जयंती पर विशेष :भगत सिंह – शहादत से आगे विचारों की अमर विरासत

-अनन्त आकाश-
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन के महानायक शहीद-ए-आजम भगत सिंह की 28 सितंबर को 119वीं जयंती है। महज 23 वर्ष की उम्र में देश के लिए फांसी के फंदे को चूमने वाले भगत सिंह केवल एक साहसी क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि गंभीर अध्येता, लेखक और ऐसे राजनीतिक चिंतक भी थे, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के स्वरूप को लेकर अपने स्पष्ट विचार सामने रखे। यही कारण है कि उनकी शहादत के करीब एक शताब्दी बाद भी वे देश की युवा पीढ़ी के नायक बने हुए हैं।
भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में सरदार किशन सिंह और विद्यावती के घर हुआ था। उनका परिवार पहले से ही स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा था। परिवार और आसपास के राजनीतिक वातावरण का उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ा। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने लाहौर के नेशनल कॉलेज में अध्ययन किया। यह वही दौर था जब पंजाब सहित पूरे देश में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष तेजी से बढ़ रहा था।
13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में हुई गोलीबारी ने देश को झकझोर दिया। उस समय भगत सिंह की उम्र करीब 11 वर्ष थी। इस घटना का उनके बालमन पर गहरा प्रभाव पड़ा। जलियांवाला बाग केवल एक हत्याकांड नहीं था, बल्कि उस पीढ़ी के अनेक युवाओं के लिए ब्रिटिश शासन की दमनकारी प्रकृति को समझने का निर्णायक प्रसंग बन गया।
इसी दौर में महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता के रूप में उभर चुके थे। सितंबर 1920 में कांग्रेस के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव को व्यापक समर्थन मिला और दिसंबर में नागपुर अधिवेशन में इसे कांग्रेस के कार्यक्रम के रूप में स्वीकार किया गया। सरकारी शिक्षण संस्थानों, विदेशी वस्तुओं और ब्रिटिश शासन से जुड़े संस्थानों के बहिष्कार के आह्वान ने लाखों भारतीयों को आंदोलन से जोड़ा। भगत सिंह भी इससे प्रभावित हुए और छात्र जीवन में असहयोग आंदोलन से जुड़े।
फरवरी 1922 की चौरी-चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। इस निर्णय से स्वतंत्रता आंदोलन के भीतर रणनीति को लेकर नई बहस पैदा हुई। युवाओं के एक हिस्से ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी रास्ते की ओर रुख किया।
इसी पृष्ठभूमि में क्रांतिकारी संगठन अधिक सक्रिय हुए। 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन अस्तित्व में आया। 9 अगस्त 1925 की काकोरी कार्रवाई भी इसी क्रांतिकारी धारा का हिस्सा थी। शुरुआती दौर में क्रांतिकारियों का जोर ब्रिटिश शासन को चुनौती देने और संगठन की गतिविधियों के लिए संसाधन जुटाने पर था, लेकिन धीरे-धीरे आंदोलन ने अधिक स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक स्वरूप ग्रहण किया।
भगत सिंह इस परिवर्तन के प्रमुख सूत्रधारों में थे। उन्होंने भगवती चरण वोहरा और सुखदेव सहित अपने साथियों के साथ 1926 में नौजवान भारत सभा की स्थापना की। इसका उद्देश्य युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने के साथ उनमें राजनीतिक और सामाजिक चेतना पैदा करना था। सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में क्रांतिकारियों की बैठक के बाद हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को समाजवादी विचारों के अनुरूप नया स्वरूप मिला और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन क्रांतिकारी आंदोलन का प्रमुख संगठन बन गया।
भगत सिंह और उनके साथियों की दृष्टि में आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजी शासन का अंत नहीं था। वे ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सामाजिक और आर्थिक शोषण से भी मुक्ति मिले। रूसी क्रांति और समाजवादी विचारों का उन पर प्रभाव था। वे लगातार अध्ययन करते थे और जेल में भी उनका पढ़ना-लिखना जारी रहा। उनके लेखों और पत्रों से स्पष्ट होता है कि समय के साथ उनका चिंतन अधिक परिपक्व और व्यापक होता गया।
1928 में साइमन कमीशन के भारत आगमन का देशभर में विरोध हुआ। लाहौर में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे लाला लाजपत राय पुलिस लाठीचार्ज में गंभीर रूप से घायल हुए और 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। एचएसआरए के क्रांतिकारियों ने इसका बदला लेने का फैसला किया। उनका निशाना पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट था, जिसे वे लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार मानते थे, लेकिन पहचान की गलती के कारण 17 दिसंबर 1928 को सहायक पुलिस अधीक्षक जे.पी. सांडर्स मारा गया। इस कार्रवाई में भगत सिंह, राजगुरु और चंद्रशेखर आजाद सहित अन्य क्रांतिकारी शामिल थे।
इसके बाद 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली स्थित केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके। इस कार्रवाई का उद्देश्य बड़े पैमाने पर जनहानि करना नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध राजनीतिक संदेश देना था। दोनों वहां से भागे नहीं, बल्कि गिरफ्तारी दी ताकि अदालत को अपने विचार देश तक पहुंचाने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया जा सके।
इसके बाद भगत सिंह और उनके साथियों के जीवन का एक नया अध्याय जेल और अदालत में शुरू हुआ। राजनीतिक बंदियों के साथ भेदभाव, भोजन और अन्य सुविधाओं में असमानता तथा कैदियों के अधिकारों को लेकर उन्होंने लंबी भूख हड़ताल की। यह संघर्ष भी उनके क्रांतिकारी जीवन का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा था जितना कि अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उनकी प्रत्यक्ष कार्रवाइयां। अदालत में भी वे अपने मुकदमे को व्यक्तिगत बचाव तक सीमित रखने के बजाय अपने राजनीतिक विचारों को जनता तक पहुंचाने के माध्यम के रूप में देखते रहे।
भगत सिंह के चिंतन की एक महत्वपूर्ण विशेषता सांप्रदायिकता का उनका विरोध था। वे धर्म, जाति और समुदाय के आधार पर समाज को बांटने वाली राजनीति को स्वतंत्रता और सामाजिक परिवर्तन की राह में बाधा मानते थे। उनके लिए आजादी का संघर्ष केवल सत्ता हस्तांतरण का प्रश्न नहीं था, बल्कि उस भारत के निर्माण का प्रश्न भी था जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की गुंजाइश न हो।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। भगत सिंह तब केवल 23 वर्ष के थे। इतनी कम आयु में भी उनके अध्ययन, लेखन, राजनीतिक चेतना और वैचारिक विकास ने उन्हें अपने समकालीन अनेक क्रांतिकारियों से अलग पहचान दी। उनकी शहादत ने पूरे देश, विशेषकर युवाओं को गहराई से प्रभावित किया।
भगत सिंह की विरासत को केवल उनकी वीरता या फांसी के फंदे तक सीमित कर देना उनके व्यक्तित्व को अधूरा समझना होगा। उनकी वास्तविक विरासत उनके विचारों, प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति, अन्याय के प्रतिरोध, सामाजिक समानता की आकांक्षा और सांप्रदायिक विभाजन के विरोध में भी निहित है। वे ऐसी स्वतंत्रता की कल्पना करते थे जिसमें राजनीतिक गुलामी के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक अन्याय का भी अंत हो।
आज उनकी 119वीं जयंती पर उन्हें याद करने का अर्थ केवल पुष्पांजलि अर्पित करना नहीं, बल्कि उस साझी विरासत को समझना भी है जिसके लिए स्वतंत्रता आंदोलन की अनेक धाराओं और अनगिनत लोगों ने संघर्ष और बलिदान किया। समाज में भाईचारा, सांप्रदायिक सौहार्द, समानता और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने की परंपरा को मजबूत करना ही शहीद-ए-आजम भगत सिंह की स्मृति के प्रति सार्थक सम्मान होगा।
भगत सिंह हमारे इतिहास के केवल एक अमर शहीद नहीं हैं। वे उस युवा चेतना के प्रतीक हैं जो अन्याय को नियति मानने से इनकार करती है, सत्ता से सवाल करती है और बेहतर समाज की कल्पना करने का साहस रखती है। इसीलिए भगत सिंह तब भी युवाओं के नायक थे और आज भी हैं।
