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जुलाई से सितंबर के बीच तेजी से विकसित होगा अल नीनो, भारत में कमजोर मानसून, सूखा और हीटवेव का बढ़ा खतरा

 

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की चेतावनी, खरीफ फसलों की बुवाई पर पहले से दिख रहा असर

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि जुलाई से सितंबर 2026 के बीच अल नीनो (El Niño) की स्थिति तेजी से मजबूत होगी। इसका सीधा प्रभाव भारत सहित दुनिया के अनेक देशों पर पड़ सकता है। संगठन के अनुसार इस दौरान कमजोर मानसून, भीषण गर्मी, सूखे तथा चरम मौसमी घटनाओं की आशंका बढ़ जाएगी। भारत में जून माह में सामान्य से लगभग 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की जा चुकी है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
अल नीनो क्या है?
अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय भाग में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाने की प्राकृतिक जलवायु घटना है। यह सामान्यतः हर दो से सात वर्ष में घटित होती है और इसका प्रभाव 9 से 12 महीने तक रह सकता है। अल नीनो के दौरान प्रशांत महासागर की व्यापारिक पवनें कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे वैश्विक वर्षा चक्र प्रभावित होता है।
भारत में अल नीनो का सबसे बड़ा प्रभाव दक्षिण-पश्चिम मानसून पर पड़ता है। प्रायः इसके कारण मानसून कमजोर होता है, वर्षा का वितरण असंतुलित हो जाता है और कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। हालांकि प्रत्येक अल नीनो वर्ष में समान प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole-IOD), मैडेन-जूलियन ऑस्सीलेशन (MJO) और स्थानीय मौसमी परिस्थितियां भी मानसून को प्रभावित करती हैं।
डब्ल्यूएमओ की चेतावनी
डब्ल्यूएमओ की महासचिव सेलेस्टे साउलो के अनुसार अल नीनो पहले ही विकसित हो चुका है और आने वाले महीनों में इसके तेजी से मजबूत होने की संभावना है। इससे विश्व के अनेक क्षेत्रों में सूखा, अत्यधिक वर्षा, समुद्री और स्थलीय हीटवेव जैसी चरम मौसम घटनाएं बढ़ सकती हैं।
भारत में खरीफ खेती पर असर
जून में कमजोर मानसून के कारण किसानों की बुवाई प्रभावित हुई है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 25 जून तक केवल 182 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हो सकी, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 236 लाख हेक्टेयर था। यानी लगभग 23 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
सभी प्रमुख खरीफ फसलें प्रभावित हुई हैं—
तिलहन : 53% कमी
कपास : 35% कमी
दलहन : 30% कमी
धान : 25% कमी
मोटे अनाज (श्रीअन्न एवं मक्का) : 12% कमी
यदि जुलाई में अच्छी वर्षा नहीं हुई तो खाद्यान्न उत्पादन और किसानों की आय दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
सरकार सतर्क
कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संबंधित मंत्रालयों की उच्चस्तरीय बैठक में स्थिति की समीक्षा की। उन्होंने कृषि, जल शक्ति और ऊर्जा मंत्रालयों को राज्य सरकारों के साथ समन्वय कर किसानों को कम पानी वाली फसलें—जैसे श्रीअन्न (मिलेट्स), दलहन और चारा फसलें—उगाने की सलाह देने को कहा है। साथ ही देश के सभी प्रमुख जलाशयों की नियमित निगरानी के निर्देश दिए गए हैं।
क्या हर अल नीनो वर्ष में सूखा पड़ता है?
नहीं। भारत के मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच मजबूत संबंध जरूर है, लेकिन यह संबंध पूर्णतः निश्चित नहीं है। उदाहरण के लिए 1997-98 में बहुत शक्तिशाली अल नीनो होने के बावजूद हिंद महासागर द्विध्रुव की अनुकूल स्थिति के कारण भारत में मानसून सामान्य रहा। वहीं 2002, 2009 और 2015 जैसे अल नीनो वर्षों में देश ने गंभीर वर्षा कमी और सूखे जैसी परिस्थितियों का सामना किया।
जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है जोखिम
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो और ला नीना जैसी प्राकृतिक घटनाओं का प्रभाव और अधिक तीव्र हो सकता है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण हीटवेव अधिक लंबी और प्रचंड हो रही हैं, जबकि वर्षा कम दिनों में अत्यधिक मात्रा में होने लगी है। इससे एक ओर सूखा और दूसरी ओर अचानक बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो रही हैं।
उत्तराखंड पर संभावित प्रभाव
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में अल नीनो का असर केवल वर्षा की कमी तक सीमित नहीं रहता। मानसून कमजोर होने पर वनाग्नि का खतरा बढ़ सकता है, प्राकृतिक जलस्रोतों का जलस्तर घट सकता है और वर्षा का वितरण असमान होने से कहीं बादल फटने तथा कहीं लंबे शुष्क दौर की स्थिति बन सकती है। इससे कृषि, पेयजल, जलविद्युत उत्पादन और पर्यटन सभी प्रभावित हो सकते हैं।

डब्ल्यूएमओ की ताजा चेतावनी केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए गंभीर संकेत है। यदि जुलाई से सितंबर के बीच अल नीनो तेजी से मजबूत होता है, तो कृषि, जल संसाधन, खाद्य सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर सरकारों को पहले से अधिक सतर्क रहना होगा। किसानों के लिए समय पर मौसम आधारित सलाह, जल संरक्षण, कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा और जलाशयों का वैज्ञानिक प्रबंधन इस चुनौती से निपटने के प्रमुख उपाय होंगे।

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