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24 हजार प्रकाश-वर्ष दूर न्यूट्रॉन तारे के आसपास छिपी संरचना का मिला सुराग

चित्र 1: उच्च-द्रव्यमान वाली एक्स-रे द्वितारा प्रणाली सेंटॉरस X-3 का कलात्मक चित्रण, चित्र में दर्शाए गए आकार वास्तविक अनुपात में नहीं हैं।

An X-ray binary pulsar consists of a pulsar— a highly magnetised neutron star, and a Sun-like star bound in a gravitational dance. A neutron star is a celestial body with the mass of our sun crunched into a ball the size of Bangalore. In an X-ray binary, the pulsar’s extreme gravity pulls in material ejected by its companion star, and the pulsar starts accreting material from it, shooting out X-rays in the process. Centaurus X-3, a high-mass X-ray binary (HMXB) where the companion is more than 10 times the Sun’s mass, was one of the first X-ray pulsars to be discovered, and the third X-ray source to be discovered in the constellation Centaurus, 24000 light years away.

तारे से निकलने वाली एक्स-रे किरणों के उतार-चढ़ाव ने खोला अंतरिक्ष का रहस्य, भारतीय वैज्ञानिकों की खोज से बदल सकती है पल्सरों की वैज्ञानिक समझ

–ज्योति रावत –

अंतरिक्ष में लगभग 24 हजार प्रकाश-वर्ष दूर स्थित एक रहस्यमय तारा वैज्ञानिकों के सामने नया सवाल खड़ा कर रहा है। आकार में किसी बड़े शहर जितना छोटा, लेकिन द्रव्यमान में लगभग सूर्य के बराबर यह तारा अपने पड़ोसी विशाल तारे से पदार्थ खींचकर उसे निगल रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि पदार्थ को अपनी ओर खींचने के लिए वह एक ऐसी चक्राकार संरचना का इस्तेमाल कर रहा है, जिसकी इस प्रकार के तारकीय समूहों में सामान्यतः अपेक्षा नहीं की जाती। भारतीय वैज्ञानिकों ने इस तारे से निकलने वाली एक्स-रे किरणों में होने वाले सूक्ष्म उतार-चढ़ाव का विश्लेषण करके उसके आसपास छिपी इस संरचना का महत्वपूर्ण सुराग खोज निकाला है।

यह खोज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने की है। अध्ययन का नेतृत्व अनुसंधानकर्ता किंजल रॉय ने किया। वैज्ञानिकों ने सेंटॉरस एक्स-3 नामक प्रसिद्ध एक्स-रे पल्सर का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि उसके आसपास पदार्थ की एक अभिवृद्धि डिस्क मौजूद है, जिसके माध्यम से वह अपने साथी तारे से पदार्थ प्राप्त कर रहा है।

आखिर क्या होता है न्यूट्रॉन तारा?

इस खोज को समझने के लिए पहले न्यूट्रॉन तारों की विचित्र दुनिया को जानना जरूरी है। ब्रह्मांड में कुछ तारे अपने जीवन के अंतिम चरण में विस्फोट के बाद अत्यंत सघन पिंडों में बदल जाते हैं। इन्हें न्यूट्रॉन तारे कहा जाता है।

कल्पना कीजिए कि हमारे सूर्य के बराबर द्रव्यमान को समेटकर लगभग 20 से 25 किलोमीटर व्यास के एक गोले में बंद कर दिया जाए। न्यूट्रॉन तारा कुछ ऐसा ही अद्भुत खगोलीय पिंड है। इसका गुरुत्वाकर्षण इतना शक्तिशाली होता है कि इसके आसपास मौजूद पदार्थ बड़ी तेजी से इसकी ओर आकर्षित होता है।

कुछ न्यूट्रॉन तारे अत्यंत शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र रखते हैं और अपनी धुरी पर घूमते हुए नियमित अंतराल पर विकिरण की किरणें उत्सर्जित करते हैं। इन्हें पल्सर कहा जाता है।

इनकी कार्यप्रणाली समुद्र तट पर लगे प्रकाशस्तंभ जैसी होती है। प्रकाशस्तंभ का घूमता हुआ प्रकाश दूर खड़े व्यक्ति को नियमित अंतराल पर दिखाई देता है। इसी प्रकार पल्सर से निकलने वाली विकिरण किरण जब पृथ्वी की दिशा में आती है, तो अंतरिक्ष दूरबीन उसे एक स्पंदित संकेत के रूप में दर्ज करती है।

दो तारों की अद्भुत जोड़ी

सेंटॉरस एक्स-3 एक द्वितारा प्रणाली है। इसमें एक न्यूट्रॉन तारा और उसका विशाल साथी तारा गुरुत्वाकर्षण के कारण एक-दूसरे से बंधे हुए हैं।

इस प्रणाली में साथी तारे का द्रव्यमान सूर्य से दस गुना से भी अधिक है। सेंटॉरस एक्स-3 पृथ्वी से लगभग 24 हजार प्रकाश-वर्ष दूर सेंटॉरस तारामंडल की दिशा में स्थित है। यह खोजे गए शुरुआती एक्स-रे पल्सरों में से एक है और अपनी असाधारण चमक के कारण लंबे समय से खगोल वैज्ञानिकों के अध्ययन का विषय रहा है।

यहां एक दिलचस्प प्रश्न उठता है कि इतनी दूर स्थित न्यूट्रॉन तारा अपने विशाल साथी से पदार्थ कैसे प्राप्त करता है?

विशाल तारों से गैस और आवेशित कणों का प्रवाह लगातार बाहर निकलता रहता है। इसे तारकीय पवन कहते हैं। सामान्यतः उच्च-द्रव्यमान वाली एक्स-रे द्वितारा प्रणालियों में न्यूट्रॉन तारा इसी तारकीय पवन से पदार्थ खींचता है।

लेकिन सेंटॉरस एक्स-3 के मामले में वैज्ञानिकों को एक अलग प्रक्रिया के प्रमाण मिले हैं।

एक्स-रे किरणों ने खोला छिपी संरचना का रहस्य

वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि सेंटॉरस एक्स-3 पृथ्वी से इतनी दूर है कि अत्याधुनिक दूरबीनों से भी उसके आसपास की छोटी संरचनाओं की स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करना संभव नहीं है।

ऐसे में वैज्ञानिकों ने प्रकाश की तीव्रता में होने वाले बदलावों को अपना सुराग बनाया।

पल्सर के चुंबकीय ध्रुवों से निकलने वाले विकिरण को प्राथमिक विकिरण कहा जाता है। जब यह विकिरण आसपास मौजूद गैस, पदार्थ के प्रवाह या अन्य संरचनाओं से टकराता है, तो उसका कुछ हिस्सा अवशोषित होकर दोबारा उत्सर्जित होता है। इस पुनः उत्सर्जित विकिरण को द्वितीयक विकिरण कहते हैं।

रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने द्वितीयक विकिरण की चार उत्सर्जन रेखाओं का विस्तृत अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि इनकी तीव्रता पल्सर के घूमने के साथ एक विशेष क्रम में बदलती है।

यह सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं था। इससे संकेत मिला कि विकिरण उत्पन्न करने वाली संरचना का संबंध पल्सर के घूर्णन से है।

वैज्ञानिकों ने इन संकेतों का विश्लेषण करके निष्कर्ष निकाला कि इनके पीछे अभिवृद्धि प्रवाह की महत्वपूर्ण भूमिका है।

अंतरिक्ष में पदार्थ की घूमती हुई डिस्क

अभिवृद्धि डिस्क गैस और अन्य पदार्थों की चक्राकार संरचना होती है, जो किसी अत्यंत सघन खगोलीय पिंड के चारों ओर बन सकती है।

इसकी तुलना किसी घूमते हुए भंवर से की जा सकती है, जिसमें पदार्थ धीरे-धीरे केंद्र की ओर बढ़ता है। हालांकि अंतरिक्ष में यह प्रक्रिया गुरुत्वाकर्षण, पदार्थ के कोणीय संवेग और चुंबकीय क्षेत्र जैसी शक्तियों से नियंत्रित होती है।

सेंटॉरस एक्स-3 में वैज्ञानिकों के अनुसार साथी तारे से प्राप्त पदार्थ पहले अभिवृद्धि डिस्क में एकत्र होता है। इसके बाद वह एक प्रवाह के रूप में न्यूट्रॉन तारे की ओर बढ़ता है।

न्यूट्रॉन तारे का शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र इस पदार्थ को उसके चुंबकीय ध्रुवों की ओर निर्देशित करता है। वहां पदार्थ के गिरने से अत्यधिक ऊर्जा निकलती है और एक्स-रे विकिरण उत्पन्न होता है।

अध्ययन में पाया गया कि जब पदार्थ का यह प्रवाह पल्सर और उसे देखने वाले उपग्रह के बीच आता है, तो सीधे आने वाले प्राथमिक विकिरण की तीव्रता कम हो जाती है। इसी दौरान प्रवाह से संबंधित द्वितीयक विकिरण अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है।

इन दोनों प्रकार के विकिरणों में होने वाले बदलावों ने वैज्ञानिकों को उस संरचना की पहचान करने में मदद की, जिसे सीधे देख पाना संभव नहीं था।

इस खोज से क्यों बदल सकती है वैज्ञानिक समझ?

इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात सेंटॉरस एक्स-3 में अभिवृद्धि डिस्क के माध्यम से पदार्थ संचय के प्रमाण मिलना है।

उच्च-द्रव्यमान वाली एक्स-रे द्वितारा प्रणालियों में सामान्यतः साथी तारे से निकलने वाली तारकीय पवन के सीधे आकर्षित होने को पदार्थ संचय की प्रमुख प्रक्रिया माना जाता है। इसलिए सेंटॉरस एक्स-3 में डिस्क की भूमिका का संकेत वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

अनुसंधानकर्ता किंजल रॉय के अनुसार, यदि इस प्रणाली में अभिवृद्धि डिस्क मौजूद है, तो उसके विकिरण संबंधी मौजूदा वैज्ञानिक मॉडलों में आवश्यक संशोधन करने होंगे। भविष्य में सेंटॉरस एक्स-3 के अधिक सटीक मॉडल विकसित करते समय अभिवृद्धि डिस्क से निकलने वाले विकिरण को भी ध्यान में रखना होगा।

इससे वैज्ञानिक यह बेहतर समझ सकेंगे कि न्यूट्रॉन तारे अपने साथी तारों से पदार्थ किस प्रकार प्राप्त करते हैं, उनके शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र पदार्थ की गति को कैसे नियंत्रित करते हैं और अत्यधिक ऊर्जा वाला एक्स-रे विकिरण किन परिस्थितियों में उत्पन्न होता है।

यह अध्ययन अंतरिक्ष अनुसंधान की एक बड़ी विशेषता भी सामने लाता है। ब्रह्मांड की अनेक संरचनाओं को सीधे देख पाना संभव नहीं होता, लेकिन उनसे निकलने वाले प्रकाश और विकिरण में छिपे संकेत उनके अस्तित्व का पता दे सकते हैं।

सेंटॉरस एक्स-3 की यह खोज बताती है कि लगभग 24 हजार वर्ष पहले वहां से चली एक्स-रे किरणें आज पृथ्वी पर वैज्ञानिकों को उस दूरस्थ तारकीय संसार की संरचना और गतिविधियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे रही हैं। अंतरिक्ष के रहस्यों को समझने के लिए हमेशा किसी वस्तु की तस्वीर जरूरी नहीं होती; कभी-कभी उसकी रोशनी में होने वाला मामूली बदलाव भी एक बड़ी वैज्ञानिक खोज का आधार बन जाता है।

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