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कृषि संकट की आहट: कमजोर मानसून और शक्तिशाली अल नीनो (El Niño) ने भारत की रबी फसलों और भविष्य पर खतरा बढ़ाया

नई दिल्ली, 19 अक्टूबर— भारत को कृषि और जल विज्ञान से जुड़ी एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि दक्षिण-पश्चिम मानसून की भारी कमी के परिणाम एक असामान्य रूप से शक्तिशाली अल नीनो के साथ मिल रहे हैं। 11 वर्षों में सबसे कम जून-सितंबर बारिश के बाद पारंपरिक गर्मियों की बारिश समाप्त हो गई है, लेकिन विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि असली संकट अभी शुरू ही हुआ है। यह मंडराता खतरा केवल नमी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि जल संकट, बढ़े हुए तापमान और 2027 की गर्मियों तक संभावित फसल विफलता का संकेत दे रहा है।

जलाशयों के घटते जल स्तर ने बजाई खतरे की घंटी : भारत की सर्दियों (रबी) की फसल का आधार काफी हद तक मिट्टी की बची हुई नमी और मानसून के बाद जलाशयों के जल स्तर पर निर्भर करता है। वर्तमान आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार, मध्य अक्टूबर तक, भारत में औसत जीवित जल भंडारण अपनी क्षमता के लगभग दो-तिहाई तक गिर गया था, जो सामान्य स्तर से 16% कम है। ग्रीष्मकालीन मानसून के अंत में, 178 प्रमुख जलाशयों में भंडारण उनकी संयुक्त क्षमता का मात्र 70% था, जो 76.6% के 10-वर्षीय औसत और पिछले साल के 79% से काफी पीछे है।

दक्षिणी भारत विशेष रूप से संवेदनशील है, जहां जलाशय लगभग आधी क्षमता पर काम कर रहे हैं। इस कमी का सीधा असर गेहूं, सरसों और चना जैसी महत्वपूर्ण रबी फसलों की बुवाई पर पड़ता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेट्रोलॉजी के जलवायु वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल ने इसके प्रभावों पर प्रकाश डाला: “एक कमजोर मानसून जल संकट (water stress) में बदल सकता है, फिर सर्दियों की फसल को प्रभावित कर सकता है, और अंततः 2027 के गर्मी के मौसम तक खिंच सकता है”। उन्होंने आगे कहा कि मिट्टी की कम नमी और भूजल स्तर में गिरावट से सर्दियों की फसल के लिए सिंचाई का दबाव बढ़ेगा।

हालांकि भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक सामान्य पूर्वोत्तर मानसून का अनुमान लगाया है—जो आमतौर पर अक्टूबर से दिसंबर तक तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कुछ हिस्सों जैसे दक्षिणी राज्यों में महत्वपूर्ण वर्षा प्रदान करता है—मध्य, पश्चिमी और उत्तरी भारत के अधिकांश हिस्सों में दूसरे बारिश के मौसम का अभाव है।

अल नीनो का प्रभाव और तापमान का खतरा ; पानी की कमी को और बढ़ाने वाला कारक प्रशांत महासागर में मौजूद एक असाधारण रूप से मजबूत अल नीनो है, जिसके आने वाले महीनों में अपने चरम पर पहुंचने का अनुमान है और यह रिकॉर्ड पर सबसे मजबूत हो सकता है। अल नीनो आमतौर पर गर्म वैश्विक तापमान से जुड़ा होता है, एक ऐसी प्रवृत्ति जो व्यापक जलवायु परिवर्तन के कारण भारत की लगातार गर्म होती सर्दियों में पहले से ही दिखाई दे रही है।

IMD ने देश के अधिकांश हिस्सों में एक गर्म अक्टूबर का पूर्वानुमान लगाया है। नमी की कमी वाले मानसून के बाद गर्म सर्दी त्वरित वाष्पीकरण का कारण बनती है, जिससे फसलों के लिए पानी की आवश्यकता बढ़ जाती है और पहले से ही कम सिंचाई संसाधनों पर और दबाव पड़ता है।

हालांकि, मौसम का मिजाज अभी भी जटिल है। अल नीनो पश्चिमी विक्षोभ के माध्यम से पश्चिमी हिमालय में सर्दियों की वर्षा ला सकता है। नतीजतन, IMD ने पंजाब और हरियाणा जैसे पानी की कमी वाले राज्यों के लिए अक्टूबर-दिसंबर में सामान्य से अधिक वर्षा का अनुमान लगाया है। फिर भी, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि वर्षा की मात्रा की तुलना में तापमान में बदलाव अंततः कृषि के लिए अधिक घातक साबित हो सकता है।

गेहूं पर खतरा: ‘टर्मिनल हीट’ (Terminal Heat) का जोखिम : घरेलू खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरा फरवरी और मार्च में गेहूं की फसल के दाने भरने (grain-filling) के महत्वपूर्ण चरण के दौरान बेमौसम गर्मी की संभावना में निहित है। यदि अल नीनो वसंत ऋतु तक तापमान को बढ़ाए रखता है, तो यह फसल के जल्दी पकने, दाने भरने की अवधि को कम करने और अनाज के आकार व समग्र उपज को काफी कम करने का जोखिम पैदा करता है।

भारत को इस घटना का हालिया, दर्दनाक अनुभव है। 2022 में, जब फसल कटाई के करीब थी, ठीक उसी समय गेहूं उगाने वाले क्षेत्रों में मार्च की भीषण गर्मी (हीटवेव) पड़ी थी। इस “टर्मिनल हीट” ने पैदावार को काफी कम कर दिया था, जिससे भारत को अस्थायी रूप से अपने गेहूं के निर्यात को रोकना पड़ा था। वर्तमान में एक असाधारण रूप से मजबूत अल नीनो के कारण, वैसी ही स्थिति दोहराए जाने का जोखिम बहुत अधिक है।

घटे हुए लक्ष्य और दीर्घकालिक गर्मी के जोखिम : कृषि क्षेत्र में इन गंभीर विपरीत परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए, केंद्र सरकार ने एहतियात के तौर पर 2026-27 के लिए अपने खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य को घटाकर 373.9 मिलियन टन कर दिया है, जो 2025-26 के अनुमानित 376.6 मिलियन टन से कम है। कृषि मंत्रालय ने 177.7 मिलियन टन का सतर्क रबी लक्ष्य तय करते हुए पानी की उपलब्धता और मिट्टी की नमी को लेकर विशेष रूप से चिंताओं का हवाला दिया है।

.मौसम की इस विसंगति के परिणाम वसंत की फसल के साथ समाप्त नहीं होंगे। अनुभवी मौसम विज्ञानी और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव एम. राजीवन चेतावनी देते हैं कि अल नीनो के वायुमंडलीय प्रभाव इस घटना के समाप्त होने के लंबे समय बाद तक बने रहते हैं। उन्होंने कहा, “अल नीनो के बाद वाली गर्मियों में आमतौर पर हीट वेव (लू) का प्रभाव बढ़ जाता है

जैसे-जैसे भारत इस जटिल मौसम चक्र का सामना कर रहा है, ध्यान केवल बारिश की कमी से हटकर पानी की भारी कमी और गर्मी के तनाव की एक लंबी अवधि पर केंद्रित हो गया है। कृषि पर पड़ने वाला यह आसन्न दबाव संभवतः नीति निर्माताओं को खाद्य भंडार की बारीकी से निगरानी करने और आने वाले वर्ष में घरेलू खाद्य महंगाई व ग्रामीण आर्थिक स्थिरता को प्रबंधित करने के लिए एहतियाती उपायों पर विचार करने के लिए मजबूर करेगा।

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