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वसुंधरा ताल में लगेगा पूर्व चेतावनी तंत्र

ग्लेशियल झीलों के खतरे की समय रहते मिलेगी चेतावनी, 13 झीलें उच्च जोखिम वाली चिह्नित

देहरादून, 29 सितम्बर। उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से संभावित बाढ़ के खतरे से निपटने के लिए चमोली जिले के वसुंधरा ताल में आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की जाएगी। प्रदेश की किसी ग्लेशियल झील में इस तरह की निगरानी एवं चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की यह पहली पहल है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने मंगलवार को सचिवालय से वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। अभियान 29 सितम्बर से 15 अक्टूबर तक चलेगा।

वसुंधरा ताल में जलस्तर, मौसम, बर्फ की गहराई और तापमान, जल प्रवाह तथा आसपास की भूगर्भीय हलचल की निगरानी के लिए आधुनिक सेंसर लगाए जाएंगे। उपग्रह संचार के जरिये इनसे मिलने वाले आंकड़े लगातार नियंत्रण तंत्र तक पहुंचेंगे। निर्धारित सीमा से असामान्य बदलाव होने पर चेतावनी जारी करने में मदद मिलेगी।

मुख्य सचिव ने कहा कि अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और वास्तविक समय में मिलने वाले आंकड़ों से ग्लेशियल झीलों में होने वाले बदलावों को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अभियान दल को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों की निगरानी और संभावित जोखिमों के प्रति सतर्कता बेहद जरूरी है।

उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के नेतृत्व में चलाए जा रहे इस अभियान में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान देहरादून के वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। दुर्गम क्षेत्र में सुरक्षा और सहयोग के लिए एसडीआरएफ, एनडीआरएफ तथा आईटीबीपी के जवान भी दल के साथ रहेंगे। टीम को उपग्रह फोन और लो अर्थ ऑर्बिट संचार उपकरण भी उपलब्ध कराए गए हैं।

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के 2023 के आंकड़ों में उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित हैं। इनमें 13 झीलों को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इनमें पिथौरागढ़ की छह, चमोली की चार तथा बागेश्वर, टिहरी गढ़वाल और उत्तरकाशी की एक-एक झील शामिल हैं।

इनमें से छह झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है। इनमें चमोली की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल तथा पिथौरागढ़ की दारमा घाटी की मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलें शामिल हैं। सर्वेक्षण से झीलों की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए गए हैं।

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और पूर्व चेतावनी तंत्र को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकता है। वसुंधरा ताल में स्थापित होने वाली प्रणाली के परिणामों के आधार पर भविष्य में अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में भी ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकेगी।

विशेषज्ञों के अनुसार ग्लेशियल झील के अचानक फटने से निचले इलाकों में बस्तियों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को गंभीर खतरा हो सकता है। नई प्रणाली का उद्देश्य ऐसे असामान्य बदलावों की समय रहते पहचान कर संबंधित एजेंसियों को चेतावनी देना है।

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