मस्तिष्क की टीबी के उपचार में नई उम्मीद, नाक के रास्ते सीधे मस्तिष्क तक पहुंचेगी दवा

Indian scientists at the Institute of Nano Science and Technology (INST), Mohali, have developed an innovative drug delivery system to improve treatment of central nervous system tuberculosis (CNS-TB). Using chitosan-based nano-aggregates, the technique delivers anti-tuberculosis drugs, including isoniazid and rifampicin, directly to the brain through the nasal route, bypassing the blood-brain barrier. Laboratory studies demonstrated improved drug absorption, while experiments on infected mice showed an approximately 1,000-fold reduction in brain bacterial load compared with untreated mice. Published in Nanoscale, this promising research could revolutionize brain tuberculosis treatment, although further clinical trials are necessary to establish its safety and effectiveness in humans.
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-ज्योति रावत –
मस्तिष्क की तपेदिक (टीबी) जैसी गंभीर बीमारी के उपचार की दिशा में भारतीय वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी), मोहाली के शोधकर्ताओं ने दवाओं को नाक के रास्ते सीधे मस्तिष्क तक पहुंचाने की एक नई तकनीक विकसित की है। इस विधि से मस्तिष्क तक दवाओं की प्रभावी मात्रा पहुंचाने में आने वाली प्रमुख बाधा को दूर किया जा सकता है। प्रारंभिक प्रयोगों में इस तकनीक के उत्साहजनक परिणाम मिले हैं।
मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली टीबी को केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की तपेदिक (सीएनएस-टीबी) कहा जाता है। यह टीबी के सबसे गंभीर रूपों में से एक है। समय पर प्रभावी उपचार नहीं मिलने पर इससे गंभीर तंत्रिका संबंधी जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं और रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। इसके उपचार में सबसे बड़ी चुनौती मस्तिष्क की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली है, जिसे रक्त-मस्तिष्क अवरोध (ब्लड-ब्रेन बैरियर) कहा जाता है। यह अवरोध हानिकारक पदार्थों को मस्तिष्क में प्रवेश करने से रोकता है, लेकिन इसके कारण कई जीवनरक्षक दवाएं भी पर्याप्त मात्रा में मस्तिष्क तक नहीं पहुंच पातीं।
वर्तमान में मस्तिष्क की टीबी के उपचार के लिए सामान्यतः मुंह से दी जाने वाली टीबीरोधी दवाओं का उपयोग किया जाता है। हालांकि कुछ दवाएं मस्तिष्क तक पहुंचती हैं, लेकिन कई मामलों में संक्रमण वाले स्थान पर उनकी पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण होता है। इस समस्या को देखते हुए वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे दवाओं को अधिक प्रभावी ढंग से सीधे मस्तिष्क तक पहुंचाया जा सके।
आईएनएसटी, मोहाली के वैज्ञानिक राहुल कुमार वर्मा के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम ने इसके लिए चिटोसन नामक प्राकृतिक पदार्थ का उपयोग किया है। इस टीम में कृष्ण जाधव, अग्रिम जिल्टा, रघुराज सिंह, यूपा रे, विमल कुमार, अवध यादव और अमित कुमार सिंह शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने चिटोसन से अत्यंत सूक्ष्म कणों के समूह विकसित किए हैं, जिन्हें नैनो-एग्रीगेट्स कहा जाता है। चिटोसन जैव-अनुकूल और जैव-अपघटनीय पदार्थ है, जिसका उपयोग दवाओं को शरीर के भीतर सुरक्षित ढंग से पहुंचाने के लिए किया जा सकता है।
इन सूक्ष्म कणों में टीबी के उपचार में प्रयुक्त आइसोनियाजिड और रिफैम्पिसिन जैसी महत्वपूर्ण दवाओं को समाहित किया गया है। इनका निर्माण इस प्रकार किया गया है कि नाक के माध्यम से दिए जाने पर दवाएं मस्तिष्क तक पहुंच सकें। इस तकनीक को नाक से मस्तिष्क तक दवा पहुंचाने की विधि कहा जाता है।
इस विधि में नाक के भीतर मौजूद घ्राण और ट्राइजेमिनल तंत्रिकाओं से जुड़े मार्गों का उपयोग किया जाता है। इससे दवाओं को रक्त-मस्तिष्क अवरोध से उत्पन्न बाधा को काफी हद तक पार करते हुए मस्तिष्क तक पहुंचाने की संभावना बनती है। चिटोसन की एक विशेषता यह भी है कि यह नाक की भीतरी श्लेष्मिक सतह से चिपक सकता है। इससे दवा युक्त कण अधिक समय तक वहां बने रहते हैं और दवा धीरे-धीरे मुक्त होती है। परिणामस्वरूप दवा के अवशोषण और उसकी प्रभावशीलता में सुधार संभव है।
वैज्ञानिकों ने इन कणों को तैयार करने के लिए स्प्रे-ड्राइंग तकनीक का उपयोग किया। इससे ऐसे स्थिर सूक्ष्म कण तैयार किए गए जिन्हें नाक के माध्यम से देना अपेक्षाकृत आसान है। प्रयोगशाला परीक्षणों में पाया गया कि ये कण नाक की भीतरी सतह पर अच्छी तरह चिपकते हैं और सामान्य दवा वितरण की तुलना में कोशिकाओं तक अधिक मात्रा में दवा पहुंचाने में सक्षम हैं।
इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम टीबी से संक्रमित चूहों पर किए गए परीक्षणों में सामने आया। वैज्ञानिकों के अनुसार, नाक के रास्ते नैनो-एग्रीगेट्स के माध्यम से दवा देने पर बिना उपचार वाले संक्रमित चूहों की तुलना में मस्तिष्क में टीबी के जीवाणुओं की संख्या लगभग एक हजार गुना कम पाई गई। शोध में संक्रमण के कारण होने वाली सूजन कम होने के भी संकेत मिले।
यह अध्ययन रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री की वैज्ञानिक पत्रिका नैनोस्केल में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक मस्तिष्क की टीबी के अधिक लक्षित और प्रभावी उपचार का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। हालांकि अभी इसके परिणाम प्रयोगशाला और पशुओं पर किए गए परीक्षणों तक सीमित हैं। मनुष्यों में इसके सुरक्षित और प्रभावी उपयोग की पुष्टि के लिए आगे नैदानिक परीक्षण आवश्यक होंगे।
इस तकनीक की संभावनाएं केवल मस्तिष्क की टीबी तक सीमित नहीं हैं। भविष्य में इसका उपयोग मस्तिष्क के अन्य संक्रमणों, अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसे तंत्रिका संबंधी रोगों, मस्तिष्क ट्यूमर तथा मिर्गी के उपचार में दवाओं की प्रभावी आपूर्ति के लिए भी किया जा सकता है। हालांकि इन रोगों में इसके उपयोग की संभावनाओं का अलग से वैज्ञानिक परीक्षण करना होगा।
भारतीय वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मस्तिष्क की टीबी का उपचार आज भी चिकित्सा विज्ञान के लिए चुनौती बना हुआ है। यदि आगे के परीक्षण सफल होते हैं, तो नाक के रास्ते दवा पहुंचाने की यह तकनीक गंभीर मस्तिष्क संक्रमणों के उपचार में एक उपयोगी विकल्प बन सकती है।

