भारत -नेपाल का साझा ऐतिहासिक जौलजीवी मेला शुरू 

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पिथौरागढ़/देहरादून 14 नवम्बर (उ हि ) ।
उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रविवार को काली एवं गोरी नदी के संगम पर स्थित जौलजीवी में  भारत एवं नेपाल दोनों देशों के साझा ऐतिहासिक, पारंम्परिक एवं व्यापारिक जौलजीवी मेले का शुभारंभ किया। इस मेले में नेपाल के लोग भी आ कर अपने स्टाल लगाते हैं. मुख्यमंत्री ने कहा कि जौलजीवी मेला भारत नेपाल के मैत्री संबंधों को भी बढ़ाता है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड सरकार द्वारा विगत 4 महीनों में  प्रदेश के हित में 400 से अधिक फैसले लिए हैं। इन सभी फैसलों का शासनादेश भी जारी हो चुके हैं। जो भी घोषणाएं की गई हैं उन्हें धरातल पर उतारा जा रहा है।  उन्होंने कहा कि अतिथि शिक्षकों का मानदेय 15 हजार से 25 हजार रुपए प्रतिमाह किया है। आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का मानदेय भी बढ़ाया गया है। जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए कार्य किए जा रहे हैं। प्रदेश में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत किये जाने हेतु महिला समूहों को आर्थिक रूप से सहयोग प्रदान हेतु 3 से 5 लाख तक का ऋण शून्य प्रतिशत ब्याज पर दिया जा रहा है। इसके परिणाम स्वरूप आज ये महिला समूह अन्य को भी रोजगार प्रदान कर रहे हैं।

 

अस्कोट रियासत के राजा उत्सव पाल ने 1758 में इस मेले की शुरुआत की थी। पिछली एक शताब्दी से जौलजीबी मेले को अन्तरराष्ट्रीय व्यापारिक मेले के रूप में ख्याति मिली हुई है। साल 1871 में अस्कोट के राजा पुष्कर पाल ने काली-गोरी के संगम पर ज्वालेश्वर महादेव की नींव रखी. माना जाता है कि यहीं से इस मेले ने व्यापारिक मेले का स्वरूप लिया. मेले के वर्तमान स्वरूप के श्रेय राजा गजेन्द्र पाल को जाता है. 1914 से यह मेला प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जाता रहा है. 1962 के भारत तिब्बत युद्ध से पहले जौलजीबी का मेला भारत के सबसे बड़े व्यापारिक मेलों में शुमार था. काली और गोरी के संगम पर होने वाला यह मेला सीमांत क्षेत्र का एकमात्र अन्तराष्ट्रीय मेला रहा. हर साल इस मेले में तीन देशों- तिब्बत, नेपाल और भारत की संस्कृति का मिलन हुआ करता.
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार  1939 से 1947 तक अस्कोट रियासत के युवराज टिकेन्द्र पाल रहे. युवराज के नाबालिक होने के कारण रियासत का कामकाज अग्रेजों के हाथ में होने के चलते इस समयावधि में मेले का आयोजन ब्रिटिश सरकार द्वारा ही कराया गया. साल 1974 तक मेले की बागडोर रियासत के हाथों ही रही. 1975 से मेले का आयोजन उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हाथों ले लिया. तभी से हर साल 14 नवम्बर के दिन से मेले का आयोजन शुरु किया जाना तय हुआ. वर्तमान में उत्तराखंड सरकार द्वारा मेले का आयोजन किया जाता है.


मुख्यमंत्री द्वारा इस अवसर पर क्षेत्र के विकास हेतु विभिन्न घोषणाएं की गई।  उन्होंने घोषणा की कि चामी से मेतली तक मोटर मार्ग का निर्माण किया जाएगा। जौलजीवी में स्वास्थ्य केन्द्र का निर्माण किया जाएगा। जौलजीवी से वनराजि जनजाति बस्ती गानागांव- पचकाना -ढुंगातोली तक सड़क का निर्माण किया जाएगा। मवानी-दवानी से मणिधामी मोटर मार्ग निर्माण किया जाएगा। बसन्तकोट से मुन्नगरधार-उछति-लिलम तक मोटर मार्ग का निर्माण किया जाएगा। सिंमगड नदी के दाई ओर स्थित घटन(नाचनी) बाढ़ सुरक्षा हेतु तटबंध निर्माण  किया जाएगा। मुनस्यारी बरार गाड़ के बाईं ओर खेत भराड़ गांव में बाढ़ सुरक्षा हेतु तटबंध निर्माण किया जाएगा। एलोपैथिक चिकित्सालय तेजम का उच्चीकरण किया जाएगा। मल्लधार से मडलकिया तक मोटर मार्ग का निर्माण किया जाएगा। बलमरा से बसोरा-सल्याडी मोटर मार्ग का निर्माण किया जाएगा। नोला पब्लिक स्कूल जुम्मा को अनुदान सूची में शामिल किया जाएगा। जौलजीवी में बुनकर भवन का निर्माण किया जाएगा। एलोपैथिक चिकित्सालय बरम हेतु कार्यवाही की जाएगी। स्थानीय लोगों की सहमति पर मुनस्यारी को नगर पंचायत बनाया जाएगा। ग्राम पंचायत पांगला के स्वास्थ्य केन्द्र खोले जाने हेतु कार्यवाही की जाएगी। उन्होंने जौलजीवी मेले के आयोजन हेतु 5 लाख रुपये देने की घोषणा  भी की।
इस अवसर पर कैबिनेट मंत्री बिशन सिंह चुफाल ने कहा कि यह मेला भारत एवं नेपाल दोनों देशों का सांस्कृतिक मेला है। पूर्व में यह एक बड़ा व्यापारिक मेला होता था, अब इसका स्वरूप धीरे धीरे बदल रहा है।          इस अवसर पर विधायक धारचूला हरीश धामी, ब्लॉक प्रमुख धन सिंह धामी, नगर पालिका अध्यक्ष श्रीमती राजेश्वर देवी, जिलाध्यक्ष भाजपा विरेन्द्र वल्दिया, जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान, पुलिस अधीक्षक लोकेश्वर सिंह और मित्र राष्ट्र नेपाल के आम नागरिक व संस्कृति कर्मी भी उपस्थित थे।

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