ज्योतिर्मठ में भू-धंसाव उपचार कार्यों को लेकर उठे सवाल, डीपीआर सार्वजनिक करने की मांग

– प्रकाश कपरुवाण की रिपोर्ट-
ज्योतिर्मठ, 1 मई। आदि जगदगुरु शंकराचार्य की तपस्थली ज्योतिर्मठ वर्ष 2023 में आई भू-धंसाव की असामान्य आपदा से बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इस आपदा ने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाले इस नगर के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय लोगों को आंदोलन का सहारा भी लेना पड़ा।
भू-धंसाव के कारणों और समाधान की तलाश में देश के विभिन्न भू-वैज्ञानिक संस्थानों और विशेषज्ञों द्वारा विस्तृत सर्वेक्षण किया गया। इन अध्ययनों के आधार पर उच्च जोखिम और जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान कर आवश्यक सुरक्षात्मक उपायों की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी गई।
आठ प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट के आधार पर विभिन्न विभागों ने विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की। इसके अनुरूप केंद्र सरकार ने लगभग डेढ़ हजार करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि स्वीकृत की। करीब तीन वर्ष बाद, मार्च 2026 में कार्यदायी संस्थाओं ने जमीनी स्तर पर काम शुरू किया, हालांकि कार्यों की प्राथमिकता और स्वरूप को लेकर अब भी स्पष्टता का अभाव बताया जा रहा है।
आपदा के दौरान मनोहर बाग, सिंहधार, गांधीनगर, सुनील, रविग्राम और नृसिंह मंदिर वार्ड के कुछ हिस्से गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। कई परिवारों को सुरक्षित स्थानों और राहत शिविरों में स्थानांतरित किया गया। जिन प्रभावितों ने मुआवजा स्वीकार किया, उन्हें भुगतान किया गया, लेकिन आरोप है कि कुछ होटल व्यवसायियों और पारंपरिक पहाड़ी शैली के पुश्तैनी घरों के मालिकों को अब तक मुआवजा नहीं मिल पाया है।
स्थानीय स्तर पर यह भी प्रश्न उठ रहे हैं कि जिन वार्डों में सर्वाधिक नुकसान हुआ, वहां प्राथमिकता से कार्य शुरू न कर सड़कों के किनारे सुरक्षात्मक निर्माण किए जा रहे हैं। इससे लोगों के बीच आशंकाएं और असंतोष देखने को मिल रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि जिन स्थानों पर वर्तमान में कार्य हो रहा है, वे पूर्व में चिन्हित उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल नहीं थे।
ऐसे में यह मांग जोर पकड़ रही है कि स्वीकृत डीपीआर को सार्वजनिक किया जाए, ताकि प्रभावित लोग यह समझ सकें कि चल रहे कार्य किस योजना के तहत हो रहे हैं और उनसे उनके क्षेत्रों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित होगी। साथ ही, संबंधित विभागों से अपेक्षा की जा रही है कि वे स्पष्ट रूप से यह जानकारी दें कि वर्तमान कार्यों से प्रभावित क्षेत्रों की सुरक्षा किस हद तक सुनिश्चित होगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि उपचार कार्य वैज्ञानिक रिपोर्टों और सुझावों के अनुरूप ही किए जाने चाहिए। साथ ही, कार्यस्थलों पर योजना की रूपरेखा प्रदर्शित किए जाने की भी आवश्यकता महसूस की जा रही है, ताकि आमजन को परियोजना की जानकारी मिल सके और पारदर्शिता बनी रहे।
इस संबंध में आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि प्रभावित वार्डों में जैसे ही चिन्हित स्थान खाली होंगे, वहां भी उपचार कार्य शुरू किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस विषय में जिलाधिकारी चमोली से वार्ता कर आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
फिलहाल, समय रहते इन आशंकाओं का समाधान किया जाना आवश्यक माना जा रहा है, ताकि स्थानीय लोगों का विश्वास बना रहे और भविष्य में किसी प्रकार के जनआंदोलन की स्थिति उत्पन्न न हो।
