टीएमयू में सिद्ध प्रभु के 1024 गुणों की आराधना

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मुरादाबाद, 9 नवंबर  (उ  हि )। श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के आठवें दिन एक हज़ार चौबीस गुण संयुक्त श्री सिध्द परमेष्ठी के लिए पूजन किया गया। इस विधान में अस्सिवे पद्य से सौवें पद्य पर्यन्त; 21 पद्यों द्वारा अठारह दोषों के भाव की प्रधानता से सिद्ध भगवान का गुणगान किया गया है। 101वें पद्य से 124वें पद्य पर्यन्त; 24 पद्यों द्वारा अनंत चतुष्ट्य की प्रधानता से सिध्द भगवान की स्तुति की गई है। दो सौ नवासी से दो सौ छायानवें पद्य पर्यन्त; आठ पद्यों द्वारा आठ प्रातिहार्य की अपेक्षा, भगवान का गुणगान किया गया है। दूसरी ओर विधान में तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन के संग-संग फर्स्ट लेडी श्रीमती वीना जैन, ग्रुप वाइस चेयरमैन श्री मनीष जैन, श्रीमती ऋचा जैन की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। इस विशेष पूजा में यूपी के संग-संग महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम आदि से आए श्रावक-श्राविकाएं धर्म लाभ कमा रहे हैं।
श्रद्धालु हुए सिद्ध प्रभु की भक्ति में तल्लीन 
विधान में भोपाल से आई संजय एंड पार्टी ने उत्कृष्ट संगीत और भक्ति गीतों के रस में डुबोकर श्रद्धालुओं को नवदेवता पूजन और नंदीश्वर द्वीप पूजन के पद्यों से आध्यात्मिक उन्नयन कराया।
इस ग्रुप ने सुरमय भक्ति गीतों जैसे कि, णमोकार ध्यायो,जिस दिन ये पापी मन पावन होगा,नाम तुम्हारा तारणहारा, जिसकी प्रतिमा इतनी सुंदर वो कितना सुंदर होगा,डाल डाल पर फूल खिले है,कुण्डलगिरी में बन गया मंदिर विशाल,ओ पारस पारस पुकारो मधुबन में,तूने ख़ूब दिया भगवान,मंदिर टीएमयू का बड़ा ही सुहाना, जमाने से कहो अकेले नहीं हम, मन जब कही न लगे टीएमयू में आना, से विधान में शामिल सभी भक्तों को सिद्ध प्रभु की भक्ति में तल्लीन कर दिया।
टीएमयू विश्व के लिए मंगलकारी : गणिनी प्रमुख
गणिनी प्रमुख आर्यिका शिरोमणि ज्ञानमती माताजी के सानिध्य में यूनिवर्सिटी के जिनालय में भगवान पार्श्वनाथ,भगवान महावीर और भगवान मुनिसुव्रतनाथ का अभिषेक और शांतिधारा पीठादीश्वर स्वस्ति श्री रविंद्रकीर्ति जी महाराज के पाठन और निर्देशन में किया गया। ज्ञानमती माताजी ने अपने अमृत वचनों में बताया कि- तिरेसठ शलाका पुरुष हर चक्रवर्ती काल में होते है। तीर्थंकर परंपरा अनादि है। यूनिवर्सिटी में स्थापित चैत्यालय को सदैव उनका आशीर्वाद है और यूनिवर्सिटी गौरवपूर्ण कार्य करते हुए निरंतर ऊंचाइयों पर पहुँचती जा रही है। शास्त्रों में लिखा है ,अयोध्या में भगवान के अनुष्ठान के दौरान देवताओं ने उपस्थिति दर्ज की । सीकर की एक घटना का उल्लेख किया कि सन 1960 में आचार्य महाराज के संघ को विहार करने से श्रावकों ने मना कर दिया,परंतु महाराज ने वही सिद्धचक्र विधान कराकर श्रद्धालुओं को धर्म लाभ दिया और उनका उन्नयन कराया।फतेहपुर के दर्शन लाल की भक्ति के साथ आराधना का भी उल्लेख किया। इस दौरान उन्होंने ये भी बताया कि यह विश्वविद्यालय विश्व के लिए मंगलकारी है। इस अवसर्पिणी काल के तीर्थंकर की आराधना की है। उनके मार्गदर्शन में निर्मित तीर्थ में स्थापित हिरिम में 24 तीर्थकर की स्थापना की गयी है। ऋषभदेव के पुत्र भरत के नाम पर ही भारत का नाम पड़ा है। अहिंसा परमोधर्म हमेशा विजयी बना रहेगा। माताजी ने बताया कि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी ने भी अहिंसा के मार्ग से विश्व शांति होने के बारे में कहा था और विश्वविद्यालय को खूब आशीर्वाद दिया। उन्होंने 1934-35  की घटना का उल्लेख किया- बताया कि सर्वार्थ सिद्धि नामक शास्त्र में पंचामृत अभिषेक पाठ, पूज्यपाद जी द्वारा उल्लेखित है। विद्वानों ने इस बात को माना है कि विक्रम संवत 302 में पूज्यपाद स्वामी जी हुए है। वि सं 753 में काष्ठा संघ उन्ही की परंपरा है। अनादि काल की विद्या संस्कृत है।
आराधना से तीन रत्न – सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान,सम्यक चारित्र की प्राप्ति:चंदनामती माताजी
विधान में चंदनामती माताजी ने आशीर्वचन देते हुए कहा कि- तीन सच्चे देव है; देव,शास्त्र और गुरु। इनकी आराधना से तीन रत्न सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान,सम्यक चारित्र की प्राप्ति होती है।धवलाग्रंथ में उल्लेख है कि- निधककर्म और निकाचित कर्म भगवान के दर्शन से नष्ट हो जाते है। जिनशासन का शास्त्र है-जिनवाणी, जिसकी भक्ति से सम्यग ज्ञान रत्न की प्राप्ति होती है। गुरु रूप की भक्ति करने से सम्यक चारित्र रत्न की प्राप्ति होती है। गुरु हमें रास्ता दिखाते है। चार अनुयोगों में निवर्त जिनवाणी को रखा गया है। पैसे से किसी गुरु को नहीं बनाया जा सकता।  उन्होंने बताया कि समंतभद्राचार्य ने कहा है- गुरु के चरणों में नमन करने मात्र से उच्च गति प्राप्त हो जाती है। प्रक्रियाओं से गुजर कर ही सिद्धत्व की प्राप्ति होती है। दान देने से भोगों की प्राप्ति होती है। भाव विभोर होकर उन्होंने ये गीत गाया-नमन गुरु पद में करने से उच्च गति प्राप्त होती है,दान आहार आदि से भोगों की प्राप्त होती है। इसके बाद बताया कि गुरु की पूजा करने से आत्मा पूज्य बनती है।निंदा आत्मा को निंद बनाती है।अगर सम्यक दर्शन नहीं हुए तो मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। दुनिया का हर प्राणी दुख से डरता है और सुख से सुख को पाना चाहता है… का स्वरचित गीत अर्थ सहित वाचन किया और बताया कि सुख केवल पुण्य कर्मों से ही प्राप्त हो सकता है। ऐतिहासिक रूप से ज्ञानमती माताजी ने अपने चातुर्मासिक प्रतिक्रमण को तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय परिसर में सम्पन्न किया। इसी दौरान कुलाधिपति श्री सुरेश जैन ने बताया, माताजी का आशीर्वाद प्राप्त भक्त एवम् भारतीय ज्ञान परंपरा के आचार्य डॉक्टर अनुपम जैन ने जैन गणित में माताजी के सानिध्य में बहुत अच्छा कार्य किया है। शून्य की प्राप्ति और उदगम जैन शास्त्र से ही हुआ है। ज्ञानमती माताजी की भक्ति उपरांत चंदनामती माताजी ने ‘यही है ज्ञान का मंदिर’ भजन सुनाया । उन्होंने बताया कि संसार में चार चीजें पवित्र मानी गयी है-भूमि से निकला जल, पतिव्रता नारी (सती सीता), कुंवारी कन्या, धर्म परायण राजा और ब्रह्मचारी। नारी पवित्र होती है। नारी ही ईश्वर को भी जनती है।
णमोकार मंत्र की जाप 27श्वास उच्छवास के साथ करें: विधानाचार्य
विधान के अर्घ्य समर्पण के दौरान विधानाचार्य श्री ऋषभ शास्त्री ने बताया कि भगवान आपके गुणों का वर्णन जिह्वा से नहीं कर सकते। जो चीज़ हमारे करीब है, उसमें मिलावट है,प्रभु से मिलने में वही बाधा है। पुनरुत्ति दोष से पाप लगता है। उन्होंने विधान की व्यवस्था में तन और मन से और चौबीस घंटे शामिल छात्र – छात्राओं का समस्त उपस्थित जनसमूह के साथ उत्साहवर्धन किया,जिनमें धार्मिक, वैभव, प्रयास, श्रेय,  सर्वज्ञ, अमन, संयम, भावेश, आराध्य, पारस, हर्ष, अंशिका, भावना, शुचिता, उजला, मुदित, संस्कार के अतुलनीय योगदान को सराहा। साथ ही माताजी की अयोध्या को आधुनिक जैन तीर्थ के रूप में देखने की इच्छा के बारे में भी बताया। विधान में शामिल भक्तों को व्रत दिलाए कि णमोकार मंत्र की जाप 27श्वास उच्छवास के साथ करें, प्रतिदिन संत को आहार देने का विचार, सोने के बाद और जागने के पहले चारों आहारों का त्याग ऐसा जीवन पर्यंत प्रतिदिन करें। सांध्यकालीन प्रवचन में आरती के पश्चात प्रतिष्ठाचार्य श्री ऋषभ शास्त्री ने सिद्धों के 1024 गुणों की जीवन में भूमिका और सिद्धचक्र महामंडल विधान के इन अर्घो के महात्म्य को समझाया।
विधान में तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति श्री सुरेश जैन के संग-संग फर्स्ट लेडी श्रीमती वीना जैन, ग्रुप वाइस चेयरमैन श्री मनीष जैन, श्रीमती ऋचा जैन की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। इस विशेष पूजा में यूपी के संग-संग महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, असम आदि से आए श्रावक-श्राविकाएं धर्म लाभ कमा रहे हैं।

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