केवल 9 प्रतिशत प्लास्टिक कचरे की ही होती है रीसाइक्लिंग

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नयी दिल्ली, 14  अक्टूबर (PIB )

नीति आयोग और यूएनडीपी इंडिया ने देश में प्लास्टिक अपशिष्ट के स्थायी प्रबंधन बढ़ावा देने के लिए एक हस्तपुस्तिका का विमोचन किया। स्थायी शहरी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन पर नीति आयोग-यूएनडीपी हैंडबुक शीर्षक से युक्त इस रिपोर्ट को 11 अक्टूबर, 2021 को नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ राजीव कुमार और मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री अमिताभ कांत द्वारा जारी किया गया। इस अवसर पर पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव श्री रामेश्वर प्रसाद गुप्ता, विशेष सचिव डॉ के.राजेश्वर राव और यूएनडीपी इंडिया की रेजिडेंट प्रतिनिधि  सुश्री शोको नोडा भी उपस्थित थीं।

इस अवसर पर पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के सचिव आरपी गुप्ता ने कहा कि विश्व स्तर पर उत्पादित कुल प्लास्टिक के केवल 9% का ही पुनर्नवीनीकरण किया जाता है, लगभग 12% जला दिया जाता है और ऊर्जा की रिकवरी की जाती है, और शेष लगभग 79% भूमि, पानी और महासागर में मिल जाता है और पर्यावरण को प्रदूषित करता है। उन्होंने कहा कि एकल उपयोग वाले प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना महत्वपूर्ण है और जहां तक ​​संभव हो, प्लास्टिक की वस्तुएं जिनके लिए विकल्प उपलब्ध हैं, उन्हें छोड़ दिया जाना चाहिए।

इस अवसर पर अपने विचार साझा करते हुए यूएनडीपी इंडिया की रेजिडेंट प्रतिनिधि सुश्री शोको नोडा ने कहा कि यूएनडीपी में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन कार्यक्रम के तहत हमारे पर्यावरण की रक्षा करने और प्लास्टिक के लिए एक सर्कुलर इकॉनोमी बनाने के लिए सभी प्रकार के प्लास्टिक अपशिष्ट के संग्रह, पृथक्करण और पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जाता है

स्थायी शहरी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन: सारांश

शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 और प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के तहत शहरी स्तर पर नगरपालिका ठोस अपशिष्ट और प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन करना अनिवार्य किया गया है। इस  हस्तपुस्तिका में भारत सहित 4 प्रमुख दक्षिण एशियाई देशों के 18 मामलों का अध्ययन करते हुए सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों को शामिल किया गया है। इसमें 4 प्रमुख घटक जिनमें (ए) रीसाइक्लिंग के लिए तकनीकी मॉडल(बी) सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधाएं (एमआरएफ)(सी) प्रभावी प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के लिए शासन और (डी) आईईसी और डिजिटलीकरण शामिल हैं। पुस्तक में संपूर्ण प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन सेवा श्रृंखला के हर पहलू को शामिल किया गया है।

घटक I: प्लास्टिक अपशिष्ट पुनर्चक्रण और प्रबंधन के लिए तकनीकी मॉडल

विभिन्न हितधारकों और उनके सामाजिक लाभों को शामिल करके एक एकीकृत और समावेशी दृष्टिकोण पर आधारित इस घटक के तहत (ए) शहर स्तर पर प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन की आधारभूत प्रणाली का विकास(बी) शहरी स्तर पर प्लास्टिक अपशिष्ट की रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रणाली दृष्टिकोण (सी) हितधारकों की पहचान और भागीदारी(डी) प्लास्टिक कचरे के समग्र प्रबंधन के लिए नियामक आवश्यकता-अंतर विश्लेषण और प्रस्तावों के विकास को शामिल किया गया है।

घटक II: बेहतर प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन कार्यान्वयन के लिए-सामग्री पुनर्प्राप्ति सुविधा

यह घटक एमआरएफ में स्थल पहचान, निर्माण और अपशिष्ट प्रसंस्करण तंत्र से शुरू होने वाली सामग्री रिकवरी सुविधा (एमआरएफ) के पूर्ण कामकाज की व्याख्या करता है।

घटक III: शासन निकायों में एमआरएफ का संस्थानीकरण

प्लास्टिक कचरा प्रबंधन प्रणाली में कचरा बीनने वालों को मुख्यधारा में शामिल करने से कचरा बीनने वालों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और समाज में उनकी पहचान बढ़ेगी। इसके लिए शहरी स्थानीय निकायों द्वारा दीर्घकालीन धारणीयता के लिए विभिन्न अनुशंसित मॉडलों और कचरा बीनने वालों को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता है। इसके लिए कुछ प्रमुख गतिविधियों के रूप में कचरा बीनने वालों की सेवाओं को एमआरएफ से जोड़ना, क्षमता निर्माण, उन्हें वित्तीय रूप से साक्षर बनाना और उनके लिए बैंक खाते खोलना, उन्हें विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना, व्यावसायिक आईडी कार्ड, स्वास्थ्य लाभ और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण प्रदान करना, क्रच या खेल के मैदान और अन्य बुनियादी बाल शिक्षा सुविधाएं प्रदान करना एवं स्वयं सहायता समूह बनानाशामिल है।

घटक IV: आईईसी और डिजिटलाइजेशन

इस घटक में प्लास्टिक अपशिष्ट मूल्य श्रृंखला के विभिन्न चरणों से एक अंतर्निर्मित अंगीकृत प्रतिक्रिया प्रणाली स्थापित करके ज्ञान प्रबंधन तंत्र का विकास करना शामिल है। इसमें विभिन्न प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों, या तकनीकी सेवा प्रदाताओं की पहचान, संबंधित हितधारकों जैसे थोक अपशिष्ट उत्पन्नकर्ता (बीडब्ल्यूजी), पुनर्चक्रण और कचरा बीनने वालों के साथ संबंध, और अधिक प्रभावी ऑनलाइन रिपोर्टिंग, निगरानी एवं सूचना के आदान-प्रदान के लिए प्रोटोकॉल का विकास करना शामिल है।

 

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