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साक्षरता की छलांग, मगर मंजिल अभी दूर

Literacy is a foundation of national development. Beyond being an indicator of educational progress, it enables individuals to access opportunities, participate in the economy, and engage meaningfully in society. UNESCO recognises literacy as a fundamental human right and a significant driver of achieving equality, justice, inclusion, and respect for the rule of law. India has made significant strides in improving its literacy rate over the past eight decades. In 1947, the country’s overall literacy rate stood at just 14%, while female literacy was remarkably low at 8%. India has undertaken several initiatives over the years to improve literacy and strengthen its education system. The government introduced the National Education Policy (NEP) 2020 to reform education at all levels and develop a skilled, adaptable, and future-ready workforce.

 

 

— A PIB FEATURE-

आजादी के समय जिस भारत में साक्षरता की स्थिति अत्यंत कमजोर थी, उसने करीब आठ दशकों में लंबी दूरी तय की है। 1947 में देश की कुल साक्षरता दर महज 14 प्रतिशत और महिलाओं की केवल 8 प्रतिशत थी। 1951 की जनगणना में साक्षरता 18.32 प्रतिशत दर्ज हुई, जो 2011 में बढ़कर 74.04 प्रतिशत हो गई। अब 2025 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के अनुसार देश की साक्षरता दर 81.1 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन आंकड़ों की गहराई में जाएं तो स्पष्ट होता है कि भारत की अगली चुनौती केवल लोगों को अक्षर ज्ञान देना नहीं, बल्कि ग्रामीण-शहरी और स्त्री-पुरुष के बीच शेष अंतर मिटाते हुए साक्षरता को जीवनोपयोगी ज्ञान में बदलना है।

साक्षरता की परिभाषा भी अब बदल रही है। पढ़ना-लिखना और साधारण हिसाब जान लेना भर साक्षर होने की कसौटी नहीं रह गया। शिक्षा मंत्रालय ने इसमें समझ के साथ पढ़ने-लिखने और गणना करने के साथ डिजिटल तथा वित्तीय साक्षरता जैसे जीवन कौशल भी शामिल किए हैं। सरकार किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में 95 प्रतिशत साक्षरता को पूर्ण साक्षरता के समकक्ष मानती है। इस लिहाज से साक्षरता अब प्रमाणपत्र से अधिक व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी में ज्ञान के व्यावहारिक इस्तेमाल की क्षमता है।

बढ़ी साक्षरता, लेकिन कायम है असमानता

भारत की उपलब्धि का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष महिलाओं की स्थिति में आया बदलाव है। 1951 में पुरुष साक्षरता 27.15 प्रतिशत और महिला साक्षरता केवल 8.86 प्रतिशत थी। 2011 तक ये दरें क्रमशः 82.14 और 65.46 प्रतिशत हो गईं। लेकिन वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि अंतर अभी समाप्त नहीं हुआ है। 2025 में सात वर्ष और उससे अधिक आयु की शहरी आबादी में पुरुष साक्षरता 93.1 प्रतिशत और महिला साक्षरता 84.8 प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंतर और बड़ा है—पुरुषों में 84.8 प्रतिशत के मुकाबले महिलाओं में केवल 70.3 प्रतिशत। इसी तरह सात वर्ष से अधिक उम्र की शहरी आबादी की साक्षरता 89 प्रतिशत, जबकि ग्रामीण आबादी की 77.4 प्रतिशत है। यानी राष्ट्रीय औसत बढ़ने के बावजूद भूगोल और लिंग आज भी शिक्षा के अवसर को प्रभावित कर रहे हैं।

स्कूली शिक्षा के आंकड़ों में भी उपलब्धि और चुनौती साथ-साथ दिखाई देती है। 2025-26 में देश के स्कूलों में 24.72 करोड़ से अधिक विद्यार्थी नामांकित थे। तैयारी स्तर पर स्कूल छोड़ने की दर 1.8 प्रतिशत और मध्य स्तर पर 3.6 प्रतिशत है, लेकिन माध्यमिक स्तर पर यह बढ़कर 7 प्रतिशत हो जाती है। इससे भी महत्वपूर्ण आंकड़ा विद्यार्थियों के स्कूल में बने रहने का है। शुरुआती स्तर पर यह दर 98.5 प्रतिशत है, लेकिन माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते 51.9 प्रतिशत रह जाती है। इसका अर्थ है कि बच्चों को स्कूल तक लाने के साथ उन्हें माध्यमिक शिक्षा पूरी कराने पर कहीं अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

उच्च शिक्षा में तस्वीर अपेक्षाकृत उत्साहजनक है। 2014-15 में उच्च शिक्षा में 3.42 करोड़ विद्यार्थी थे, जिनकी संख्या 2023-24 में बढ़कर 4.50 करोड़ हो गई। इसी अवधि में सकल नामांकन अनुपात 23.7 से बढ़कर 30 प्रतिशत हुआ। उच्च शिक्षा संस्थानों से उत्तीर्ण होने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी 88.28 लाख से बढ़कर 1.09 करोड़ से अधिक हो गई। हालांकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति का लक्ष्य 2035 तक उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को 50 प्रतिशत तक पहुंचाना है। इसलिए वर्तमान 30 प्रतिशत से लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी है।

निरक्षर वयस्कों तक पहुंचने की चुनौती

भारत की साक्षरता यात्रा में अब विशेष महत्व उन लोगों का है, जो किसी कारण औपचारिक स्कूली शिक्षा से वंचित रह गए। इसी उद्देश्य से 15 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों के लिए उल्लास यानी नव भारत साक्षरता कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसमें केवल पढ़ना-लिखना नहीं, बल्कि अंक ज्ञान, जरूरी जीवन कौशल और सतत सीखने के अवसर शामिल हैं। कार्यक्रम स्वयंसेवा और सामुदायिक भागीदारी पर आधारित है। घर-घर जाकर निरक्षर लोगों और संभावित स्वयंसेवी शिक्षकों की पहचान करने तथा दोनों को जोड़ने की व्यवस्था की गई है।

इस कार्यक्रम का आकार भी बड़ा है। वर्ष 2022 से 2027 के बीच 1,037.90 करोड़ रुपये के प्रावधान के साथ पांच करोड़ शिक्षार्थियों को इससे जोड़ने का लक्ष्य है। अब तक करीब 4.03 करोड़ शिक्षार्थियों और 52.20 लाख से अधिक स्वयंसेवकों का पंजीकरण हुआ है तथा 3.3 करोड़ से अधिक शिक्षार्थी बुनियादी साक्षरता एवं संख्या ज्ञान मूल्यांकन परीक्षा में भाग ले चुके हैं। 2024 से 2026 के बीच लद्दाख, मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, अंडमान-निकोबार, सिक्किम, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर सहित दस राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों ने स्वयं को पूर्ण साक्षर घोषित किया है।

बच्चों के लिए निपुण भारत का लक्ष्य 2026-27 तक बुनियादी साक्षरता और अंक ज्ञान सुनिश्चित करना है। इसके साथ समग्र शिक्षा, पीएम श्री, पीएम ई-विद्या और पीएम पोषण जैसी योजनाएं शिक्षा की निरंतरता से जुड़ी हैं। पीएम पोषण के तहत 10.36 लाख सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में बाल वाटिका तथा कक्षा एक से आठ तक के 11.20 करोड़ विद्यार्थियों को स्कूल के दिनों में पका हुआ भोजन देने का प्रावधान है।

अक्षर ज्ञान से आगे की लड़ाई

भारत के सामने अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितने लोग अपना नाम लिख सकते हैं। असली कसौटी यह है कि कितने लोग पढ़ी हुई बात समझ सकते हैं, डिजिटल माध्यमों का सुरक्षित इस्तेमाल कर सकते हैं, वित्तीय व्यवहार समझते हैं और शिक्षा के सहारे अपनी आजीविका तथा सामाजिक भागीदारी बेहतर कर सकते हैं। इसीलिए साक्षरता का अगला चरण संख्या बढ़ाने से अधिक उसकी गुणवत्ता का है।

राष्ट्रीय स्तर पर 81.1 प्रतिशत साक्षरता निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन ग्रामीण महिलाओं की 70.3 प्रतिशत साक्षरता, माध्यमिक स्तर पर घटती स्कूल-धारण दर और उच्च शिक्षा में अभी 30 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात बताते हैं कि सफलता की राष्ट्रीय औसत तस्वीर के पीछे कई असमानताएं मौजूद हैं।

विकसित भारत की बुनियाद केवल बड़ी अर्थव्यवस्था से नहीं बनेगी। उसके लिए ऐसी आबादी चाहिए जो साक्षर होने के साथ शिक्षित, कुशल और बदलती तकनीक के अनुरूप स्वयं को ढालने में सक्षम हो। इसलिए अगले चरण का लक्ष्य “हर व्यक्ति साक्षर” से आगे बढ़कर “हर व्यक्ति सक्षम” होना चाहिए। तभी पिछले आठ दशकों में साक्षरता के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन की वास्तविक शक्ति बन सकेगी।

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