मोटल के कमरे में मिलीं दो नई प्रजातियां, जीवन के विकास के रहस्य खोलेंगी
A scrappy science project led to a significant discovery: two new species of a rare organism that could elucidate a fundamental transition in the history of life on our planet.
दुर्लभ ‘पॉलीनेला’ की खोज से वैज्ञानिकों को प्रकाश-संश्लेषण के विकास और जटिल जीवन की उत्पत्ति की महत्वपूर्ण प्रक्रिया समझने में मिल सकती है मदद
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उत्तरी कैरोलिना के एक साधारण मोटल के 80 डॉलर प्रतिदिन किराये वाले कमरे में बनाई गई अस्थायी प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों ने एक ऐसे दुर्लभ एककोशिकीय जीव की दो नई प्रजातियां खोजी हैं, जो पृथ्वी पर प्रकाश-संश्लेषक जीवन के विकास की एक महत्वपूर्ण पहेली सुलझाने में मदद कर सकती हैं। ‘पॉलीनेला’ नामक इस सूक्ष्मजीव की नई प्रजातियों की पहचान के बाद प्रकाश-संश्लेषण करने वाली इसकी ज्ञात प्रजातियों की संख्या छह हो गई है।
यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पॉलीनेला उस असाधारण विकासवादी प्रक्रिया का अपेक्षाकृत नया उदाहरण है, जिसमें कभी स्वतंत्र रूप से रहने वाला प्रकाश-संश्लेषक जीवाणु दूसरे जीव की कोशिका का स्थायी हिस्सा बन गया। अरबों वर्ष पहले हुई इसी तरह की एक प्राचीन घटना ने पेड़-पौधों और शैवाल सहित पृथ्वी के अधिकांश प्रकाश-संश्लेषक जटिल जीवन की नींव रखी थी।
मोटल का कमरा बना प्रयोगशाला
वर्ष 2025 के बसंत में जीवविज्ञानी डॉ. एंड्रयू विलोबी करीब साढ़े तीन घंटे गाड़ी चलाकर उत्तरी कैरोलिना के नैग्स हेड स्थित एक सस्ते मोटल पहुंचे। वहां विकासवादी जीवविज्ञानी डॉ. जूलिया वैन एटन ने अपने कमरे को अस्थायी प्रयोगशाला में बदल रखा था। दीवारों के पास खारे पानी से भरे जार थे, बाल्टियों में दलदली घास के नमूने रखे थे और बिस्तर के पास की मेजों पर सूक्ष्मदर्शी लगे थे।
वैन एटन के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की छोटी टीम ने कई दिनों तक पानी के नमूनों की एक-एक बूंद जांची। उनका लक्ष्य अत्यंत दुर्लभ पॉलीनेला को खोजना था। इसी खोज के दौरान वैज्ञानिकों को दो अलग तरह के सूक्ष्मजीव दिखाई दिए। बाद की सूक्ष्मदर्शी और आनुवंशिक जांच ने पुष्टि की कि वे विज्ञान के लिए अब तक अज्ञात दो अलग प्रजातियां हैं।
शोध के नतीजे ‘जर्नल ऑफ फाइकोलॉजी’ में प्रकाशित किए गए हैं। नई प्रजातियों को पॉलीनेला मारी (Paulinella marae) और पॉलीनेला मरेई (Paulinella murrayi) नाम दिया गया है।
क्यों खास है पॉलीनेला
पृथ्वी के लगभग सभी जटिल प्रकाश-संश्लेषक जीवों के इतिहास में करीब डेढ़ अरब वर्ष पहले एक निर्णायक घटना हुई थी। एक एककोशिकीय जीव ने प्रकाश-संश्लेषण करने वाले जीवाणु को अपने भीतर समाहित कर लिया। जीवाणु को पचाने के बजाय उसने उसे अपनी कोशिका के स्थायी अंग में बदल लिया। कालांतर में इसी प्रक्रिया से क्लोरोप्लास्ट विकसित हुए, जिनकी मदद से आज पौधे और शैवाल सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा बनाते हैं।
लंबे समय तक माना जाता रहा कि जीवन के इतिहास में यह प्रक्रिया केवल एक बार हुई। लेकिन वैज्ञानिकों को पता चला कि पॉलीनेला में ऐसी ही प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से करीब 10 करोड़ वर्ष पहले शुरू हुई थी। विकास के पैमाने पर यह अपेक्षाकृत हाल की घटना है। इसलिए पॉलीनेला वैज्ञानिकों को उस प्रक्रिया का अध्ययन करने का दुर्लभ अवसर देता है, जिसे पौधों के अत्यंत प्राचीन पूर्वजों में प्रत्यक्ष रूप से देखना अब संभव नहीं है।
सिरैक्यूज़ विश्वविद्यालय की जीवविज्ञानी डॉ. एंजेला ओलिवेरियो के अनुसार प्राचीन घटना का अध्ययन कठिन है, लेकिन पॉलीनेला में वैज्ञानिक इस विकासवादी प्रक्रिया के अपेक्षाकृत हाल के चरणों को समझ सकते हैं।

1894 में मिला था पहला पॉलीनेला
पॉलीनेला की पहली ज्ञात प्रजाति की खोज जर्मन जीवविज्ञानी रॉबर्ट लॉटरबॉर्न ने 24 दिसंबर 1894 को राइन नदी के तलछट में की थी। उन्होंने अपनी सौतेली मां पॉलीन के नाम पर इसका नाम पॉलीनेला रखा। लेकिन इसकी वास्तविक विकासवादी अहमियत करीब एक सदी बाद आनुवंशिक अध्ययनों से सामने आई।
पॉलीनेला को ढूंढना आसान नहीं है। यह बेहद छोटा और दुर्लभ है तथा पानी में मौजूद दूसरे सूक्ष्मजीवों के बीच आसानी से छिप जाता है। प्रयोगशाला में भी इसकी वृद्धि धीमी होती है और संख्या दोगुनी होने में चार से पांच दिन लग सकते हैं।
डॉ. वैन एटन ने इसे पहली बार उस समय खोजा था जब वह रटगर्स विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रही थीं। उत्तरी कैरोलिना में पारिवारिक छुट्टी के दौरान उन्होंने एक साधारण सूक्ष्मदर्शी से स्थानीय पानी के नमूने की जांच की। प्लवकों के बीच उन्हें एक छोटा हरा बिंदु दिखाई दिया, जो पॉलीनेला निकला। इसके बाद उन्होंने कई वर्षों तक इस क्षेत्र से नमूने जुटाए।

आर्थिक संकट ने वैज्ञानिकों को मिलाया
वर्ष 2025 की खोज ऐसे समय हुई जब अमेरिका में संघीय विज्ञान वित्तपोषण को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई थी। डॉ. वैन एटन की नेशनल साइंस फाउंडेशन से जुड़ी फेलोशिप का भुगतान भी अस्थायी रूप से प्रभावित हुआ। इसी दौर में करीब 300 वैज्ञानिकों के एक ऑनलाइन समूह के माध्यम से उनकी मुलाकात डॉ. विलोबी से हुई। बाद में वित्तपोषण बहाल हो गया, लेकिन इस संपर्क से वैज्ञानिक सहयोग शुरू हो गया।
वैन एटन ने विलोबी को पॉलीनेला खोजने के अपने अगले अभियान में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। मेन स्थित बिगेलो लेबोरेटरी फॉर ओशन साइंसेज के डॉ. जॉन बर्न्स भी इस अभियान का हिस्सा बने।
महंगे और अत्याधुनिक उपकरणों के बजाय वैज्ञानिकों ने शुरुआती खोज में बेहद साधारण साधनों का इस्तेमाल किया। टूथब्रश के रेशों को पेंसिल पर चिपकाकर सूक्ष्मजीवों को अलग करने का उपकरण बनाया गया और महीन नली की सहायता से पॉलीनेला को दूसरे जीवों के बीच से निकाला गया।
शल्कों की दिशा से मिला पहला सुराग
निर्णायक सुराग डॉ. विलोबी को मिला। उन्होंने देखा कि दो प्रकार के पॉलीनेला के शरीर पर मौजूद कवच जैसे सूक्ष्म शल्क अलग-अलग दिशाओं में एक-दूसरे पर चढ़े हुए हैं। एक प्रकार में इनका क्रम घड़ी की सुइयों की दिशा में था, जबकि दूसरे में विपरीत दिशा में।
इसके बाद नमूनों को मेन स्थित प्रयोगशाला में इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से जांचा गया। दोनों के बीच स्पष्ट संरचनात्मक अंतर दिखाई दिया। वैज्ञानिकों ने इनके भीतर मौजूद प्रकाश-संश्लेषक संरचना ‘क्रोमैटोफोर’ के डीएनए का भी अध्ययन कराया। दक्षिण कोरिया के पॉलीनेला विशेषज्ञों के सहयोग से किए गए आनुवंशिक अनुक्रमण ने आखिरकार पुष्टि कर दी कि ये दो अलग और अब तक अज्ञात प्रजातियां हैं।
वैज्ञानिकों के लिए इन दो नई प्रजातियों की खोज महज जैव विविधता में दो नाम जुड़ने तक सीमित नहीं है। पॉलीनेला यह समझने का एक दुर्लभ जीवित मॉडल है कि कैसे दो स्वतंत्र जीवों का संबंध धीरे-धीरे इतना गहरा हो सकता है कि एक जीव दूसरे की कोशिका का स्थायी अंग बन जाए। यही प्रक्रिया पृथ्वी पर प्रकाश-संश्लेषक जटिल जीवन के विकास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक रही है।
नई प्रजातियां अब वैज्ञानिकों को इस विकासवादी प्रक्रिया की तुलना करने के लिए अधिक उदाहरण उपलब्ध कराएंगी। भविष्य में इनके अध्ययन से कोशिकांगों की उत्पत्ति, प्रकाश-संश्लेषण के विकास और जटिल कोशिकाओं के इतिहास के बारे में नई जानकारियां सामने आ सकती हैं।


