उत्तराखंड की पहली इतिहासकार शाकम्बरी जुयाल

-डा0 योगेश धस्माना –
गढ़वाल के प्रतिष्ठित और जागृत परिवार में 1922 को जन्मी शाकम्बरी जुयाल 86 वर्ष तक जीवित रही।उत्तराखंड की इस पहली इतिहासकार के शिष्यों में डॉ मदन चंद्र भट्ट, प्रो शेखर पाठक और सुनील कुमार प्रमुख रहे थे।शेखर पाठक तो इन्हें आज भी गुरुमाता के नाम से ही याद करते है।अल्मोड़ा में डीएम रहे चंद्रधर जुयाल की कन्या शाकम्बरी की शिक्षा दीक्षा पिता के साथ ही अल्मोड़ा देहरादून और बनारस में हुई थी।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से प्रो रमाशंकर त्रिपाठी के निर्देशन में महा काव्यों में नारी की स्थिति पर पीएचडी की थी।इसके बाद उन्होंने विश्व विद्यालय अनुदान आयोग के एक प्रोजेक्ट से आर्थिक सहायता लेकर व्हेनसांग रुत इन गढ़वाल कुमाऊं पर शोध करते हुए सातवीं सदी के उत्तराखंड के ऐतिहासिक स्थलों का सर्वेक्षण कर देश के इतिहासकारों और शोधार्थियों को नई दिशा प्रदान की थी।
सम्राट अशोक के कालसी शिलालेख के बारे में उन्होंने लब्ध इतिहासकारों,भंडारकर,डॉ राधा कुमुद मुखर्जी और डॉ रोमिला थापर के मूल्यांकन को नकारते हुए नए वैज्ञानिक तथ्यों से परिचित कराया था। शाकम्बरी नैनीताल पीजी कॉलेज के इतिहास विभाग की विभागाध्यक रहने के बाद रानीखेत पीजे कॉलेज से प्राचार्य पद से रिटायर हुई थी।
शाकम्बरी के दादा गजाधर के तीसरे पुत्र चंद्रधर के दो पुत्र बिंदुधर गढ़वाल के आई ए स थे।छोटे पुत्र नलनीधर वायु सेना में फाइटर पायलट के बाद विशेष कमीशन लेकर आई एस बनकर नेफा के प्रथम अधिकारी बने थे। इसके बाद उन्हें हिमाचल की लाहौल स्पीति घाटी में ग्रामीण विकास की जिम्मेदारी दी गई।इन्हें हिमाचल में बागवानी विकास का जनक भी कहा जाता है।
1974में नालनीधार की सिफारिश पर इसे जनजातीय क्षेत्र घोषित किया गया था।1974में इंदिरा गांधी इन्हें दिल्ली के आई।यहां इन्हें पहली बार गठित पर्यावरण विकास मंत्रालय का सचिव बनाया गया।इस तरह एक गौरवशाली परम्परा में शाकम्बरी की अध्ययन यात्रा चलती रही।
अपने शिष्य डॉ मदन चंद्र और सुनील कुमार सहित अनेक विद्यार्थियों के सहयोग से 1972में नैनीताल में पर्वतीय इतिहास परिषद का गठन कर प्रदर्शनियों के आयोजन से उत्तराखंड के प्राग ऐतिहासिक शिलाचित्र शुंग कालीन बौद्ध स्तूप, आदि कार्यों को विश्व व्यापी मान्यता मिल सकी,और इससे वैज्ञानिक ढंग से शोध सर्वेक्षण का मार्ग भी शोधार्थियों के लिए प्रशस्त हुआ था।1974के बाद कुमाऊं विश्वविद्यालय बनने के बाद कादंबरी जुयाल राजकीय सेवा में चली गई थे।
राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय रानीखेत से उन्होंने अवकाश ग्रहण किया।इससे पहले उन्होंने 51 वर्ष की आयु में डीएसबी कॉलेज नैनीताल में हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ गौतम द्विवेदी से विवाह किया,जो, मूल रूप से गुजराती थे। उनकी कोई संतान नहीं थी।
अब दोनों ही इस दुनिया में नहीं है।शाकम्बरी जुयाल पति के निधन के बाद अपनी बड़ी बहिन सुशीला काला पुत्री गोविंद राम काला के पुत्र सुधीर काला के पास जयपुर में रह रही थी।यही पर 6जुलाई 2008 को हृदयगति रुकने से उनका निधन हुआ था। आश्चर्य की बात यह है, कि,उनके निधन की सूचना उनके शिष्य रहे पद्मश्री शेखर पाठक के अतिरिक्त किसी भी अन्य शिक्षाविदों को नहीं थी।
सब से आश्चर्य की बात यह है,कि उनके कार्यों को उत्तराखंड का कोई भी विश्वविद्यालय नहीं जानता और ना हमारी सरकार ,केवल उनके शिष्य डॉ मदन चंद्र भट्ट ने उत्तराखंड के इतिहास पर प्रकाशित पुस्तक का एक माह पूर्व दून लाइब्रेरी में विमोचन किया,तब उन्होंने अपनी गुरुमाता शाकम्बरी जुयाल की स्मृति में कार्यक्रम को समर्पित कर उनके योगदान को याद किया। इस महान शिक्षाविद को हम सुधी जनों का हार्दिक नमन I
