालांकि कोर्ट ने डिग्री की वैधता पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन यह फैसला इस विवाद को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। यदि भविष्य में कोई ठोस सबूत या नया आधार सामने आता है, तो यह मामला फिर से चर्चा में आ सकता है। साथ ही, विपक्षी दलों द्वारा इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाए जाने की संभावना बनी रहेगी।
