उत्तराखंड राज्य का जन्म – 22 साल बाद भी अनेक अनसुलझे सवाल 

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– अनन्त आकाश
उत्तराखण्ड की जनता के लम्बे संघर्ष तथा अनगिनत शहादतों के बाद 9 नवम्बर 2000 को तत्कालीन केन्द्र की बाजपेयी सरकार द्वारा उत्तरान्चल के नाम से अलग राज्य की स्थापना की गई । आगे चलकर राज्य का नाम उत्तराखण्ड रखा गया ।यह दिन इसलिए भी याद किया जाना चाहिए कि जिस उम्मीद को लेकर उत्तराखण्ड की जनता ने अनवरत संघर्ष तथा आन्दोलनकारियों ने शहादतें दी थी। उम्मीद थी कि राज्य बनने के बाद उनका सही मायनों में अपना शासन होगा तथा जनता के अरमान पूरे होंगे ।किन्तु शासकदलों की नीतियों के कारण न केवल उनके अरमान अधूरे रह गये हैं ,बल्कि हमारे राज्य की स्थिति पहले के मुकाबले बद से बदतर हुई है ।अब ये घाव दिनोंदिन और अधिक गहरे होते जा रहे हैं ।

‌ अनियोजित विकास, 22 बर्ष में स्थानीय राजधानी गैंरसैण न बनना। बेरोजगारी तथा जनअसुविधाओं के परिणामस्वरूप तेजी से बढ़ते पलायन। पहाड़ी जिलों में जनसंख्या की कमी ने इन जिलों में निरन्तर विधानसभा सीटों में भारी कटौती । आबादी के बहुत बड़े हिस्से का पहाड़ की तलहटियों के अलावा देहरादून, हरिद्वार, उधमसिंहनगर तथा नैनीताल के तराई क्षेत्र में पलायन के परिणामस्वरूप आबादी के परिदृश्य में भारी परिवर्तन आया है‌। जिसके चलते पहाड़ हुऐ खाली, मैदानी जिलों में बढ़ा आबादी का दबाव ।तेजी से बढ़ती आबादी के कारण मैदानी जिलों में रहने की समस्या बढ़ी। परिणामस्वरूप मलिन बस्तियों का तेजी से बिस्तार के कारण आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा प्रदूषित माहौल में रहने के लिये बिवश है । बढ़ती आबादी के कारण भूमाफियाओं की गैरकानूनी गतिविधियों में भारी बढ़ोत्तरी,अनियंत्रित आबादी, बढ़ते अपराधों का कारण बनी । आज भ्रष्ट राजनीतिज्ञों,भूमाफियाओं तथा भ्रष्ट अफसरशाही का नापाक गठबंधन हमारे राज्य के लिये एक बहुत ही बिकराल समस्या है । काफी तायदाद में नेता,अधिकारी तथा व्यवसायी जमीनों की खरीद फरोख्त तथा सरकारी भूमि पर कब्जे से जुडे़ हुऐ हैं। पहाड़ में भी इनका नैक्सस सक्रिय है ।अंकिता जैसे जधन्य हत्याकांड भी इसी के ही  परिणाम है । आज जिससे निकल पाना अब काफी मुश्किल हो गया है । किन्तु यदि जनता तय कर ले कि इन जनविरोधी नीतियों के खिलाफ ‌लड़ना है , तो शासकों को जनहित में कार्य करने के लिऐ मजबूर ‌किया जा सकता है‌ तभी राज्य में धीरे – धीरे जनहित में‌ बदलाव लाया जा सकता है । फिलहाल हमें हिमाचल प्रदेश की तरह हि उत्तराखण्ड राज्य के लिये जन आकाक्षाओं के अनुरूप योजनाओं को बनाने की आवश्यकता है ।

आज राज्य में केन्द्र पोषित आधिकांश योजनाऐं यहाँ की जनता के हितों के अनुरूप नहीं है । राज्य योजना आयोग की राज्य विकास में भूमिका लगभग शून्य है ।भाजपानीत गठबंधन जब से केन्द्र एवं राज्य में आया तबसे राज्य सरकार की भूमिका लगभग नगण्य है । राज्य सरकार केवल केन्द्र के हाथों कि कठपुतली बनकर रह गयी है ।राज्य में जो योजनाओं का आये दिन ढोल पीटा जा रहा उनमें से अधिकांश कोरपोरटपरस्त हैं ।जिनका लाभ यहाँ की जनता को न होकर कारपोरट व उनकी चेहतों को ही हो रहा है ।अनियोजित विकास ,अनुभवहीन,असंवेदनशील लोगों द्वारा बनायी गई अधिकांश योजनाऐं ने तो हमारे राज्य को तबाह करके रख दिया है ।पिछले कुछ सालों में बड़े लोगों के हितों के लिये अकेले आलवेदर रोड़ ,सड़क चौड़ीकरण ,फ्लाईओवरों ,भीमकाय निर्माण की आढ़ में लाखों लाख पेड़ ठिकाने लगा दिये गये हैं ,तथा अनापशनाप कटिंगें करवाकर पहाड़़ घाटियों को पेड़ एवं बनस्पति विहीन कर दिया गया है ,आज स्मार्ट सिटी के नाम पर अनापशनाप धन का दुरूपप्रयोग जारी है ।निरन्तर प्राकृतिक आपदाओं में बृध्दि हो रही है जोशीमठ सहित अनेक शहर एवं गांव खतरे की जद में हैँ। देहरादून स्मार्ट सिटी लिमिटेड द्वारा देहरादून के राजनैतिक ,सामाजिक एवं संस्कृतिक आयोजन का स्थान परेड ग्राउण्ड एवं अन्य पार्क तथा अन्य बचे खुचे स्थानों जनता से छिन लिया है ।‌अनेक स्थानों को सीमेन्टेड करवाकर जलश्रोतों को ही खत्म किया जा रहा है ,भबिष्य में भूमिगत जल की कमी से पेयजल समस्या विकराल रूप ले लेगी । इसप्रकार महानगरों एवं उपनगरों तथा गांव का डेनेज सिस्ठम लगभग ध्वस्त है तथा शहर गांव‌कचड़े के ढेर में तेजिबदल रहे हैं‌पर्यावरणिय समस्या दिनोंदिन विकराल रूप लेती ‌जा रही है‌। सार्वजनिक परिवहन सेवाओं के खत्म होने से नीजि वाहनों की बाढ़ ने यातायात व्यवस्था मंहगी तथा ठप्प कर दी है । भारी पुलिस वल या फिर चालान काटने से समस्या यथावत रहेगी इसके बजाय नीजि वाहनों पर अंकुश लगाया जाऐ , तभी यातायात से लेकर प्रदुषण की समस्या मेंं कमि आऐगी । जनहित में राज्य के मुखिया ,राज्य के नेताओं एवं नौकरशाहों को अपने वाहनों एवं सुख सुविधाओं तथा अनावश्यक खर्चों में कटौती करनी चाहिए ।मुख्यमंत्री से मन्त्री या नौकरशाह जब अपने पार्टी एवं नीजि कार्यो से जाऐं ,तो उन्हें यह खर्च स्वयं वहन करना चाहिए ।

नेता एवं अफसर चन्द दिनों मालामाल कैसे हो जाते हैं ? इनकी सम्पत्तियों समुचित जांच होनी चाहिए ! यह भी सुनिश्चित हो राष्ट्रीय नेताओं/कारपोरेट/नौकरशाहों की इस राज्य में कहाँ -कहाँ सम्पत्ति है ? सबका सही मायनों में खुलासा एवं जांच होनी चाहिए ! आपको मालूम हो कि त्रिपुरा हमारे राज्य जैसा ही छोटा एवं पहाड़ी राज्य है ,जब वहाँ पर माणिक सरकार मुख्यमंत्री थे ,तो वे अपने लिऐ केवल एक ही गाड़ी का उपयोग करते थे । अपने टीनसैड के दो कमरों के मकान में रहते थे ।उनकी पत्नी घरेलू कार्य के लिए रिक्शे का उपयोग करती हुई देखी जा सकती थी ।मुख्यसचिव व अन्य आला अधिकारी भी बड़े बड़े थाम झाम के साथ नहीं जाते थे ।केरल जो सभी मायनों में देश का नम्बर एक राज्य है । वहाँ के नेताओं एवं नौकरशाहों की सादगी उदाहरणीय है ।यहाँ अधिकांश जिलों में जिलाधिकारी पद पर महिलायें तैनात है ,जो प्रशासन की संवेदनशीलता को ही दर्शाता है ।हमारे राज्य में पहले भी आज भी जिन जिलों में जिलाधिकारी महिलाऐं रही हैं ,वहाँ प्रशासनिक कार्यों से लेकर जन सम्पर्क में ज्यादा संवेदनशीलता तथा पारदर्शिता देखी गयी है ,कुल मिलाकर हमें जरूरत है ,ऐसी सरकार एवं प्रशासनिक ढ़ाचे की जो यहाँ की जनता की भावनाओं एवं आंकाक्षाओं के अनुरूप कार्य करे ।अभी तक इन 22 सालों विकास के नाम पर हर गली में कोई न कोई पूर्व मुख्यमन्त्री के अलावा कुछ नहीं मिला ?

1994 में अलग राज्य के आन्दोलन में बडी़ संख्या में आन्दोलनकारियों ने अपनी शहादतें दी ,सिर्फ इसलिए कि उनकी भावी पीढियों को वो वह सब कुछ न देखना पड़े जो सदियों से वे देखते आयें हैं । आज राजनेताओं,लालफीताशाही व माफियाओं के नापाक गठबंधन ने हमारे संसाधनों की खुली लूट खसौट कर जनता के दिवा स्वपनों को ही छिनबिन करने का कार्य किया है । आज रोजगार ,शिक्षा ,स्वास्थ्य , आदि संसाधनों की लूट पहले के मुकाबले और अधिक तेज हुई है , इस लूट में कारपोरेटजगत एवं राजनेता ,भ्रष्ट नौकरशाह सीधे तौर पर शामिल हैं ।

हमारे प्रदेश की जनता का संघर्षों एवं कुर्बानियों की परम्परा रही है ,और राष्ट्र के निर्माण में यहाँ के लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका स्वर्णाक्षरों में दर्ज है । इसी राज्य से पेशावर विद्रोह के महानायक कामरेड चन्द्र सिंह गढ़वाली ,आई एन ए की स्थापना में यहाँ के सैनिकों की महत्वपूर्ण भूमिका । टिहरी राजशाही के खात्मे में कामरेड नागेंद्र सकलानी ,मोलू भरदारी की शहादत की भूमिका ।राष्ट्र निर्माण में गोविबल्लभ पन्त ,हेमवतीनंदन बहुगुणा ,कामरेड एम एन राय ,पी सी जोशी ,,महाबीर त्यागी आदि अनेक नेताओं की भूमिका उल्लेखनीय है । मेहनतकश अवाम को संगठित कर उनको संघर्ष में उतारने में कम्युनिस्टों की उल्लेखनीय योगदान को सदैव याद किया जाऐगा । उत्तराखण्ड की महिलाओं द्वारा जल ,जंगल ,जमीन के लिये किये गये ऐतिहासिक संघर्ष अपने में एक मिशाल है । इनमें चिपको आन्दोलन की प्रेणता गौरादेवी ,बीरांगना तिल्लू रौतेली तथा शराब के खिलाफ अनवरत संघर्ष चलाने वाली टिंचरी माई का नाम उल्लेखनीय है । देश की सुरक्षा में यहाँ के जांबाजों की अनगिनत कुर्बानी हमारी समृद्धि एवं गौरवशाली परम्परा का हिस्सा है ,जिसे हमारे देश व दुनिया ने स्वीकारा है । सेना में अग्निबीर योजना ने यहाँ के नौजवानों एवं आमजन ‌को निराश किया है ।

उत्तराखण्ड अलग राज्य निर्माण के लिए बर्ष 1994 के खटीमा ,मसूरी गोलीकाण्ड जिसमें दर्जनों आन्दोलनकारियों ने शहादतें दी तथा 2अक्टूबर 094 मुजफ्फरनगर गोलीबारी में शहीद हुऐ आन्दोलनकारियों की शहादत को राज्य की जनता बडे़ सम्मान से याद करती आयी है । इस दिन को लोकतंत्र के इतिहास में काले दिवस के नाम से भी याद किया जाता रहेगा । अवसर पर उन शहीदों को नमन करते हैं ,जिन्होंने अपने राज्य की जनता के स्वर्णिम भबिष्य की खातिर अपना बलिदान दिया ।आज राज्य में कुछ ‌असमाजिक तत्व मुख्य मुख्य मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिऐ साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में‌ं लगे हुऐ हैं , फिर से उत्तराखण्ड की जनता भाजपा सरकार की वादा खिलाफि के खिलाफ सड़कों पर है तथा ‌अपने भविष्य के लिए छूटे हुऐ आन्दोलनकारियों के चिन्हनिकरण तथा क्षैतिज आरक्षण कि मांग को लेकर सड़कों पर हैं।
हमारी स्पष्ट राय है कि आन्दोलनकारियों को क्षैतिज आरक्षण के साथ ही छूटे हुए सभी ‌आन्दोलकारियों का चिन्हित किया जना तथा चिन्हिकरण का आधार शुरुवात दिनों में जो मापदण्ड अपनाऐ गऐ है, वही हों, अन्यथा भबिष्य में समस्या और भी अधिक विकराल हो सकती है।

(नोट : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैँ जिनसे एडमिन का सहमत होना जरूरी नहीं है। लेखक माकपा उत्तराखंड के वरिष्ठ नेता हैँ।)

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