पहाड़ों में न जल रह गया और न ही जीवन

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– सतीश चन्द्र ध्यानी

उत्तराखंड में जल संकट के सम्बन्ध में एक टीबी चैनल में समाचार चल रहा है कि उत्तराखंड के पारम्परिक जल स्रोत सुखने के कगार पर पहुँच चुके हैं जिसका सर्वे में आकलन किया गया है इसी क्रम में आज मैं अपना विचार प्रकट कर रहा हूँ “कहते हैं जल है तो जीवन है “जीवन का तात्पर्य केवल मनुष्य के जीवन से ही सम्बन्धित नहीं है, अपितु समस्त जीवजन्तु, पेड-पौधे,खेती की फसलआदि से भी है अतीत में उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में प्राकृतिक जल स्रोतों से ही जल की पर्याप्त पूर्ति इन्हीं स्त्रोंतों से होती थी चाहे पशुओं का हो या चाहे सिचिंत खेती हो समस्त क्रियाकलाप की पूर्ति होती थी।

वर्तमान में विकास की धुरी का पहिया शनैः शनैः ऐसा घूमा कि जिसका प्रभाव हमारे उत्तराखंड के सुख -चैन को पूर्ण रूप से तहस- नहस करता चला गया। इस ओर न यहाँ के जनमानस का ध्यान गया न ही यहाँ की अन्धी बहरी सरकारों का। मानस तो जनसंख्या बृध्दि के कारण खेती से पर्याप्त भरण -पोषण न होने से धीरे -थीरे रोजी -रोटी के चक्कर में शहरों की ओर आकर्षित होता चला गया, परन्तु सरकारें कागजों तक ही लीपापोती करती रही। पहाड़ का नेतृत्व तो केवल वोट तक सीमित रहा।

जब “आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो” की मांग के उपरान्त वर्ष 2000 में पहाड़ी राज्य की अवधारणा भी हमारी पूरी हुयी, तदुपरांत तो जैसे जनमानस की पलायन की बाढ सी आ गयी तथा गाँव खाली होते गये और जनप्रतिनिधि माया के चक्कर में मग्न हो गये, उनका ध्यान अपने स्वार्थों तक सीमित हो गया। यह कटु सत्य है आज गाँव में न जल है न जीवन दोनों नष्ट हो रहे हैं जो लोग पलायनवाद से लेकर जल जीवन पर चर्चा कर रहे हैं वे शहरों की आबोहवा तक सीमित हैं न तो वे वास्तविकता से रुबरू हैं न सरकार के नीति निर्धारक सारी बातें हवाहवाई हो रही हैं उसके मुख्य कारणों की ओर किसी का ध्यान नहीं है पूर्व में पहाड़ी खेती फसलों से लहलहाती थी तो उसका सीधा प्रभाव जल स्रोतों से था दूसरा कारण प्रत्येक परिवार के औसतन 10 पशुओं का पालन हुआ करता था जिसका प्रभाव जल स्रोत से ही था। कुछ लोग खरक (पशुओं का समूह) रखा करते थे। जब सम्पूर्ण खेती चाहे ऊसर हो, चाहे सिंचित हो जल का रिसाव धरती में होता था पशु जब जंगल या चारागाह में जाते थे तो उनके पैरों के निशान से भी जल रिसाव धरती में होता था और उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों के जल स्रोत वर्षभर जल से परिपूर्ण रहते थे। आधुनिक भौतिकवादी व्यवस्था के कारण जल स्रोतों से अनावश्यक छेड़छाड़ के कारण, साथ ही सड़क निर्माण से पानी के स्त्रोतों को प्रभावित कर दिया है माना कि खेती जंगली जानवरों से भी प्रभावित हो रही है लोग खेती का रुझान कमतरः हुआ है साथ ही सरकार के फ्री राशन आबंटित करने से तो उत्तराखंड के पहाड़ी गाँव का जनमानस अकर्मण्यता की ओर चला गया है इसके लिए सरकार की योजनाओं का गलत तरीके से लाभ दिया जा रहा है वो भी एक कारण है अन्य कारण में पेड़ कटान तथा वृक्षारोपण मात्र कागज तक ही सीमित होना है। बंजर खेतों के कारण फलदार वृक्ष, भेमल आदि पशुचारा वृक्ष भी समाप्त होते जा रहे हैं जिनका असर भी जल स्रोतों से ही है कई अन्य कारणों से भी जैसे चीड, यूकेलिप्टस आदि वृक्षारोपण से जल स्रोत सूख रहे हैं। वर्तमान में सरकार जल जीवन मिशन योजना के तहत हर घर पानी उपलब्ध कराने की योजना खोखली प्रतीत हो रही है तथा भ्रष्टाचार के भेंट चढ़ रही है।

यदि सरकार और पहाडों के बुद्धिजीवी वर्ग को विखरतेजल जीवन को बचाना है तो पहले पहाड़ ही निवास करना होगा अन्यथा शहरों में सुप्तावस्था में ही सीमित रहो। वहाँ से उपदेश या व्याख्यान करना छोड़ा जाए। एक समय आयेगा जब सबको पश्चाताप के सिवाय कुछ हासिल नहीं होगा। दिनप्रतिदिन रोजगार के अवसर समाप्त होते जा रहे हैं तथा सरकारी योजनाओं को पलीता लग रहा है वो भी जगजाहिर है। मात्र कागज का पेट भरने के सिवाय कुछ नहीं है गाँव में इतनी विकास धनराशि मिल रही है कि वर्षभर रोजगार उपलब्ध हो सकता है ये भी कहाँ जा रही है समझ से परे है ।-

– सतीश चन्द्र ध्यानी,ग्राम दलमोटा ,रिखणीखाल।

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