तब भाईचारे का संकल्प लेकर अलग हुयी थी भारत-पाक की सेनाऐं…. लेकिन !


–जयसिंह रावत
भारत के विभाजन के साथ ही 14 अगस्त 1947 को भारत की सेना के विभाजन और दो नये राष्ट्रों की अलग-अलग सेनाओं के अस्तित्व में आने के अवसर पर दोनों सेनाओं के प्रमुखों ने जब एक दूसरे को भावपूर्ण शुभ कामना संदेश भेजे थे तो उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक ही अतीत और एक साथ जीने मरने वाली सेनाएं कभी एक दूसरी की इतनी खतरनाक दुश्मन बन जायेंगी कि उनके बीच प्रत्यक्ष और परोक्ष युद्धों की श्रृंखला ही शुरू हो जायेगी और भारत की सेना का खौफ दिखा कर पाकिस्तान में सेना का स्थाई प्रत्यक्ष और परोक्ष शासन कायम हो जायेगा। उस समय लगभग 260,000 सैनिक , मुख्य रूप से हिंदू और सिख, भारत गए। और 140,000 सैनिक , मुख्यतः मुस्लिम, पाकिस्तान चले गये। नेपाल में भर्ती गोरखाओं की ब्रिगेड भारत और ब्रिटेन के बीच विभाजित हो गई।

भारत के सेनाध्यक्ष की पाक सेना को शुभकामनाएं
दरअसल 14 और 15 अगस्त 1947 को भारत तथा पाकिस्तान, दो स्वतंत्र राष्ट्रों के अस्तित्व में आने से पहले ही जुलाई में दोनों नवोदित राष्ट्रों के लिये सेनाऐं खड़ी कर उनके प्रमुखों की घोषणा भी कर दी गयी थी। 14 अगस्त को पाकिस्तान राष्ट्र के उदय के समय दोनों सेनाओं के प्रमुखों ने एक दूसरे के लिये जो शुभकामना संदेश दिये थे वे वास्तव में बहुत भावनात्मक थे और उम्मीद की गयी थी कि दोनों के बीच इसी तरह का भाईचारा बना रहेगा। उस दिन अपने सदेश में भारत की सेना के कमाण्डर इन चीफ जनरल लौकहर्ट ने कहा था कि ‘‘ पाकिस्तान आर्मी के जन्म के अवसर पर मैं और भारत की सेना के सभी रैंकों के सैनिक पाकिस्तान के सभी रैंकों के सैनिकों को तहेदिल से शुभकामनायें देते हैं। हम आपके साथ साझा परम्पराओं और सम्बंधों को संजो कर रखेंगे और एक ही सेना के सदस्य के तौर पर हमारे बीच रहे मधुर संबंधों को आगे भी कायम रखेंगे।’
पाक जनरल का संदेश और भी भवपूर्ण था
भारतीय कमांडर इन चीफ की शुभ कामनाओं के जवाब में पाकिस्तान से कमाण्डर इन चीफ जनरल मेसर्वी का संदेश और भी अधिक भावुक था। जिसमें उन्होंने कहा था कि, ‘‘ आज जबकि अधिकारिक रूप से भारत की सेना, भारत और पाकिस्तान सेनाओं में विभाजित हो रही है तो मैं पाकिस्तान की सेना के सभी रैंकों की ओर से आपको बधाई और शुभ कामनाएं प्रषित करता हॅंू। दोनों सेनाओं की यूनिटों और उनके सैनिकों ने यूरोप, अफ्रीका और ऐशिया में कई युद्धस्थलों में मिल कर यु़द्ध लड़े और जीते। एक बड़े उद्ेश्य के लिये शहीद हुये। हमें तहेदिल से उम्मीद है और हम प्रर्थना करते हैं कि भारत और पाकिस्तान की सेनाऐं वैसी ही सद्भावना और मैत्रीपूर्ण सहयोग आगे भी जारी रखेंगे। हम में से जो लोग अपनी पुरानी रेजिमेंटों और कोरों से अलग हुये हैं, अपने पुराने साथियों को पुरानी मधुर यादों के साथ मित्रता का विशेष संदेश भेजते हैं।’’
समय के चक्र के साथ धूमती राजनीति ने ऐसा मोड़ लिये कि अगले ही साल 1948 में कबाइलियों के साथ या उनके वेश में पाकिस्तान की सेना ने कश्मीर पर हमला कर दिया। इसके बाद 1965 में दोनों सेनाओं में बड़ी जंग छिड़ी और 1971 में एसे जंग छिड़ी कि पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गये। इसके बाद भी पाक सैन्य नेतृत्व को चैन नहीं आया और कारगिल युद्ध की नौबत आ गयी।

जुलाइ में खड़ी हो गयी थीं भारत- पाक की सेनाएं
नये स्वाधीन राष्ट्रों के जन्म के साथ ही उनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुये फौरी तौर पर सेनाओं की अहं भूमिका को देखते हुये सेनाओं का बंटवारा किया गया और दोनों सेनाएं 14 और 15 अगस्त 1947 से पहले तैनात हो गयीं। विभाजन के समय पहले सेना का बंटवारा किया गया और बाद में दोनों स्वतंत्र राष्ट्रों की तीनों सेनाओं के मुखिया वायसरॉय की ओर से अंतरिम सरकारों/ वायसरॉय की परिषदों द्वारा नियुक्त किये गये जो कि अंग्रेज ही थे। वायसरॉय हाउस नयी दिल्ली की 30 जुलाइ 1947 को जारी अधिसूचना के अनुसार वायसरॉय की अध्यक्षता में गठित दोनों भावी स्वतंत्र राष्ट्रों की अंतरिम सरकारों ने दोनों देशों की पुनर्गठित सेनाओं के लिये जो शीर्ष कमाण्डर या प्रमुख चुने उनमें भारत के लिये कैप्टन जे.टी.एस. हॉल को रियर एडमिरल के रैंक में भारतीय नोसेना का नेतृत्व दिया गया। इसी प्रकार कमोडोर जे.डब्लु. जेफर्ड को पाकिस्तानी नोसेना का प्रमुख नियुक्त किया गया। थल सेनाओं के तात्कालित नेतृत्व के लिये ले.जनरल सर रॉब लॉकहर्ट का भरतीय थल सेना का और ले. जनरल सर फ्रेंक मेसर्वी को पाकिस्तानी थल सेना का नेतृत्व सौंपा गया। इसी तरह एयर मार्शल सर थॉमस इल्महर्ट को एयर मार्शल के रैंक में भारत की वायुसेना का और एयर वाइस मार्शल ए. एल.ए. पेरी कीने को पाकिस्तान की वायु सेना का प्रमुख नियुक्त किया गया।
ऐसे मुसलमान अफसर थे जिन्होंने जन्मभूमि चुनी
विभाजन के समय सेना का बंटवारा जुलाइ के महीने पार्टिशन काउंसिल द्वारा दो चरणों में किया गया था। पहला चरण धर्म के आधार पर मोटे तौर पर तय हुआ था। जिसका मतलब था कि मुसलमान सैनिक पाकिस्तान के हिस्से में और हिन्दू तथा सिख भारत के हिस्से में जायेंगे। लेकिन दूसरा चरण सैनिकों द्वारा स्वेच्छा से भारत या पाकिस्तान का चयन करने के विकल्प का था। सशस्त्र सेना उपसमिति की सिफारिश के अनुसार थल एवं नोसेना का बंटवारा या दोनों भावी देशों के लिये 11 जुलाइ 1947 को तय हुआ। ऐसा माना जाता है कि विभाजन के समय भारतीय सेना में 30-36 प्रतिशत मुसलमान थे। विभाजन के बाद भारत की सेना में केवल 2 प्रतिशत मुसलमान रह गये थे जिन्होंने मजहब के बजाय मातृभूमि को चुना। इनमें दो मुसलमान लेफ्टिनेंट जनरल के पद तक पहुंचे और छह मेजर जनरल बने। सेना का बंटवारा तय करने वाली सशस्त्र सेना पुनर्गठन समिति को अनुमान था कि मुसलमान सैनिक मजहब के नाम पर पाकिस्तान को ही चुनेंगे। लेकिन समिति की उम्मीदों के विपरीत कम से कम 215 मुस्लिम कमीशन अधिकारियों और 339 वीसीओ (वायसराय के कमीशन अधिकारी, जिन्हें बाद में जूनियर कमीशन अधिकारी कहा जाता है) ने भारत को चुना। रक्षा मंत्रालय के अनुसार के रिकार्ड के अनुसार भारत में रहने का निर्णय लेने वालों में ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान और मुहम्मद अनीस अहमद खान और लेफ्टिनेंट कर्नल इनायत हबीबुल्लाह जैसे बेहतरीन अधिकारी उल्लेखनीय थे।
भारत -पाक में जहाजों का बंटवारा
संशस्त्र सेना मुख्यालय दिल्ली के सूचना एवं मनोबल निदेशालय की 11 जुलाइ 1947 की विज्ञप्ति के अनुसार नोसेना के बंटवारे में भारत को मिले जहाजों में सतलज, जमुना, कृष्णा और काबेरी मिले। इनके साथ ही भारत को तीर और खुखरी नाम के दो युद्ध पोत भी मिले। इसी तरह भारत के हिस्से में उड़ीसा, डेकन, बिहार, कुमाऊं, खैबर, रोहिलखण्ड, कर्नाटिक, राजपूताना, कांेकण, बॉम्बे, बंगाल और मद्रास नाम के माइन स्वीपर या विस्फोट हटाने वाले पोत मिले। बंटवारे में भारत को असम नाम का विमान वाहक और इन्वेस्टिगेटर नाम का सर्वे पोत भी मिला। इनके अलावा भारत के हिस्से में नासिक, कलकत्ता, कोचिन और अमृतसर नाम के जाल पोत के साथ 4 मोटर माइन स्वीपर भी आयेे। इस अंतिम बंटवारे में भारत के हिस्से में 4 बंदरगाह रक्षक मोटर लांचर भी थे।
नौसेना के बंटवारे में पाकिस्तान को नर्मदा और गोदावरी नाम के 2 पोतों के साथ ही शमशेर और धनुष नाम के दो युद्धपोत तथा कठियावाड़, ब्लूचिस्तान, मालवा और अवध नाम के माइन स्वीपर मिले। इनके साथ ही पाकिस्तान के हिस्से में रामपुर और बड़ोदा नाम के दो समुद्री जाल पोत और दो मोटर माइन स्वीपर मिले। भारत के जितने ही पाकिस्तान को भी चार बंदरगाह रक्षक मोटर लांचेज मिले।
सेनिकों की अदला बदली के लिये विशेष रेल गाड़ियां
थल सेना के बंटवारे में भारत को 15 इन्फेंट्री रेजिमेंट, 12 आर्मर्ड कोर यूनिट, साढ़े 18 आर्टिलरी रेजिमेंट्स और 61 इंजिनीयरिंग यूनिटें मिलीं। जबकि पाकिस्तान के हिस्से में 8 इन्फेंट्री रेजिमेंट, 6 आर्मर्ड कोर यूनिट, साढ़े 8 आर्टिलरी रेजिमेंट और 34 इंजिनियर यूनिटें गयीं। सशस्त्र सेना मुख्यालय दिल्ली के इन्फार्मेशन एण्ड मोराल डाइक्टरेट की 28 जुलाइ 1947 की विज्ञप्ति के अनुसार वर्ग संरचना के आधार पर समायोजन के बाद थल सेना की इन्फेंट्री, बख्तरबंद कोर, तोपखाने और इंजीनियर की बंटी हुयी टुकड़ियों को अपने-अपने नये देशों में भेजने के लिये 150 से अधिक ट्रेनों की व्यवस्था की गयी थी। और पहला चरण पूरा होने तक स्थैतिक यूनिटों को अपने स्थान पर बने रहने के लिये कहा गया था।
भावुक सैनिकों ने पुराने साथी नहीं छोड़े
इस चरण के साथ ही, दोनों भावी स्वतंत्र राष्ट्रों को आवंटित बटालियनें, जहां भी संभव हो, विभिन्न समुदायों की कंपनियों या स्क्वाड्रनों की अदला-बदली की गयी। उदाहरण के लिए, भारत को आवंटित बटालियनों में मौजूद पंजाबी मुसलमानों को पाकिस्तान की बटालियनों में स्थानांतरित कर दिया गया, और पाकिस्तान को आवंटित बटालियनों में सेवारत सिखों और डोगराओं को भारतीय संघ से संबंधित बटालियनों में स्थानांतरित किया गया। लेकिन हिन्दुस्तानी मुसलमान सैनिकों की उनकी स्वेच्छा जाने बिना उनकी अदला बदली नहीं की गयी। इसके लिये बटालियन स्तर पर कंपनियों को इकाई मान कर स्थानांतरण किया गया। क्योंकि अनेक सैनिक मजहब से ऊपर उठ कर भावनात्मक रूप से एक दूसरे के साथ जुड़े थे और अपने साथियों, सरदारों (जेसीओज) और अफसरों के साथ ही रहना चाहते थे। भारतीय अधिकारियों को उनके विकल्प का उपयोग करने के बाद उपयुक्त रेजिमेंटों में तैनात किया गया और जहां संभव हुआ वे अपने स्वयं के नये राष्ट्रों में जाने वाले अपने लोगों के साथ गये
देहरादून आइएमएम से पाकिस्तान गये 67 नये अफसर
3 जून 1947 से पहले कमीशन के लिए चुने गए युवाओं और भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून और अधिकारी प्रशिक्षण स्कूल मऊ में प्रशिक्षण ले रहे कैडेटों को छोड़कर, उस समय किसी को भी कमीशन न देने का निर्ण लिया गया। चयन बोर्डों द्वारा बनाई गई या पूर्व-चयन अधिकारी प्रशिक्षण स्कूल द्वारा सम्मानित अधिकारियों की ग्रेडिंग के रिकॉर्ड और जिन्हें अभी तक कमीशन नहीं दिया गया है, उन्हें उन भावी राष्ट्रों की संबंधित सरकारों को भेजा गया, जिन्हें आवेदक सेवा देना चहते थे। नये राष्ट्र पाकिस्तान ने वर्ष 1947 में ही अपनी नयी सैन्य प्रशिक्षण अकादमी (पीएमए) एबटाबाद में स्थापित की। भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून की 12 सितम्बर 1948 की पासिंग आउट परेड में 185 जैंटलमैन कैडेट्स पास आउट हुये जिनमें से 67 ने पाकिस्तान की आर्मी का चयन किया।
